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नीतीश कुमार का सीएम पद से इस्तीफ़ा, 21 साल के शासनकाल में कितना बदला बिहार?
- नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
- उन्होंने एक्स पर एक बयान जारी कर सभी का धन्यवाद किया है.
- उन्होंने कहा कि बिहार की नई सरकार को उनका 'पूरा सहयोग और मार्गदर्शन' रहेगा.
- नीतीश कुमार मार्च में बिहार से राज्यसभा के लिए चुने गए हैं. उन्होंने राज्यसभा के सांसद पद की शपथ भी ले ली है.
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
पटना से सटे फुलवारी शरीफ़ के एक एनजीओ में काम करने वाली फ़रीदा खातून अपने पूरे खानदान में सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हैं. वो पोस्ट ग्रेजुएट हैं.
मज़दूरी करने वाले फ़रीदा के परिवार ने साल 2007 में अररिया के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में उनका दाख़िला करवाया था.
फ़रीदा मूल रूप से मुस्लिम बहुल ज़िला अररिया की रहने वाली हैं, जहां 40 फ़ीसदी से ज़्यादा मुस्लिम आबादी है.
फ़रीदा बीबीसी से कहती हैं, "हम उस इलाक़े के हैं जहां लड़कियों को सिर्फ़ इस्लामिक शिक्षा दी जाती थी. लेकिन मेरा दाखिला स्कूल में कराया गया. उसके बाद यूनिफ़ॉर्म, सैनिटरी नैपकिन, साइकिल, कन्या उत्थान योजना सहित कई योजनाओं का लाभ मिला और मैं पटना यूनिवर्सिटी से पोस्टग्रेजुएशन कर सकी."
"उस वक़्त लगता था कि नीतीश कुमार लड़कियों के नेता हैं लेकिन बीते कई सालों से लगने लगा कि वो अब सिर्फ़ पॉलिटिक्स कर रहे हैं. वो धर्म पर चल रही राजनीति के एक हिस्सेदार हो गए हैं."
फ़रीदा की कही बात, दरअसल नीतीश की पॉलिटिक्स की 'ट्रैजेक्टरी' कही जा सकती है.
अब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने लोकभवन में जाकर राज्यपाल लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को इस्तीफ़ा सौंपा.
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दरअसल, साल 2000 में नीतीश कुमार सात दिन के लिए सीएम बने. लेकिन उनकी बतौर सीएम स्थायी पारी नवंबर 2005 में शुरू हुई.
उन्हें 'सुशासन बाबू' का टैग मिला. लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें 'पाला बदलने वाला' कहा गया. उन पर मीम्स बने और विश्लेषकों के एक तबके ने उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाया.
'उनके जैसा दूसरा नहीं होगा'
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फ़ैसले के बाद उनके बेटे निशांत कुमार के पटना के वीरचंद पटेल स्थित जेडीयू कार्यालय आने पर हलचल होती है.
ऐसा लगता है कि बढ़ रही गर्मी के बीच जेडीयू कार्यकर्ताओं को निशांत कुमार एक राहत की तरह दिखते हैं. लेकिन फिर भी वो उनमें 'दूसरा नीतीश' नहीं देखते.
साल 1977 में नीतीश के पहले चुनाव से उनके साथ रहे अशोक कुमार कहते हैं, "उन जैसा दूसरा ना होगा."
बिहार के दफ़्तरों को टाइपराइटर से कंप्यूटर की दुनिया में लाना नीतीश की पहली बड़ी चुनौती थी. इसमें उनका साथ दिया बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने जो ख़ुद टैब लेकर चलते थे.
सुशील मोदी नीतीश सरकार में उप-मुख्यमंत्री थे और वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण पद उनके पास था.
1982 बैच के बिहार काडर के आईएएस (रिटायर्ड) व्यास जी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बताते हैं, "नीतीश कुमार और सुशील मोदी दोनों ही बहुत शार्प थे. मैंने लालू जी के दौर में भी काम किया था. दोनों में यह फर्क़ था कि लालू नेता थे और नीतीश जबरदस्त प्रशासक."
"अपनी मीटिंग्स में वो नए विचारों का स्वागत करते थे और उनको हर विभागीय मीटिंग में ये याद रहता था कि पिछली मीटिंग में उन्होंने क्या निर्देश दिए थे. उनमें बिहार को आगे बढ़ाने की ललक दिखती थी."
समाजवादी नीतीश की 'वोट इंजीनियरिंग'
नीतीश कुमार ने सत्ता संभालने के बाद राज्य की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी किया था.
इस श्वेत पत्र में राज्य की स्थिति के बारे में लिखा था, "विकास के सभी सूचकांकों में बिहार की स्थिति सभी बड़े राज्यों में सबसे खराब है."
सत्ता संभालने के बाद नीतीश सरकार के सामने कानून-व्यवस्था के साथ ही सड़क-बिजली जैसे बुनियादी ढांचे पर काम करने की चुनौतियां थीं.
कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश कुमार को अगर बिहार में लंबे समय तक सत्ता में टिके रहना था तो उन्हें बिहार की जातीय राजनीति में अपने लिए 'वोट इंजीनियरिंग' भी करनी थी.
नीतीश ने इसके लिए महिलाओं और अति पिछड़ों को चुना.
वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह अपनी किताब 'कितना राज, कितना काज' में लिखते हैं, "नीतीश कुमार ने महिलाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण और दूसरी तरफ़ पंचायत और स्थानीय निकाय में ईबीसी हिंदू और मुसलमानों को 20 फ़ीसदी आरक्षण दिया."
"ऐसा करते ही उन्हें अपनी ही जाति के लोगों से आलोचना का सामना करना पड़ा, जिनके मुताबिक़ ईबीसी और अन्य वर्ग को फ़ायदा पहुंचाने के लिए उनकी बलि दी गई. लेकिन नीतीश तो लोहिया के उन शब्दों को गांठ बांध चुके थे कि औरत किसी भी जाति की हो, वो पिछड़ी ही है."
बाद में नीतीश सरकार ने साल 2007 में महादलित आयोग बनाया.
नीतीश कुमार के लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) समीकरण को देखें तो इनकी आबादी तकरीबन सात फ़ीसदी है, लेकिन अपनी वोट इंजीनियरिंग की मदद से नीतीश के पास 20 फ़ीसदी वोट माने जाते हैं.
'ख़ुद पर ही मुग्ध हुए'
जब नीतीश कुमार सरकार में आए तो उनकी दो योजनाओं को बदलते बिहार के रूप में देखा गया. वो थीं- यूनिफ़ॉर्म और साइकिल योजना.
ग्रामीण इलाक़ों में साइकिल से जाती स्कूल यूनिफॉर्म पहनी लड़कियों को लोगों ने बदलते बिहार के तौर पर देखा.
दरअसल ये तस्वीर दो मोर्चे पर काम कर रही थी. एक तरफ़ ये समाजवादी नीतीश का वेलफ़ेयर स्टेट होने का प्रमाण था तो दूसरी तरफ़ सार्वजनिक जगहों पर बच्चियों का यूं आना कानून-व्यवस्था में सुधार का संकेत था.
लेकिन बाद में नीतीश सरकार पर ये आरोप भी लगे कि योजनाओं को प्रभावी तरीके से ज़मीन पर उतारने के बजाए प्रचार पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा.
पंचायत स्तर पर काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता शाहीना परवीन बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "नीतीश कुमार के कार्यकाल के सात-आठ साल शानदार थे. उनकी अफ़सरों की टीम अच्छी थी. महिलाओं के लिए सरकार ने अच्छे कदम भी उठाए, लेकिन बाद में सब कुछ स्थिर हो गया."
"ऐसा लगा नीतीश कुमार अपने किए काम पर ख़ुद ही मंत्रमुग्ध होते रहे. बाद के दिनों में उन्होंने दिखावे पर काम किया. यानी वो काम जिसका प्रचार हो. उसमें टिकाऊपन कितना है, ये सरकार की चिंता नहीं रही."
वो आगे कहती हैं, "पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने से 'पॉलिटिक्स ऑफ प्रेजेंस' तो हुआ लेकिन क्या ये महिलाएं विधायक और मंत्री बनीं? आम महिलाओं के लिए भी जो काम किया गया वो उनकी पारंपरिक भूमिका को ही मजबूत करने वाले थे. यानी औरत को रोज़गार से जोड़ना है तो सिलाई मशीन बंटवा दो, पापड़-बड़ी का प्रशिक्षण करवा दो."
साल 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले जब जीविका दीदीयों को दस हज़ार रुपये की राशि रोजगार शुरू करने के लिए बांटी गई तब जेडीयू के अंदर से ही नीतीश कुमार की राजनीति में आए बदलाव पर सवाल उठ रहे थे.
जेडीयू के एक नेता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा था, "हमारे नेता तो नीतियों के ज़रिए बदलाव लाते थे, वो तो अब चुनावी रेवड़ियों का सहारा ले रहे हैं."
क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज़्म– नीतीश के 'थ्री सी'
नीतीश कुमार अपने शासनकाल में बार-बार दोहराते रहे कि वो 'थ्री सी' से कभी समझौता नहीं करेंगे. थ्री सी यानी क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज़्म.
'अनबाउंडेड-माय एक्सपेरिमेंट विद लॉ, फ़िजिक्स, पुलिसिंग एंड सुपर 30' के लेखक अभयानंद साल 2005 में बिहार पुलिस में एडीजी (मुख्यालय) थे.
अभयानंद बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताते हैं, "नीतीश जी ने सीएम पद संभालने के बाद मुझे बुलाया और कहा कि हम पुलिस का राज चाहते हैं. मैंने कहा कि कानून का राज होना चाहिए और इसके लिए हमें सरकार से नैतिक समर्थन चाहिए."
"आर्म्स एक्ट, स्पीडी ट्रायल के साथ-साथ गवाही पर बहुत काम हुआ. बाद में सैप का गठन किया गया और पुलिस जांच का आधुनिकीकरण भी हुआ. इन सब ने पुलिस की इमेज को बदला."
लेकिन बाद के दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने नीतीश सरकार की किरकिरी की.
इनमें से एक घटना साल 2015 में घटी, जब मोकामा विधायक अनंत सिंह के पटना स्थित आवास पर एक नेशनल टीवी चैनल के पत्रकार को बंधक बना लिया गया.
इसी तरह रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद उनकी शव यात्रा, उनके समर्थकों ने पटना शहर के प्रमुख स्थानों से होते हुए निकाली.
उस दिन पटना शहर का दिल कहे जाने वाले डाकबंगला चौराहा समेत अन्य प्रमुख स्थानों पर बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा हुई थी.
सामाजिक कार्यकर्ता और वकील मणिलाल कहते हैं, "उस दिन पटना की हालत देखकर लगता था कि ये राज्य दोबारा 90 के दशक की जातीय हिंसा मे चला जाएगा, अच्छी बात ये रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ."
"लेकिन उनके शासन में औरंगाबाद, छपरा, बिहारशरीफ़ में दंगे हुए. भ्रष्टाचार का आलम ये है कि बिना दिए कोई फाइल नहीं सरकती. नीतीश कुमार की जो पकड़ शासन व्यवस्था पर पहले कभी रही, वो ढीली होती गई."
कई नई योजनाएं पर ज़मीनी स्तर पर कामयाबी कम
नीतीश कुमार ने जब सत्ता संभाली तो उन्होंने अपनी सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश की. तय समय पर प्रभावी ढंग से जनता का काम सुचारू ढंग से निपटे, इसे करने के लिए जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम शुरू हुआ.
जानकारी कॉल सेंटर, आपकी सरकार आपके द्वार, बिहार लोक सेवा अधिकार जैसे कार्यक्रम बहुत उत्साह से शुरू हुए. लेकिन बाद में ये धीरे-धीरे धराशायी होते गए.
जानकारी कॉल सेंटर, सूचना के अधिकार से जुड़ा कॉल सेंटर है जो साल 2007 में शुरू हुआ था.
आरटीआई एक्टिविस्ट शिवप्रकाश राय बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "बहुत जोर-शोर से शुरू हुआ जानकारी कॉल सेंटर बंद हो गया. एक-एक अपील की सुनवाई में कई साल लग जाते हैं जबकि आरटीआई टाइम बाउंड है. जवाबदेही ख़त्म हो गई है और आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या, उन्हें डराना धमकाना और झूठे केस में फंसाना आम बात हो गई है."
शाहीना परवीन कहती हैं, "सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम किया लेकिन अगर अच्छे टीचर या डॉक्टर नहीं हैं तो इसका कोई फ़ायदा नहीं. दूसरा ये कि नीतीश कुमार ने भी पीपीपी मॉडल पर ही काम करना शुरू कर दिया, जिसने पूरे सिस्टम को प्राइवेटाइजेशन की तरफ़ धकेल दिया है. ये सब नीतीश के शुरुआती दौर से अलग था."
बिजली-सड़क में सुधार
साल 2006 में जारी श्वेत पत्र के मुताबिक़ बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली खपत उस वक़्त महज 60 किलोवाट प्रति घंटा थी. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक़ 2011-12 में प्रति व्यक्ति खपत 134 किलोवाट प्रति घंटा हुई जो 2025-26 में बढ़कर 374 किलोवाट हो गई.
ग्रामीण सड़कों की बात करें तो साल 2005-06 में जो महज़ 835 किलोमीटर बनी थी, वो अब 1,19,067 किलोमीटर बन गई. गांव और शहर में सड़कों का जाल बिछा. पुल-पुलिया, फ्लाईओवर के निर्माण में गति आई.
हालांकि ये अब भी नीतीश कुमार के उस दावे से दूर है जिसमें वो कहते हैं कि बिहार के किसी भी कोने से पटना महज पांच घंटे में पहुंच जाएंगे.
नीतीश सरकार भूमि सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, रोजगार और उद्योग के मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी.
भूमि सुधार को लेकर नीतीश सरकार ने डी बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी. वहीं कॉमन स्कूल सिस्टम को लेकर मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में कमीशन बना था.
एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डी एम दिवाकर कहते हैं, "मैं नीतीश कुमार की मंशा पर सवाल नहीं उठाता लेकिन वो ये दोनों रिपोर्ट लागू नहीं करवा पाए. उनकी सरकार में प्राइवेट संस्थान खुले और पब्लिक इंस्टीट्यूशन बर्बाद होते रहे."
"सरकार आने के बाद जिस तरह से पंचायत के स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति हुई उसने शिक्षा की गुणवत्ता को बहुत कमजोर किया."
वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव कहते हैं, "बिहार सरकार असल में ठेकेदारों की सरकार बन गई है. आप जो फ्लाईओवर शहर में देखते हैं वो अपर मिडिल क्लास की ज़रूरतों को पूरा करती है. हाशिए पर जो बिहारी समाज है उसके लिए क्या है?"
"सरकार कागजों में जिस ग्रोथ के बारे में कहती है वो कंस्ट्रक्शन सेक्टर की है. उद्योग, रोजगार, पलायन के मुद्दे पर सरकार असफल रही है. जबकि ये बिहार के सबसे ज़रूरी मुद्दे हैं. सारे विकास सूचकांकों में अब भी हम सबसे नीचे हैं."
पाला बदलते नीतीश
साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को बंपर जीत मिली थी. इसे 243 में 206 सीट मिली थी, जिसमें अकेले जेडीयू को 115 और मुख्य विपक्षी दल आरजेडी को महज़ 22 सीटें मिलीं.
लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार को लेकर असहज नीतीश ने बीजेपी का साथ छोड़कर साल 2015 का विधानसभा चुनाव आरजेडी और कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाकर लड़ा.
साल 2015 में बिहारियों के डीएनए सैंपल दिल्ली भेजकर नीतीश ने अपना विरोध जताया था.
बाद में वो फिर साल 2017 में बीजेपी के साथ गठबंधन में आए. साल 2022 में नीतीश कुमार ने फिर से आरजेडी-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन 2024 में यह गठबंधन तोड़ दिया.
तब से उनकी पार्टी जेडीयू और बीजेपी साथ हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश बार-बार ये दोहराते रहे कि उन्होंने आरजेडी के साथ जाकर दो बार ग़लती की है, लेकिन अब कहीं नहीं जाएंगे.
कभी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए लड़ाई लड़ने वाले नीतीश अब विशेष पैकेज पर मान गए हैं.
कभी बिहार दिवस का भव्य आयोजन करके 'बिहारियत' और बिहारी होने को 'गर्व' से जोड़ने वाले नीतीश अब कमजोर पड़ चुके हैं. जब नीतीश ने बिहार का शासन संभाला था तब उनकी उम्र 54 साल थी, अब वो 75 पार कर चुके हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.