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जब चंबल के सैकड़ों डाकुओं ने जयप्रकाश नारायण के सामने डाले हथियार
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
चंबल के डाकुओं के हथियार डालने का सिलसिला सन 1960 में शुरू हुआ था. तब चंबल के नामी डाकू मान सिंह के बेटे तहसीलदार सिंह ने नैनी जेल की अपनी कोठरी से सर्वोदय नेता विनोबा भावे को एक पत्र लिखा था.
तहसीलदार सिंह को अदालत ने फाँसी की सज़ा सुना दी थी. वो विनोबा से मिल कर चंबल के 'बाग़ियों' की समस्याओं पर बात करना चाहते थे.
चंबल नदी के बीहड़ वाले इलाक़े में सक्रिय ये लोग अपने लिए डाकू शब्द पसंद नहीं करते थे और ख़ुद को व्यवस्था से बग़ावत करने वाला बाग़ी कहते थे. चंबल का बीहड़ तीन राज्यों--उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच फैला है, बीहड़ में ज़मीन इस तरह ऊँची-नीची होती है कि दस-बीस मीटर से आगे कुछ दिखाई नहीं देता.
हालांकि विनोबा भावे उन दिनों कश्मीर में पदयात्रा कर रहे थे लेकिन तहसीलदार सिंह के पत्र ने उन्हें चंबल के बीहड़ों में आने के लिए प्रेरित किया.
मई, 1960 में उन्होंने उस इलाके का दौरा किया. इस मुहिम में उनके साथ थे सेवानिवृत्त मेजर जनरल यदुनाथ सिंह. विनोबा भावे के प्रयासों से 20 डाकुओं ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया. वो अदालतों से मिलने वाली सज़ा झेलने को तैयार थे.
सज़ा पूरी करने के बाद उनको भूदान से मिली ज़़मीन दी गई ताकि वे खेती करके अपराधमुक्त जीवन गुज़ार सकें, लेकिन इस अभियान में सामने आई प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों ने दूसरे डाकुओं के हथियार डालने में बाधा खड़ी कर दी और 11 साल तक किसी और डाकू ने आत्मसमर्पण नहीं किया.
सन 1971 में चंबल के मशहूर डाकू माधो सिंह ने अपने एक प्रतिनिधि जगरूप सिंह को विनोबा भावे से मिलने भेजा. उसने विनोबा से अनुरोध किया कि वो एक बार फिर चंबल आकर डाकुओं के हथियार डालने की मुहिम शुरू करें.
प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण कुमार गर्ग ने अपनी किताब 'चंबल की बंदूकें, गाँधी के चरणों में' लिखा, "विनोबा ने उन दिनों 'क्षेत्र संन्यास' लिया हुआ था इसलिए उन्होंने इसमें अपनी असमर्थता जताई लेकिन उन्होंने जगरूप सिंह को सलाह दी कि वो इस संबंध में जयप्रकाश नारायण से मिलें."
"तब माधो सिंह ने एक ठेकेदार का वेश बनाकर पटना में जयप्रकाश नारायण से मिलने का फैसला किया. उन्होंने जयप्रकाश नारायण के सहयोगी सच्चिदा बाबू को अपना नाम राम सिंह बताया."
माधो सिंह की जेपी से मुलाक़ात
जब माधो सिंह जयप्रकाश नारायण से मिले तो उन्होंने उनसे कहा, "मैं चंबल के बाग़ियों का संदेश ले कर आया हूँ कि वो आत्मसमर्पण करना चाहते हैं. मुझे विनोबा भावे ने आपके पास भेजा है."
मध्य प्रदेश के सहायक पुलिस महानिरीक्षक रहे डॉक्टर रणधीर सिंह रूहल अपनी किताब 'चंबल के बागी' में लिखते हैं, "जयप्रकाश नाराय़ण एक मिनट चुप रहे और फिर बोले 'मेरा स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा और फिर बांग्लादेश का कार्यभार भी मेरे ऊपर है.'
नकारात्मक उत्तर सुनकर राम सिंह अपने असली रूप में प्रकट हो गए और बोले, "बाबूजी, मैं माधो सिंह हूँ. मैं स्वयं आपके चरणों में आया हूँ. आप चंबल घाटी का काम उठा लें तो मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि सभी गिरोहों का आत्मसमर्पण हो जाए."
जेपी ने कहा, "माधो सिंह जब तुम खुद मेरे पास चल कर आए हो तो मुझे इस दिशा में कुछ करना ही होगा. मैं इस पर सोचूँगा. जब तक तुम मेरे आश्रम में ही रहो."
माधो सिंह शेखोदेवरा आश्रम में एक महीने तक रहे. जब जयप्रकाश नारायण को यक़ीन हो गया कि ये माधो सिंह ही हैं तो उन्होने चंबल घाटी में डाकुओं के आत्मसमर्पण का काम अपने हाथों में लिया.
उस ज़माने में चंबल घाटी में दो डाकुओं पर सबसे ज़्यादा इनाम था. एक तो थे मोहर सिंह जिन पर दो लाख रुपए का इनाम था. उनके और उनके गैंग पर 80 हत्याएँ और 350 डकैतियों का आरोप था.
उनके गैंग की पुलिस से 76 मुठभेड़ें हुई थीं और हर बार वो बच निकले थे. दूसरी तरफ़ माधो सिंह पर डेढ़ लाख रुपए का इनाम था. उन पर 23 हत्याओं और 500 अपहरण के मुकदमे चल रहे थे.
चंबल के बीहड़ों में कूदने से पहले उन्होंने सेना में राजपूताना राइफ़ल्स में एक साल तक मेल नर्स के तौर पर काम किया था.
जेपी ने शुरू किया 'आपरेशन पर्सुएशन'
इस मुहिम में कूदने के बाद जेपी ने मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखे. उन्होंने अपने दो सहयोगियों महावीर भाई और हेम देव शर्मा को इस अभियान में लगाया.
मुख्यमंत्रियों से उत्साहवर्धक जवाब पाने के बाद जेपी ने 13 दिसंबर, 1971 को डाकुओं के लिए एक अपील जारी कर उन्हें हथियार डालने की सलाह दी ताकि वो सामान्य जीवन जी सकें.
जेपी और माधो सिंह की अपील वाली पर्चियां चंबल घाटी के कोने-कोने में बाँटी गई. इसके बाद अगले छह महीनों तक डाकुओं को इसके लिए राज़ी करने के लिए उनका 'आपरेशन पर्सुएशन' शुरू हुआ.
माधो सिंह ने चंबल के इलाके में पहुंच कर जेपी का संदेश अपने प्रभाव के डाकू गिरोहों में भेज दिया. जो डाकू माधो सिंह के प्रभाव से बाहर थे उनसे संपर्क करने के लिए चंबल घाटी शांति मिशन और सर्वोदयी कार्यकर्ताओं और समाजशास्त्रियों की टीम निकल पड़ी.
चंबल के गिरोहों और वहाँ के समाज की अंदरूनी जानकारी रखने वाले पूर्व डाकू लोकमन शर्मा और तहसीलदार सिंह डाकुओं से संपर्क साधने में बहुत उपयोगी साबित हुए.
इन लोगों ने डाकुओं को समझाया कि डाकू जीवन से बाहर आने का ये अच्छा मौका है, फाँसी तो होगी नहीं, सज़ा काटकर वो अपने घर वापस आ सकते हैं.
डॉक्टर रणधीर सिंह रूहल लिखते हैं, "डाकुओं की जिन शर्तों को माना गय़ा वो थीं, एक ही स्थान पर मुक़दमे चलाए जाएं. इसके तहत ग्वालियर की सेंट्रल जेल में विशेष अदालत में सारे मुकदमे चलाए गए और चार सालों के अंदर उनके फ़ैसले भी हो गए."
"किसी को मृत्यु दंड न दिया जाए और उन्हें एक खुली जेल में रखा जाए और उन्हें हथकड़ी और बेड़ियाँ न पहनाई जाएं."
सरकार की शर्तें डाकुओं को बताई गईं
जब मध्य प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों को इस अभियान की जानकारी मिली तो शुरू में उनका रवैया बहुत उत्साहवर्धक नहीं था.
मध्य प्रदेश पुलिस के महानिदेशक रहे किरपाल ढिल्लों अपनी आत्मकथा 'टाइम प्रजेंट एंड टाइम पास्ट मेमॉएर्स ऑफ़ अ टॉप कॉप' में लिखते हैं, "सन 1971 की शुरुआत में मुझे डाकू माधो सिंह का संदेश मिला कि सभी बड़े डाकू गिरोहों ने आत्मसमर्पण करने का फ़ैसला कर लिया है. उसने जयप्रकाश नारायण सहित कई बड़े राजनेताओं से पहले ही संपर्क कर लिया है."
"मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी को भी इसकी जानकारी है. माधो सिंह चाहता था कि राज्य सरकार मुझे मुरैना में तैनात करे जहाँ डाकुओं की हथियार डालने की योजना थी क्योंकि उन्हें स्थानीय अफ़सरों पर भरोसा नहीं था."
"मैंने इस योजना का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया क्योंकि मेरा मानना था कि अपराध रोकने के लिए 'सरेंडर' एक उचित माध्यम नहीं हैं. इसके बावजूद मैंने मध्य प्रदेश के आईजी से बात कर माधो सिंह के प्रतिनिधि को उनसे मिलवा दिया."
जयप्रकाश नारायण ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा. उनकी प्रेरणा से दिल्ली में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई जिसमें तीनों प्रदेशों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी भाग लिया.
डाकुओं से संपर्क का काम शुरू हो गया. मध्य प्रदेश शासन ने एक इलाके को मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया ताकि डाकू बिना किसी बाधा के वहाँ पहुंच सकें.
मुक्त क्षेत्र में डाकुओं के आवागमन के लिए पुलिस कार्यवाही स्थगित कर दी गई. मध्य प्रदेश सरकार ने इस काम के लिए एक लाख रुपए और सफ़ेद रंग की चार जीपें मुहैया करवाईं.
मध्य प्रदेश सरकार ने ऐलान किया कि हथियार डालने वाले डाकुओं को ज़मीन, उद्योगों के लिए आर्थिक मदद और उनके बच्चों को सरकारी छात्रावास में रखकर पढ़ाने की गारंटी दी जाती है.
सरकार ने भी डाकुओं से कुछ शर्तें पूरी करने के लिए कहा. डाक्टर रणधीर सिंह रूहल लिखते हैं, "डाकुओं से कहा गया कि जितने बंधक उनके कब्ज़े में हैं उनको तत्काल रिहा कर दिया जाए. समर्पण करने से पहले वो डकैती, हत्या जैसे काम तुरंत बंद कर दें और समर्पण से पहले अपने हथियार किसी दूसरे को न दें."
"सरकार की तरफ़ से ये भी कहा गया कि आत्मसमर्पण करने वाले डाकुओं को फूल मालाएं नहीं पहनाई जाएंगी और न ही उनका जुलूस निकाला जाएगा. समर्पण के समय ऐसा कोई समारोह नहीं होगा जिससे उनके अपराधों को सम्मान देने का आभास हो."
आत्मसमर्पण स्थल पर भारी भीड़ जमा हुई
11 अप्रैल को जेपी अपनी पत्नी प्रभादेवी के साथ ग्वालियर के लिए चल पड़े. वो औपचारिक समर्पण से पहले 'बाग़ी सरदारों' के साथ बातचीत करके आश्वस्त होना चाहते थे.
इस काम के लिए जौरा से 15 किलोमीटर दूर पगारा स्थान को चुना गया जहाँ डाकुओं को समर्पण से पहले एकत्रित होना था. इस स्थान को इसलिए चुना गया था क्योंकि ये भीड़-भाड़ से दूर था. वहाँ एक डाक बंगला भी था जहाँ जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों को ठहराया गया था.
प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवन कुमार गर्ग लिखते हैं, "सरकार आत्मसमर्पण के समारोह को सार्वजनिक बनाने के पक्ष में नहीं थी. उसके पीछे सोच ये थी कि इससे कहीं डाकू हीरो न बन जाएं. हथियार डालने से पहले मोहर सिंह ने जेपी से मुलाकात की. जेपी ने पूछा कि उसे कुछ कहना है? मोहर सिंह का जवाब था कि उसे कुछ नहीं कहना है, 'हम तो आपके सामने हाज़िर हो गए हैं.'"
पगारा और धौरेरा में मेले जैसी भीड़ इकट्ठा हो गई थी. डाकू, उनके रिश्तेदार, आम जनता और सर्वोदयी सभी वहाँ पर जमा थे. 14 अप्रैल को मूल समारोह से पहले ही पगारा में डाक बंगले के सामने एक तंबू में डाकुओं ने जेपी के सामने आत्मसमर्पण किया.
सर्वोदयी महिलाओं ने उन्हें राखी बाँधी. जयप्रकाश नारायण ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, 'किसी को भी मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो वो उन्हें बचाने के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देंगे.'
कई डाकुओं ने हथियार डाले
14 अप्रैल को समर्पण के समारोह की शुरुआत मोहर सिंह गैंग के नारायण पंडित के बयान से हुई. डाकुओं की ओर से बोलते हुए पंडित ने कहा, 'हम बाग़ी भाइयों का सब जनता को राम राम.'
सबसे पहले मोहर सिंह और सरु सिंह मंच पर आए. उन्होंने जनता का अभिवादन किया और अपने हथियार महात्मा गांधी की मूर्ति के चरणों में रख दिए. जेपी ने मोहर सिंह को गले लगाया. उनकी पत्नी प्रभावती ने उन्हें रामायण और विनोबा के गीता प्रवचन की प्रतियाँ भेंट कीं.
पहले दिन एक एक कर 82 डाकुओं ने हथियार डाले. 16 अप्रैल को एक और आत्म समर्पण समारोह का आयोजन हुआ. इसमें माधो सिंह, माखन सिंह, जगजीत सिंह, रूप सिंह और हरविलास गिरोह के 81 बागियों ने आत्म समर्पण किया.
माधो सिंह ने वहां मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा, 'ये मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि मुझे आप लोगों के बीच अपनी ग़लती की माफ़ी मांगने का मौका मिला है.'
टाइम संवाददाता की माधो सिंह से मुलाकात
इस आत्मसमर्पण को देखने वाले टाइम मैगज़ीन के संवाददाता विलियम स्टीवर्ट अकेले अमेरिकी पत्रकार थे.
उन्होंने एक मई, 1972 की टाइम पत्रिका के अंक में लिखा, "एक घर के छोटे कमरे में हमारी मुलाकात लंबी कद-काठी वाले डाकू माधो सिंह से हुई. वो पुलिस की वर्दी में था और उसके पास एक ऑटोमेटिक राइफ़ल थी. मैंने उससे पूछा कि हथियार डालने के बारे में उसे कोई हिचकिचाहट है?"
"उसने जवाब दिया, 'हम जो भी काम करने का वादा करते हैं उसे पूरा ज़रूर करते हैं चाहे इसका मतलब हमारे लिए मौत ही क्यों न हो. कभी-कभी हमें जेल के बारे में सोच कर डर ज़रूर लगता है. लेकिन हमें याद है कि हमारे नेताओं ने भी लंबी जेल सज़ाएं काटी थीं."
माधो सिंह ने स्टीवर्ट को बताया कि जेल जाने से घबराने वाले बाग़ियों से उन्होंने कहा, "समझ लो कि तुम एक किराए के घर में रह रहे हो जहाँ तुम्हें किराया भी नहीं देना पड़ रहा है."
अगली सुबह 10 हज़ार लोगों के सामने माधो सिंह ने एक ऊँचे चबूतरे पर जयप्रकाश नारायण के सामने हथियार डालकर वहाँ मौजूद लोगों से माफ़ी माँगी थी. उसके बाद उसने वहाँ मौजूद पुलिस प्रमुख के पैर छुए थे. शाम तक 167 डाकू आत्मसमर्पण कर चुके थे.
जयप्रकाश नारायण ने टाइम पत्रिका के रिपोर्टर से कहा कि 'सब मेरे बच्चों की तरह हैं.'
छोटी सज़ाएं काटकर डाकुओं की हुई रिहाई
इस समारोह का एक और विवरण मध्य प्रदेश के पुलिस प्रमुख रहे किरपाल ढ़िल्लों ने अपनी आत्मकथा में दिया है, "समारोह के दौरान डाकुओं ने विचित्र से कपड़े पहन रखे थे. उन्होंने अपने हथियार सिर के ऊपर कर रखे थे और वो दुर्गा माता और महात्मा गांधी के नाम लेकर नारे लगा रहे थे. उन्होंने अपने हथियार महात्मा गाँधी के एक बड़े चित्र के सामने डाले."
"उन्होंने वहाँ मौजूद मुख्यमंत्री और दूसरे गणमान्य लोगों का आशीर्वाद लिया. इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. सरेंडर की शर्तों के अनुसार इन डाकुओं पर मुकदमा चलाया गया और कुछ दिनों बाद उनमें से अधिकतर डाकू छोटी सज़ाएं काट कर जेल से बाहर आ गए. कुल 66 बागियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई. इनमें से कुछ लोगों ने सज़ा के विरुद्ध उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अपील की."
ग्वालियर और सागर में 45 व्यक्ति पहली सुनवाई के बाद निर्दोष मान कर रिहा कर दिए गए. मुकदमों की गति का अंदाज़ा इस बात ले लगाया जा सकता है कि अक्तूबर, 1973 तक अदालत में प्रस्तुत 435 मुकदमों में 345 और सागर में प्रस्तुत 211 में से 115 मुकदमों में फ़ैसले हो चुके थे.
सन 1983 तक आत्मसमर्पण कर चुके सभी डाकू जेल से बाहर आ चुके थे. मोहर सिंह को 20 साल कारावास की सज़ा मिली लेकिन उन्हें आठ साल बाद सन 1980 में ही रिहा कर दिया गया. माधो सिंह ने अपनी रिहाई के बाद जादू दिखाने का काम शुरू किया और इस पेशे में वो ख़ासे लोकप्रिय भी हुए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.