नोएडा प्रशासन ने प्रमुख माँग मानी पर मज़दूरों में अब भी क्यों है डर और निराशा?

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
    • ........से, नोएडा
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

इस हफ़्ते नोएडा में हुई हिंसक घटनाओं के बाद वहां के प्रशासन की तरफ़ से कई क़दम उठाए गए हैं. इन क़दमों में नोएडा में मज़दूरी बढ़ाने का एलान, औद्योगिक इलाकों में बढ़ी हुई मज़दूरी की जानकारी वाले बोर्ड लगाना और फ़ैक्ट्रियों के अंदर काम की हालत सुधारने के वादे शामिल हैं.

इसके अलावा सोमवार को हुए तोड़फोड़ वाले प्रदर्शनों के पीछे 'साज़िश' तलाशने के लिए पुलिस की मुहिम जारी है.

नोएडा के असंगठित मज़दूरों की कामकाज से लेकर उनके रहने-सहने की हालात की पड़ताल करते हुए बीते मंगलवार यानी 14 अप्रैल को दोपहर के करीब दो बजे नोएडा के फेज़ 2 पुलिस थाने के बाहर हमें शहनाज़ पुलिस से बात करने की कोशिश करती नज़र आईं.

क्या बात है, हमारे यह पूछने पर उन्होंने बताया, "मेरे भतीजे सफ़ीक़ मोहम्मद ने पास की एक फ़ैक्ट्री में नया नया काम शुरू किया था. शनिवार (11 अप्रैल) को वह काम से घर नहीं लौटा. स्थानीय लोगों ने बताया कि पुलिस उसे पकड़कर ले गई. तब से हम उसे ढूँढ रहे हैं."

नोएडा में मजदूरों का प्रदर्शन

इससे एक दिन पहले हज़ारों मज़दूर वेतन बढ़ाने और बेहतर काम की हालत की मांग को लेकर नोएडा की सड़कों पर उतरे थे.

नोएडा के कई इलाक़ों में प्रदर्शन हुए. कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई. गाड़ियाँ जलाई गईं, पत्थर फेंके गए और फ़ैक्ट्रियों के कुछ दरवाज़े के शीशे भी तोड़े गए.

लेकिन प्रदर्शन के ल‍िए सड़कों पर आने से पहले ही मज़दूर स्थानीय प्रशासन से बातचीत कर रहे थे.

इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि पड़ोसी राज्य हरियाणा ने इसी आठ अप्रैल को न्यूनतम मज़दूरी 11,257 रुपये से बढ़ाकर 15,220 रुपये करने का ऐलान किया था.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, नोएडा के अलग-अलग इलाक़ों में प्रदर्शन करने वाले मज़दूरों की संख्या करीब 40 हज़ार थी.

हालाँकि 14 अप्रैल को प्रशासन ने मज़दूरी बढ़ाने सहित कुछ मांगें मानने पर सहमति जताई लेकिन इससे शहनाज़ को कोई ख़ास राहत नहीं मिली है.

जिस कॉलोनी में वह और कई दूसरे मज़दूर रहते हैं, उसके बाहर वह फिर से पुलिस वालों के पास जाती हैं. पुलिस वाले उन्हें वापस थाने जाने को कहते हैं. वह फिर से चल पड़ती हैं.

थाने से बाहर निकलने के बाद वह बताती हैं, "मैं अंदर गई और कहा कि मैं अपने लापता भतीजे की शिकायत देने आई हूँ.''

''उन्होंने कहा बाहर जाकर लिखो और फिर लेकर आओ. उन्होंने मुझे एक खाली काग़ज़ दे दिया. मैंने कहा कि मुझे लिखना नहीं आता तो बोले बाहर जाकर किसी से लिखवाकर ले आओ."

एक बार फिर, बिना किसी जानकारी के मायूस होकर वह अपनी कॉलोनी की तरफ़ लौट जाती हैं.

आख़‍िरकार 15 अप्रैल की शाम को परिवार ने बताया कि उन्हें इस बात का पता चला कि सफ़ीक़ को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

शहनाज़ अकेली नहीं थीं. फेज़ 2 पुलिस थाने के बाहर की गली में ऐसे कई परिवारों की भीड़ द‍िखी जो अपनों के बारे में कोई ख़बर मिलने का इंतज़ार कर रहे थे.

गिरफ़्तारी के बारे में सवाल पूछे जाने पर गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि सोमवार को हुई हिंसा के मामले में अब तक 300 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है और सात एफ़आईआर दर्ज की गई हैं.

उन्होंने कहा कि आगे और गिरफ़्तारियाँ भी हो सकती हैं.

जब मैंने उनसे शहनाज़ जैसे लोगों के बारे में पूछा, जिन्हें अपने अपनों की कोई जानकारी नहीं मिल रही थी, तो लक्ष्‍मी सिंह ने कहा, "सारी जानकारी दे दी गई है. जितनी भी गिरफ़्तारियाँ हुई हैं, वे क़ानूनी प्रक्रिया के तहत हुई हैं. जो परिवार वाले या उनके वकील थाने आए हैं, उन्हें जानकारी दे दी गई है. किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है."

'जीता कौन है सर? हम तो मैनेज करते हैं'

नोएडा की सड़कों पर प्रीति मौर्या भी पुलिस थाने के बाहर इंतज़ार करने वालों में शामिल थीं.

उन्होंने बताया कि उनके भाई एक फ़ैक्टरी में मज़दूर हैं. उन्हें कुछ ही घंटों पहले गिरफ़्तार कर लिया गया था.

वह बताती है, "आज सुबह (14 अप्रैल) फ़ैक्टरी में उनके सीनियरों ने उन्हें बुलाया था. इसलिए वह चले गए. उसके बाद क्या हुआ, हमें पता नहीं. बस इतना बताया गया कि उन्हें और उनके एक साथी मज़दूर को गिरफ़्तार कर लिया गया है. कोई नहीं बता रहा कि वे कहाँ हैं. पुलिस हमें बस एक जगह से दूसरी जगह दौड़ा रही है."

इसके बाद हम परिवार के साथ उनके घर तक गए. उनकी कॉलोनी पुलिस थाने से मुश्किल से तीन किलोमीटर की दूरी पर है.

कॉलोनी टूटी-फूटी और कच्ची सड़कों से भरी थी. जब भी कोई बाइक या ई-रिक्शा निकलता है, धूल के बादल उड़ जाते हैं. नालियाँ भरी हुई थीं और गंदा पानी जमा था. जगह जगह कूड़ा फैला हुआ था. लोगों के साथ-साथ गलियों में गायें भी घूम रही थीं.

क्या वह कोई बचत कर पाती हैं?

वह बोलीं, "कुछ भी नहीं. ख़र्च तो हैं ही. कई बार बीमार भी पड़ जाते हैं. हम कोई मशीन नहीं हैं और मशीनों को भी मरम्मत चाहिए. अपने हक़ की मांग करना ग़लत नहीं है. ऐसे आंदोलन एक आवाज़ से ही शुरू होते हैं. फिर धीरे-धीरे फैलते हैं."

'करियर के चार-पाँच साल बर्बाद कर दिए'

21 साल के रोहित सिंह बताते हैं कि वह पिछले पाँच साल से नोएडा की फ़ैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं.

वह ख़ासतौर पर एलईडी टीवी और उससे जुड़े सिस्टम, जैसे साउंड, यूएसबी वग़ैरह की जाँच (टेस्टिंग) का काम करते हैं. प्रीति की तरह ही उनकी कमाई भी करीब 13 हज़ार रुपए महीना है.

पास की एक कॉलोनी में दूसरी मंज़िल पर बने उनके कमरे में बैठकर मैं उनकी ज़िंदगी और काम के बारे में जानना चाहता था.

वह नीचे देखते हुए बोले, "इस कमरे में हम तीन लोग रहते हैं. मकान मालिक एक कमरे में तीन से ज़्यादा लोगों को रहने नहीं देता."

छोटे से कमरे में अपने दाहिने हाथ के पास रखे इंडक्शन चूल्हे की ओर इशारा करते हुए वह बोले, "यहीं हम खाना बनाते हैं. दो लोग पलंग पर सोते हैं और एक नीचे फ़र्श पर. हम अपने हक़ के लिए लड़ेंगे. हम किसी भी हद तक जा सकते हैं. क्या अपने हक़ की मांग करना गलत है?''

वो कहते हैं, "हम बहुत मेहनत करते हैं. अक्सर 12 घंटे की शिफ़्ट होती है. सुबह छह बजे उठते हैं. खाना बनाते हैं. काम पर जाते हैं. रात नौ बजे लौटते हैं. फिर से खाना बनाते हैं और 11 बजे सोते हैं. इस कमरे के लिए हम 5,500 रुपए महीने किराया देते हैं. मेरी तनख़्वाह देखिए और ख़र्च देखिए. महँगाई बहुत बढ़ गई है. गैस सिलेंडर 3,500 रुपए तक आ रहा है."

हमने उनसे पूछा क‍ि क्या उन्होंने कभी अपनी फ़ैक्ट्री में वेतन बढ़ाने की बात की?

वह कहते हैं, "जब हम पूछते हैं तो कहते हैं, तुम्हारी जगह और लोग आ जाएँगे. चाहो तो नौकरी छोड़ दो. मैं रोज़ 12–14 घंटे काम करता हूँ. यह देखकर मेरे माता-पिता परेशान रहते हैं. इसलिए मैं उन्हें सब कुछ नहीं बताता.''

'हम जैसे लोग अंदर से टूट चुके हैं. लेकिन ज़िम्मेदारी ऐसी चीज़ होती है वह अंदर से हर इंसान को खोखला कर देती है. अब नोएडा नहीं आयेंगे, सर. कोई फ़ायदा नहीं है. ख़र्चे देखिए. हम कमाते कुछ भी नहीं. मैंने अपनी ज़िंदगी और करियर के चार-पाँच साल बर्बाद कर दिए"।

'प्रमुख माँग मान ली गई है'

पुलिस कमिश्नर ने 14 अप्रैल को प्रदर्शन के पीछे किसी 'बड़ी साज़िश' की ओर इशारा किया था.

दूसरी ओर प्रशासन ने हालात शांत करने की कोशिश की.

गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिला अधिकारी मेधा रूपम ने पत्रकारों से कहा, "श्रमिकों की जो सबसे प्रमुख माँग थी – वेतन बढ़ोतरी की, उसे मान लिया गया है."

"इसके अलावा और भी निर्देश दिए गए हैं. जैसे, मज़दूरों को हर महीने की 10 तारीख से पहले पूरी तनख़्वाह उनके बैंक खातों में दी जाएगी. उन्हें हर साल नवंबर से पहले बोनस दिया जाएगा. अगर मज़दूरों से ओवरटाइम कराया जाता है तो उन्हें दोगुना वेतन दिया जाएगा. अगर उनसे साप्ताहिक छुट्टी के दिन काम कराया जाता है, तब भी उन्हें दोगुना वेतन दिया जाएगा.''

सरकारी जानकारी के अनुसार, नोएडा में न्यूनतम मज़दूरी 11,313 रुपए से बढ़ाकर 13,690 रुपये कर दी गई है.

इसके अलावा उन्होंने कहा, "हर जगह यौन उत्पीड़न से जुड़ी समितियाँ बनाई जाऍंगी. इन समितियों की अध्यक्षता महिलाएँ करेंगी. शिकायत के लिए बॉक्स लगाए जाऍंगे. कॉल सेंटर और कंट्रोल रूम के नंबर भी जारी किए गए हैं. मज़दूर वहाँ भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं. हम इसकी निगरानी करेंगे और तुरंत कार्रवाई करेंगे."

प्रशासन ने बताया वह मज़दूरों से संपर्क कर रहा है. यही नहीं, नई न्यूनतम मज़दूरी व दूसरे बदलावों की जानकारी वाले पोस्टर अलग-अलग जगहों पर लगाए गए हैं.

'हमारी परेशानियाँ किसी को दिखाई ही नहीं देतीं'

हालाँक‍ि, ज़िला प्रशासन ने आउटसोर्सिंग एजेंसियों को चेतावनी दी है कि अगर एजेंसी के ज़रिए आए मज़दूर हिंसा या गड़बड़ी में शामिल पाए गए तो उनके ख़िलाफ़ ब्लैकलिस्ट करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है.

बीबीसी ने कुछ कंपनियों से बात करने की कोशिश की लेकिन ज़्यादातर कंपनियों ने टिप्पणी करने से मना कर दिया.

नोएडा की कंपनी लायंस वर्कफोर्स सॉल्यूशंस के सीनियर अधिकारी यशपाल सिंह ने कहा कि अभी तक उन्हें इस तरह के कोई निर्देश नहीं मिले हैं.

वे कहते हैं, "जब ये नियम लागू होंगे, तब हम देखेंगे कि इन्हें कैसे लागू किया जाए.''

लेकिन मज़दूर अब भी संदेह में हैं. चाहे वह प्रशासन के बारे में हो या फ़ैक्ट्री मालिकों के बारे में.

एक फ़ैक्ट्री मज़दूर शोएब ख़ान ने कहा, "हम काम करना चाहते हैं, लेकिन लगता है हमारी परेशानियाँ किसी को दिखाई ही नहीं देतीं."

उनके साथी अरुण सिंह ने कहा, "26 जनवरी गणतंत्र दिवस हो या 15 अगस्त.हमें छुट्टी नहीं मिलती. फ़ैक्ट्री मालिक हमें काम पर बुला लेते हैं. अगर सरकार सच में हमारे साथ होती तो आज हम अपने दोस्तों और साथियों को ढूँढने के लिए पुलिस थानों के चक्कर नहीं लगा रहे होते."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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