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'बम गिरने से ज़मीन कांप गई': क्या कहते हैं ईरान से लौटे तमिलनाडु के मछुआरे
- Author, प्रभुराव आनंदन
- पदनाम, बीबीसी तमिल के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
(चेतावनी: इस लेख में दी गई कुछ जानकारियां आपको असहज कर सकती हैं)
तमिलनाडु के कन्याकुमारी, तूत्तुकुडी, तिरुनेलवेली, नागपट्टिनम समेत कई ज़िलों के रहने वाले मछुआरे ईरान और ओमान जैसे देशों में रहकर मछली पकड़ने का काम करते हैं.
ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इसराइल के हमले शुरू होने के बाद ऐसे मछुआरों के परिवारों ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की थी कि वहां रह रहे मछुआरों को सुरक्षित वापस भारत लाया जाए.
युद्धविराम की घोषणा के बाद, केंद्र सरकार और भारतीय दूतावास की कोशिशों से पहले चरण में ईरान में फंसे तमिलनाडु के 345 मछुआरों को विशेष विमान से पिछले शनिवार (4 अप्रैल) शाम को चेन्नई लाया गया था.
इनमें से कुछ मछुआरे तमिलनाडु में अपने गांव पहुंचे, तो बीबीसी तमिल ने उनसे बातचीत की.
'दूसरी ज़िंदगी जैसा लग रहा है'
भारत लौटे मछुआरे राजेंद्रन का कहना है कि युद्ध के हालात के बीच ईरान से अपने गांव लौटना 'दूसरी ज़िंदगी' मिलने जैसा लग रहा है.
वह कहते हैं, "हम समुद्र में मछली पकड़ने के बाद किश द्वीप पर ठहरे हुए थे, इसलिए शुरुआत में युद्ध को लेकर कोई डर नहीं था. लेकिन जब युद्ध तेज़ हुआ और बम ज़मीन पर गिरने से आने वाले झटके महसूस होने लगे, तब इसकी गंभीरता समझ में आई. युद्ध की वजह से वहां 40 दिन तक हमने दिन में सिर्फ़ एक वक्त का खाना खाकर गुज़ारा किया."
राजेंद्रन बताते हैं, "करीब एक हफ्ते पहले किश द्वीप पर रह रहे मछुआरों को उनके नाव मालिक ने बताया कि भारत सरकार उन्हें उनके वतन भेजने की व्यवस्था कर रही है. इसके बाद कुल करीब 294 मछुआरे सात बसों में (हर बस में 42 मछुआरे) सवार होकर दो दिन की यात्रा कर क़ोम नाम के इलाक़े में पहुंचे. किश द्वीप से ईरान के मुख्य भू भाग तक नाव से लाने और वहां से क़ोम तक बस से ले जाने का खर्च नाव मालिकों ने उठाया."
राजेंद्रन के अनुसार ईरान पर अमेरिका के हमलों की वजह से वे डरे हुए हालात में दो दिन तक बस से सफ़र करते रहे.
उन्होंने कहा कि ज़्यादा हमले समुद्री इलाक़ों में हो रहे थे, इसलिए भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने उन्हें पहाड़ी रास्तों से सुरक्षित निकालकर क़ोम पहुंचाया. वहां भारत सरकार की ओर से उन्हें एक स्टार होटल में ठहराया गया और खाने-पीने की व्यवस्था की गई.
राजेंद्रन ने कहा, "वहां से हमें फिर बस से एक दिन की यात्रा कराकर ईरान के सीमा क्षेत्र तक ले जाया गया. इसके बाद हमें आर्मेनिया ले जाया गया और भारत सरकार के ख़र्च पर वीज़ा और विमान टिकट दिलाकर येरेवन हवाई अड्डे से भारत भेजा गया."
किश द्वीप पर रहने के दिनों में अपनी आंखों के सामने हुए हमलों को याद करते हुए वह कहते हैं, "किश द्वीप से निकलने से चार दिन पहले हमें साफ़ महसूस होने लगा था कि उस इलाक़े में अमेरिका के हमले काफ़ी बढ़ गए हैं."
"जहां हम ठहरे थे, उसके आसपास के इलाक़ों पर ज़ोरदार हमले हुए. इनमें कई लोगों की जान चली गई. हमारी आंखों के सामने मछली पकड़ने वाली कई नावों पर मिसाइल हमले हुए, नावें जलकर समुद्र में डूब गईं. ऐसे हालात में जब हमें बस से क़ोम इलाके में ले जाया गया, तो बहुत राहत मिली."
'सबकुछ किसी सपने जैसा लग रहा है'
मछुआरे सेल्वम ने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "किश द्वीप पर रहते समय जैसे ही युद्ध तेज़ हुआ, सबसे पहले हमारे नाव मालिक ने हमें कहा कि किसी भी तरह अपने गांव लौट जाइए. यह सुनते ही हमारी घबराहट और बढ़ गई. इसके बाद मछुआरों ने भारत के विदेश मंत्री जयशंकर के निजी सहायक से संपर्क कर हमें तुरंत बचाने की गुहार लगाई."
"हमने नागर कोविल के सांसद विजय वसंत, अप्पावु विधायक समेत कई लोगों से भी संपर्क किया. हमारे परिवारवालों ने भी उनके ज़रिए दबाव बनाया, जिसके बाद ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने हमसे संपर्क किया और हमें घर भेजने की व्यवस्था करने का भरोसा दिया."
सेल्वम बताते हैं कि भारतीय दूतावास से संपर्क करने वाले लोग अंग्रेज़ी और हिंदी में बात कर रहे थे. भाषा की समस्या के कारण वे ठीक से बात नहीं कर पा रहे थे.
बाद में उनके परिवारवालों ने दिल्ली के अधिकारियों पर ज़ोर डाला तो भारतीय दूतावास में तमिल बोलने वाले एक व्यक्ति की व्यवस्था की गई. उस व्यक्ति ने तमिल में बात कर उन्हें उनके गांव भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई.
सेल्वम ने आगे बताया, "किश द्वीप से क़ोम तक बस से लाने का किराया हमारे नाव मालिक ने दिया. इसके बाद आर्मेनिया के येरेवन हवाई अड्डे तक जाने का ख़र्च हमें खुद उठाने को कहा गया. यहां हमारे परिवारवालों ने पैसों का इंतज़ाम किया और वह रकम हमारे मालिक को भेज दी."
उन्होंने बताया, "हमें पैसे डॉलर में दिए गए थे. लेकिन क़ोम पहुंचने के बाद कहा गया कि यह रकम भारतीय सरकार ही चुकाएगी. हमसे कोई पैसे नहीं लिए गए. पहले चरण में हम कुल 347 लोग वहां से विमान से शनिवार सुबह करीब 10:30 बजे रवाना हुए और शाम लगभग 6 बजे चेन्नई पहुंच गए."
उन्होंने कहा कि जब ईरान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने समयसीमा तय की थी, उस दौरान हमले कम हो गए थे और उसी मौके का इस्तेमाल करते हुए वे भारतीय सरकार की मदद से भारत लौट पाए.
सेल्वम कहते हैं, "किश द्वीप से हमें बस में लाकर जिस रास्ते से ले जाया गया, वहां बमबारी हुई थी. कई घर और इमारतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थीं, यह हमने अपनी आंखों से देखा. हमें सुरक्षित क़ोम पहुंचा दिया गया और वहां से हमारे गांव भेज दिया गया. अपने गांव लौट आना किसी सपने जैसा लग रहा है."
'अब दोबारा ईरान नहीं जाऊंगा'
मछुआरे तत्तियूस कहते हैं कि जिस जगह उन्हें लाकर ठहराया गया था, उसके पास एक बड़ी मस्जिद थी, इसलिए उन्हें वहां सुरक्षित महसूस हुआ.
बीबीसी तमिल से बात करते हुए उन्होंने कहा, "किश द्वीप से बहुत तनाव की हालत में हम दो दिन की यात्रा कर क़ोम पहुंचे. वहां हमें एक होटल में ठहराया गया. जिस जगह हम रुके थे, उससे करीब 20 किलोमीटर दूर बम गिराए गए थे, ज़मीन पर गिरने के झटके हमें वहां तक महसूस हुए."
उन्होंने आगे बताया, "हमारे होटल के पास एक बड़ी मस्जिद थी, इसलिए भारतीय दूतावास की ओर से हमें बताया गया कि यह इलाका काफ़ी सुरक्षित है और यहां हमला नहीं होगा. इसी वजह से हमें कुछ सुकून मिला."
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि रात के समय डर फिर लौट आता था. "हम इसी आशंका में घिरे रहते थे कि न जाने कब सिर पर बम आ गिरे."
उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्हें विमान से चेन्नई भेजा गया. उनके मालिक लगातार उनके संपर्क में थे. अपने गांव लौट आने के बाद भी उनके मालिक ने फ़ोन कर उनकी ख़ैरियत पूछी.
तत्तियूस के मुताबिक, उनके मालिक की नावों को सारक नाम के इलाके में ले जाकर खड़ा किया गया था. वहां तीन दिन पहले हुए हमले में उनके मालिक की नावों समेत दस से ज़्यादा नावें जलकर पूरी तरह तबाह हो गईं और समुद्र में डूब गईं.
उन्होंने बताया कि जिस नाव पर हमला हुआ, उसी नाव पर वे पिछले 40 दिनों से ज़्यादा समय तक रह रहे थे. उन्हें यह जानकर गहरा सदमा लगा कि वह नाव तीन दिन पहले हमले का शिकार हो गई. उन्होंने कहा कि अगर भारत लौटने में थोड़ी और देर हो जाती, तो वह भी उसी नाव पर होते और शायद इस हमले में उनकी जान चली जाती.
तत्तियूस कहते हैं, "युद्ध खत्म भी हो जाए, तब भी मेरे परिवार वाले मुझे दोबारा ईरान भेजना नहीं चाहते. और मुझे भी अब ईरान जाने का मन नहीं है."
'तुरंत मदद करें'
किश द्वीप से बचाकर ईरान के सीमा क्षेत्र जुल्फ़ा में ठहराए गए मछुआरे राजीव ने बीबीसी तमिल से बात करते हुए कहा, "करीब चार दिन पहले हमें किश द्वीप से बस में लाकर जुल्फ़ा इलाके में ठहराया गया है. यहां जो खाना दिया जा रहा है, उसकी वजह से कई लोग दस्त जैसी बीमारियों से पीड़ित हो गए हैं. यहां ठहरे लोगों को तमिलनाडु वापस लाने के लिए भारतीय सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए."
सरकार क्या कह रही है?
तमिलनाडु सरकार की ओर से की जा रही कार्रवाई को लेकर प्रवासी तमिल कल्याण और पुनर्वास विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "अब तक ईरान से 345 मछुआरों को बचाया जा चुका है. भारतीय दूतावास की ओर से 300 से ज़्यादा मछुआरों को और सुरक्षित निकालकर दो होटलों में ठहराया गया है. उन्हें तमिलनाडु लाने की प्रक्रिया जारी है."
उन्होंने आगे कहा, "होटलों में ठहराए गए कुछ मछुआरों को खाने से एलर्जी के कारण स्वास्थ्य समस्याएं हुई हैं. इस बारे में भारतीय दूतावास को सूचना दे दी गई है. दूतावास ने बताया है कि उन्हें जल्द से जल्द भारत भेजने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं (यह रिपोर्ट लिखे जाने तक)."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.