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बिहार में बीजेपी को मिल गया अपना सीएम, यहाँ तक कैसे पहुँची पार्टी
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
44 साल का सब्र.
तीन सीट से लेकर 89 सीटों तक का सफ़र.
संयम की एक के बाद एक परीक्षाएं.
तब जाकर बीजेपी को मिला बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री.
बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 21 साल लंबे चले शासनकाल के बाद बीते 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने बिहार के नए और प्रदेश में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
यह पल कई मायनों में ऐतिहासिक था. नीतीश कुमार बिहार से केंद्र की राजनीति की ओर कदम बढ़ा रहे थे और सम्राट उनकी खाली हुई कुर्सी पर बैठते हुए उस लंबी राजनीतिक यात्रा का अंत और एक नए दौर की शुरुआत दर्ज कर रहे थे, जिसका इंतज़ार बीजेपी दशकों से कर रही थी.
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जो बीजेपी की राजनीति को नज़दीक से फॉलो करते हैं, उन्हें पता है कि बिहार बीजेपी के लिए कितना अहम राज्य रहा है. गठबंधन में ज़्यादा सीटें लाते हुए भी अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री न बना पाना, यह स्थिति शायद ही किसी और राज्य में बीजेपी के साथ इतने लंबे समय तक बनी रही हो.
हिंदी पट्टी के जिन राज्यों में समाजवादी राजनीति का असर रहा है, उनमें से एक उत्तर प्रदेश में बीजेपी पहले से सत्ता में थी, पार्टी का अपना मुख्यमंत्री है. लेकिन बिहार में इतने सालों तक गठबंधन के तहत सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई थी.
ऐसे में पार्टी के लिए यह बड़ा मौका है, लेकिन इस बड़े मौके के पीछे दशकों की मेहनत, रणनीति और लगातार बनाए रखे गए राजनीतिक धैर्य की लंबी कहानी छिपी है.
बिहार में पार्टी के इस सफ़र को समझने के लिए मैंने प्रदेश में ही बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता से बात की. उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''आज का दिन पीढ़ियों तक चली बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की मेहनत का फल है. कैलाशपति मिश्रा हों, के.एन गोविंदाचार्य या फिर सुशील मोदी...इन नेताओं ने खुद को खपा कर पार्टी को इस मुकाम तक पहुंचाया."
उन्होंने कहा, "कैलाशपति मिश्रा ने जनसंघ के दौर से ही गांव-गांव जाकर संगठन को खड़ा किया और ऐसे समय में पार्टी को ज़मीन पर टिकाए रखा, जब उसका जनाधार बहुत सीमित था. वहीं गोविंदाचार्य ने पर्दे के पीछे रहकर रणनीतिक दिशा दी. उन्होंने बीजेपी को पारंपरिक दायरे से बाहर निकालकर पिछड़े वर्गों और नए सामाजिक समूहों तक पहुंचने की सोच दी. बिहार की जनता की सेवा हम पहले भी कर रहे थे लेकिन अभी एक अलग उत्साह और ऊर्जा का वातावरण है. बीजेपी का अपना नेता जब सीएम की कुर्सी पर बैठा है तो बिहार के विकास की गति में और तेज़ी आएगी और नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा करने में पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ेगी.''
बिहार की राजनीति तीन बड़े दौर से होकर गुज़री है.
साल 1950 से लेकर 1967 का दौर- जब प्रदेश में ही नहीं देश में भी एकदलीय यानी कांग्रेस का प्रभुत्व था.
फिर आया 1967-1989 का दौर - ग़ैर-कांग्रेसी ताकतों का उभार हुआ. भारतीय जनसंघ, जो आगे चलकर बीजेपी का आधार बनी, उन्हें सत्ता का हिस्सा बनने का मौका मिला, लेकिन वे अपनी पकड़ को मजबूत और स्थायी रूप नहीं दे पाए.
साल 1990–2005 का दौर - मंडल और सामाजिक न्याय की राजनीति अपने चरम पर रही. लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी आरजेडी का एक लंबा राजनीतिक प्रभाव रहा.
इसके बाद आया नीतीश कुमार और गठबंधन की राजनीति का दौर. इसी दौरान बीजेपी एक मज़बूत सहयोगी के रूप में उभरते हुए राज्य में धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ज़मीन भी तैयार करने लगी.
ऐसे बिहार में पार्टी ने अपनी नींव कैसे रखी और गुज़रे सालों में प्रदेश में बीजेपी के इलेक्टोरल इतिहास के बारे में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संतोष सिंह विस्तार से बताते हैं.
इलेक्टोरल इतिहास
"बिहार में बीजेपी का इलेक्टोरल डेब्यू हुआ साल 1962 में, बीजेपी की मातृसंस्था जनसंघ ने महज़ तीन सीट जीतकर संयुक्त बिहार में अपना खाता खोला था.
पांच साल बाद 1967 में गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार में शामिल होकर पार्टी को पहली बार सत्ता का सीमित अनुभव मिला. साल 1977 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश में इमरजेंसी लागू हुई."
"तब इंदिरा गांधी की सरकार के ख़िलाफ़ लामबंद कई विपक्षी नेता और पार्टियों जैसे भारतीय जनसंघ, कांग्रेस, समाजवादी दल और लोकदल ने मिलकर एक नई पार्टी बनाई, जिसका नाम था - जनता पार्टी."
संतोष सिंह बताते हैं, "इस साल हुए चुनाव के बाद जनता पार्टी ने राज्य में सरकार बनाई और कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बनाए गए. लेकिन फिर पार्टी में अंदरूनी खींचतान भी शुरू होने लगी. समाजवादी और जनसंघ के धड़े में आरक्षण, सामाजिक न्याय को लेकर मतभेद भी शुरू हुए. असर बिहार पर भी पड़ा."
"1980 में बीजेपी के गठन के बाद पार्टी ने फिर से अपने संगठन को खड़ा करना शुरू किया. लेकिन 1990 के दशक में लालू यादव के उभार के साथ बिहार की राजनीति का केंद्र सामाजिक न्याय और जातीय समीकरण बन गए."
संतोष सिंह बताते हैं, "इसी दौर में राष्ट्रीय स्तर पर मंडल बनाम कमंडल की राजनीति उभर रही थी. जहां एक तरफ़ 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद पिछड़े वर्गों की राजनीति मज़बूत हुई, वहीं बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दों के सहारे अपनी वैचारिक ज़मीन तैयार कर रही थी. बिहार में मंडल की राजनीति का असर ज्यादा गहरा रहा, जिसके चलते बीजेपी को विस्तार के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा, लेकिन इसी दौरान उसने अपने संगठन और वोट आधार को धीरे-धीरे मजबूत किया."
"फिर आया 1996, बीजेपी ने नीतीश कुमार की समता पार्टी के साथ औपचारिक गठबंधन किया और यहीं से पार्टी के विस्तार की ठोस शुरुआत हुई. 2005 में यह गठबंधन सत्ता में आया. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और बीजेपी एक मज़बूत सहयोगी के रूप में उभरी. 2010 में पार्टी का प्रदर्शन और मजबूत हुआ, लेकिन 2013 में गठबंधन टूटने और 2015 में महागठबंधन से हार ने उसे झटका दिया."
2017 में नीतीश कुमार की वापसी के साथ बीजेपी फिर सत्ता में आई, और 2020 के चुनाव में पहली बार अपने ही गठबंधन में बड़ी पार्टी बनकर उभरी. यह बदलाव अहम था, यहीं से नेतृत्व की दावेदारी भी मजबूत होने लगी.
आख़िरकार 2025 में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, और सम्राट चौधरी के रूप में उसे बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री मिला.
किन नेताओं की रही अहम भूमिका
वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह मानते हैं कि बिहार में बीजेपी को स्थापित करने में एक नहीं बल्कि कई नेताओं की भूमिका रही. वह कहते हैं, ''एक समय ऐसा था जब बिहार में बीजेपी को लेकर एक तरह की नकारात्मक धारणा थी. उसे सीमित वर्गों की पार्टी माना जाता था. उस दौर में कैलाशपति मिश्र, केएन गोविंदाचार्य जैसे नेताओं ने गांव-गांव जाकर पार्टी का प्रचार किया और संगठन की नींव मजबूत की.
"इसके बाद की पीढ़ी में लालमुनी चौबे और अन्य नेताओं ने पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी को आगे बढ़ाया और फिर एक और दौर आया, जब सुशील कुमार मोदी, नंद किशोर यादव, प्रेम कुमार जैसे नेताओं ने संगठन के साथ-साथ सरकार में भी पार्टी को मज़बूत किया. खास तौर पर सुशील कुमार मोदी की भूमिका बहुत अहम रही."
सुशील कुमार मोदी बिहार में बीजेपी के पहले डिप्टी सीएम भी बने. नीतीश कुमार के साथ उनकी नज़दीकी ने संगठन और सत्ता के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद की और बीजेपी को एक भरोसेमंद सहयोगी के तौर पर स्थापित किया.
सुशील कुमार मोदी के निधन के बाद बिहार बीजेपी में नेतृत्व का एक खालीपन साफ़ महसूस किया गया. ऐसे में संगठन ने नई पीढ़ी को आगे बढ़ाते हुए सम्राट चौधरी को प्रमुख चेहरा बनाया, और यहीं से पार्टी के भीतर नेतृत्व के बदलाव की दिशा स्पष्ट होने लगी.
सम्राट चौधरी पर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद कहते हैं, " बिहार में बीजेपी के साथ मुश्किल ये रही कि सुशील कुमार मोदी के बाद उनके पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जो सबको स्वीकार्य हो. सम्राट बिहार में उप मुख्यमंत्री नंबर एक थे, इसलिए उनको प्रोजेक्ट किया जाने लगा. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फ़ैसले के बाद से ही सम्राट चौधरी का नाम अगले मुख्यमंत्री के रूप में चलने लगा. नीतीश कुमार भी अपनी रैली में सम्राट को विरासत सौंपते नज़र आने लगे. अब पार्टी से किसको सीएम बनाया जाए, इसको लेकर बीजेपी बहुत कश्मकश में थी. दूसरे राज्यों में बीजेपी किसी भी चेहरे को आगे बढ़ा देती है, लेकिन बिहार में ये स्थिति नहीं है. इसलिए आख़िर में नेतृत्व को सम्राट के नाम पर मुहर लगाना पड़ा."
पर बिहार में बीबीसी संवाददाता सीटू तिवारी के मुताबिक़ सम्राट के सीएम बनाए जाने से पार्टी के अंदर एक असहज स्थिति महसूस की जा सकती है. वह एक वाकये से इसे स्थापित करती हैं.
वह बताती हैं, ''बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा ने सम्राट चौधरी के नेता चुने जाने के बाद बीजेपी दफ़्तर में कहा, "गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है. हमारी त्याग, तपस्या और बलिदान से आज ये पल आया है. आरएसएस बैकग्राउंड के विजय कुमार सिन्हा के इस बयान में जो दर्द छिपा है उसकी सबसे बड़ी वजह सम्राट का राजनीतिक करियर है. सम्राट चौधरी आरजेडी, जेडीयू और हम में गुजरते हुए बीजेपी में आए हैं.''
बिहार की राजनीति पर संतोष सिंह की किताब 'जेपी टू बीजेपी' में एक बहुत ही दिलचस्प लाइन है.
वन डे, ग्रीन आस्क्ड सैफ्रन : वाट कीप्स यू सो वाइब्रेंट
सैफ्रन स्माइल्ड : अ लॉट ऑफ़ ग्रीन इनसाइड मी.
कहने का मतलब ये है कि बिहार बीजेपी में खुद समाजवादी नेताओं की भीड़ है, जो आरजेडी या जेडीयू से होते हुए बीजेपी तक पहुंचे हैं. और इनमें सबसे बड़ा उदाहरण हैं - बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी.
सम्राट का राजनीतिक करियर आरजेडी, जेडीयू और हम से होते हुए बीजेपी तक पहुंचा है. साल 2017 के अंत में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन की थी.
ऐसे में पार्टी के अंदर असहजता पर जब हमने प्रदेश में बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता से बात की, तो उनका कहना था, ''ऐसी बातों पर टिप्पणी करने का कोई मतलब नहीं है. यह व्यर्थ की बातें हैं. सभी ने मिलकर यह निर्णय लिया है. पार्टी के अंदर भी सम्राट चौधरी को लेकर अच्छा माहौल है.''
बिहार में अपना मुख्यमंत्री होना बीजेपी के लिए निस्संदेह एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है, लेकिन चुनौतियां भी ख़त्म नहीं हुई. पार्टी बिहार में अब तक गठबंधन के सहारे ही सत्ता में रही है, साथ ही सवाल नेतृत्व की कसौटी का भी होगा, क्योंकि अब तक चुनावी लड़ाइयां मुख्य रूप से नीतीश कुमार के चेहरे पर ही लड़ी जाती रही हैं. बीते चुनाव में एनडीए ने उन्हीं के चेहरे पर चुनाव भी लड़ा था. ऐसे में पांच साल बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी अपने चेहरे और अपने दम पर मतदाताओं का कितना भरोसा हासिल कर पाती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित