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एक ग़लत मोड़ से कैसे भटक गई महिला, चार दिनों तक जंगल में सिर्फ़ पानी के सहारे रही ज़िंदा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
कर्नाटक के कोडागु ज़िले में ताडियांडामोल ट्रेकिंग ट्रेल पर रास्ता भटकने के बाद चार दिन तक लापता रहीं टेक प्रोफ़ेशनल सरन्या जीएस अब अपने अगले ट्रेक पर जाने को लेकर हिचक रही हैं.
उन्होंने अगले महीने अरुणाचल प्रदेश के तवांग में ट्रेक पर जाने की योजना बनाई थी.
हिचकने के पीछे अपनी पसंदीदा एक्टिविटी के लिए भविष्य में परिजनों की मंज़ूरी का ही मसला नहीं है, बल्कि इससे बहुत कुछ निजी चीज़ें भी जुड़ी हैं.
केरल के तिरुअनंतपुरम से आने वाली 36 साल की सॉफ़्टवेयर इंजीनियर सरन्या ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "अभी समस्या ये है कि लोग आपको पहचानना शुरू कर देते हैं. यह असहजता पैदा करता है. मुझे नहीं पता किसी की नज़र में रहने को कैसे हैंडल किया जाए."
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सरन्या के कूर्ग के मडिकेरी में ढाई घंटे के ट्रेक के अनुभव के बाद वन विभाग ने अगले चार दिनों के लिए ट्रेकिंग पर रोक लगा दी, ताकि निशान और सुरक्षा प्रोटोकॉल तय किए जा सकें.
मडिकेरी डिविज़न के डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स अभिषेक वी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "हम स्पष्ट ट्रेल मार्किंग और सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू कर रहे हैं, ताकि ऐसा दोबारा न हो."
उन्होंने कहा, "हम एक नया सिस्टम बना रहे हैं जिसमें स्थानीय आदिवासी समुदाय के सदस्य ट्रेकिंग समूहों के साथ जाएंगे."
क्या हुआ था?
सरन्या ने, नियमों के मुताबिक़ दो अप्रैल के लिए अरण्यविहार वेबसाइट पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन किया था.
अभिषेक बताते हैं, "वह चेक पोस्ट पर अकेले पहुंची थीं. हमने 10 लोगों का एक समूह बनाया, जिसमें हमारे कुछ वनकर्मी भी थे और उन्हें जाने दिया. ट्रेक सुबह करीब 8.30 बजे शुरू हुआ."
उन्होंने बताया, "यह बहुत छोटा और सरल ट्रेक है. सभी लोग करीब 12.30 बजे लौट आए. लेकिन वह (सरन्या) नहीं लौटीं. "
अभिषेक के अनुसार, "जब उन्होंने उस होमस्टे के मालिक को फ़ोन किया जहां वो ठहरी थीं, तब हमें तब पता चला कि वो रास्ता भटक गई हैं."
जैसे ही यह जानकारी वन अधिकारियों तक पहुंची, उन्होंने अपनी टीम भेज दी. तलाशी दल में कर्नाटक पुलिस की एंटी-नक्सल फ़ोर्स (एएनएफ़) को भी शामिल किय गया.
अभिषेक ने बताया कि उस राहत टीम में क़रीब 70-80 लोग थे.
यह पहली बार नहीं था जब सरन्या ट्रेक पर गई थीं. वह पिछले सात-आठ सालों से कुद्रेमुख, चिक्कमगलुरु और कर्नाटक के ब्रह्मगिरी हिल्स ट्रेक, महाराष्ट्र के नासिक में हरिहर किले जैसी अलग अलग जगहों पर ट्रेकिंग कर चुकी हैं.
सरन्या बताती हैं, "हमें बताया गया था कि हम दो घंटे में चोटी तक पहुंच जाएंगे. इसलिए सुबह 10.45 बजे तक हमने नीचे उतरना शुरू कर दिया. मेरे आगे दो लोग थे और पीछे भी कुछ लोग थे. मैं उनका इंतज़ार करने के लिए रुकी. वे एक चट्टान पर बैठे थे."
अभिषेक ने कहा, "जब हमने बाद में उनसे बात की तो पता चला कि वह कुछ देखने के लिए अंदर चली गई थीं और जब वापस आईं तो बाकी लोग आगे बढ़ चुके थे."
सरन्या ने कहा कि जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, जहां वे लोग चट्टान पर बैठे थे, तो वे वहां नहीं मिले.
उन्होंने कहा, "मैंने गूगल मैप्स इस्तेमाल किया, जिसने दिखाया कि मुझे बाईं तरफ़ जाना चाहिए और सीधे चलना चाहिए. लेकन मुझे कोई नहीं मिला. मैं रास्ता खो चुकी थी."
सात घंटे तक चलती रहीं
सरन्या ने बताया, "मैं लगातार चलती रही, शाम 6.45 बजे तक. हां, सुबह 10.45 बजे से शाम 6.45 बजे तक. मैं पूरे समय होमस्टे के मालिक को फ़ोन करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन किसी भी नंबर पर संपर्क नहीं हो पाया. दोपहर करीब 2.45 बजे मेरा फ़ोन बंद हो गया क्योंकि बैटरी ख़त्म हो गई थी."
उन्होंने आख़िरी कॉल होमस्टे के मालिक को किया था, जो उन्हें लेने के लिए चेक पोस्ट पर इंतज़ार कर रहे थे.
सरन्या कहती हैं, "मैंने उन्हें बताया कि मैं रास्ता भटक गई हूं और उन्हें चेक पोस्ट को सूचित करना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि उन्होंने समझा. मैंने अपने दोस्त को एक टेक्स्ट मैसेज लिखा था ताकि वह मेरे परिवार को बता सके, लेकिन भेजने से पहले ही फ़ोन बंद हो गया."
शाम 6.45 बजे उन्हें एक छोटा सा नाला और पत्थरों वाला इलाका मिला, "मुझे एहसास हुआ कि अंधेरे में चलना सुरक्षित नहीं होगा. मेरे पास चट्टानों पर रुकने के अलावा कोई चारा नहीं था."
तब तक सरन्या सुबह अपने साथ लाई हुई एकमात्र चीज़ 'एक केला' खा चुकी थीं और 500 मिलीलीटर पानी की बोतल भी ख़त्म कर चुकी थीं.
वो बताती हैं, "मैं डरी नहीं थी. मुझे सिर्फ़ एक बार घबराहट हुई, जब मैं ढलान से फिसलकर चट्टान पर गिर गई."
उसी समय उन्हें समझ आया कि उन्हें क्या करना चाहिए.
सरन्या ने कहा, "मैंने खुद से कहा कि यह आत्मविश्वास खोने और घबराने का समय नहीं है. मैं स्वभाव से बहुत शांत व्यक्ति नहीं हूं."
पथरीले इलाक़े में पहुंचने के तुरंत बाद वह क़रीब 50 मिनट तक सो गईं. उन्होंने बताया, "क़रीब 7.50 बजे तक मैं सोती रही. उसके बाद मैं जागी. मैं आसपास नज़र रख रही थी. हां, चारों तरफ़ से कुछ आवाज़ें आ रही थीं. वहां हाथियों की लीद या जंगली बिल्लियों के पंजों के निशान नहीं थे."
उन्हें सिर्फ इस बात का अफसोस था कि वह "चोटी पर वापस नहीं गईं ताकि पूरे इलाक़े का नज़ारा देख सकें और दूसरों की नज़रों में आ सकें."
पैरों में ऐंठन की वजह से आगे बढ़ना मुश्किल हुआ
शुक्रवार सुबह उन्होंने चोटी की ओर जाने की कोशिश की लेकिन "मांसपेशियों में ऐंठन हो रही थी. मैं ऊपर नहीं चढ़ पाई. मैंने वहीं रुकने और जितना हो सके पानी पीने का फ़ैसला किया. मैंने हर दिन नाले से तीन लीटर पानी पिया. मैं वज़न कम करने के लिए उपवास करने की आदी हूं, इसलिए खाना न खाना कोई समस्या नहीं थी."
सरन्या को उम्मीद थी कि ड्रोन उड़ते दिखाई देंगे या कोई खोजी दल उनकी आवाज़ सुनेगा, लेकिन आसपास कहीं भी इंसानों का कोई निशान नहीं था. वो शुक्रवार को भी नहीं सो सकीं. शनिवार को बारिश हो गई. वह एक बड़े पेड़ के नीचे रहीं, हालांकि बारिश में भीग गईं.
रविवार को भी मौसम बादलों भरा था. दोपहर क़रीब 12.15 बजे उन्होंने चोटी की तरफ़ चलने का फैसला किया. तभी उन्होंने नाले के दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ सुनी. उन्होंने जवाब दिया. उन्हें वहीं पेड़ के पास रहने को कहा गया. बाद में उन्हें पता चला कि वे लोग बचाव दल का हिस्सा थे, जो आसपास के गांवों से आए थे, "उन्होंने मुझे पानी और बिस्कुट दिए."
जब वह शाम करीब 6.15 बजे चेक पोस्ट पहुंचीं, तो उनके परिवार के सदस्य, पड़ोसी, दोस्त और सहकर्मी उन्हें लेने के लिए मौजूद थे. अधिकारियों ने उनका बयान दर्ज़ किया.
वन अधिकारियों की तत्परता
वन अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि किस तरह वो लापता हो गई थीं, ये जानने के बाद संदेह की कोई वजह नहीं थी, "जंगल के इलाके में रास्ता भटकना और पूरी तरह किसी दूसरी जगह पहुंच जाना संभव है."
ऐसी आपात स्थितियों में वन अधिकारी बड़ी संख्या में खोजी दल इसलिए भेजते हैं क्योंकि फ़रवरी 2022 में केरल के पलक्कड़ ज़िले के मलमपुझा के पास चेराड में कुरुम्बाची पहाड़ियों में एक 23 साल के युवक को बचाने का अनुभव रहा है.
आर बाबू अपने तीन दोस्तों के साथ 1,000 मीटर ऊंची कुरुम्बाची पहाड़ियों पर चढ़े थे. बाबू चट्टान की दरार में गिर गए थे और उनके पैर में गंभीर चोट आई थी. वह 45 घंटे तक बिना खाना और पानी के उसी स्थिति में फंसे रहे.
पुलिस और ज़िला प्रशासन ने बचाव अभियान चलाया, जिसमें एनडीआरएफ़ की टीम भी शामिल थी. अंत में बेंगलुरु के पैराशूट रेजिमेंटल सेंटर और वेलिंगटन के मद्रास रेजिमेंटल सेंटर की विशेष टीम ने रस्सियों की मदद से उन्हें दरार से बाहर निकाला.
सरन्या के माता पिता ने क्या कहा
सरन्या बताती हैं, "मेरे माता-पिता खुश थे. मैंने उनसे यह वादा नहीं किया है कि मैं अब नहीं जाऊंगी. मेरे पिता ने सिर्फ इतना कहा कि वह मुझे रोक नहीं सकते, लेकिन हमें सूचना देती रहो."
क्या वह दूसरे ट्रेकर्स को कोई सलाह देना चाहेंगी, जब वे अपने समूह से संपर्क खो दें?
उन्होंने कहा, "मैं ट्रेकर्स को सलाह देने की विशेषज्ञ नहीं हूं. यह मेरे लिए सिर्फ़ एक शौक है. इस अनुभव से मैंने यही सीखा है कि जहां से आपने वापस लौटना शुरू किया था, वहीं वापस जाना चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित