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'चाहे कुछ हो बेटे को युद्ध में शामिल नहीं होने दूंगी' बच्चों की ज़िंदगी में दहशत भर रही ईरान जंग
- Author, फ़र्गल कीन
- पदनाम, विशेष संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
युद्ध अब उसके दिमाग़ के अंदर चल रहा है. ज़ोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ या बर्तन गिरने की खनक से भी वह चौंककर उछल जाता है. संघर्ष-विराम भी इन हालात को नहीं बदल पाया है.
अली कहते हैं, "युद्ध से पहले मुझे बिल्कुल तनाव नहीं था. लेकिन अब ज़रा सी आवाज़ पर भी मेरा दिमाग़ बहुत बुरी तरह रिएक्ट करता है."
हालांकि अली (बदला हुआ नाम) की उम्र सिर्फ़ 15 साल है, फिर भी वह समझते हैं कि अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हवाई हमलों की आवाज़ों से पैदा हुआ डर कैसे मन में बस जाता है और फिर पीछा नहीं छोड़ता. किसी भी तेज़ आवाज़ पर अपने आप चौंक जाने वाली यह प्रतिक्रिया सक्रिय हो जाती है.
वह कहते हैं, "धमाकों की आवाज़, धमक से होने वाला कंपन और शहर के ऊपर से उड़ते फ़ाइटर जेट्स की आवाज़ बहुत गंभीर असर डाल सकती है."
ईरान की आबादी का 20 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है, यानी लगभग 2 करोड़ 4 लाख बच्चे. अली और उसके जैसे कई और बच्चों के साथ जो हो रहा है, उसे मनोवैज्ञानिक 'हाइपर अराउज़ल' कहते हैं, और यह पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीडीएलडी) की शुरुआती चेतावनी हो सकती है.
आस-पास जो कुछ हो रहा है अली उस पर अपने माता-पिता की प्रतिक्रियाओं को देखते और महसूस करते हैं. वह घर के भीतर मिलने वाली उस जानी-पहचानी सुरक्षा को ढूंढते हैं, मगर वह नहीं मिल पाती. उनके पिता युद्ध की वजह से बेरोज़गार हैं और मां हर समय डरी सहमी रहती हैं.
वह कहते हैं, "मेरी मां घर पर ही रहती हैं, और जैसे ही फाइटर जेट्स ऊपर से उड़ते हैं, वह डर जाती हैं, तनाव में आ जाती हैं. चिंता और डर उन पर साफ़ दिखते हैं. और अपनी बात करूं तो मैं खुद भी बहुत डरा हुआ हूं."
"मेरा अपने दोस्तों से कोई संपर्क नहीं है… मुझे पढ़ाई करने के, काम करने के काबिल होना चाहिए और आगे चलकर एक आत्मनिर्भर इंसान बनना चाहिए. मुझे लगातार राजनीति की चिंता नहीं करनी चाहिए, तनाव में जीना नहीं चाहिए, बम गिरने के ख़यालों में नहीं डूबा रहना चाहिए… अंतहीन डर के साथ."
बहुत सारे माता-पिता हैं चिंतित
बच्चों की दुनिया सिमट कर रह गई है.
स्कूल बंद हैं, संघर्ष-विराम से पहले तक अमेरिका और इसराइल के विमानों से हमले का डर लगातार बना रहा, और सड़कों पर सरकार की मिलिशिया गश्त कर रही है, ऐसे में ईरानी परिवार अपने ही घरों में कैद होकर रह गए हैं. करने को कुछ नहीं है, बस इंतज़ार करना है और उम्मीद करनी है कि संघर्ष-विराम बना रहे.
पूरे इलाक़े में, ईरान से लेकर इसराइल, खाड़ी देशों और लेबनान तक, यह युद्ध बच्चों और युवाओं की ज़िंदगी में डर भर रहा है.
ज़मीन पर मौजूद भरोसेमंद सूत्रों की मदद से बीबीसी माता पिता और उन लोगों की गवाहियां हासिल कर पाया है जो बच्चों को युद्ध के सदमे से उबरने में मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. सुरक्षा कारणों से कुछ नाम बदल दिए गए हैं.
तेहरान के एक मानवाधिकार केंद्र में आयशा (जिनका नाम भी बदल दिया गया है) फ़ोन पर एक परेशान मां को सलाह दे रही हैं.
वह कहती हैं, "मैंने जो बातें आपको बताई थीं, उन्हें अपनाने की कोशिश कीजिए ताकि उस (बच्चे) के लिए ज़्यादा शांत माहौल बन सके. अगर मुमकिन हो तो उसके साथ खेलिए और उसे व्यस्त रखिए. और अगर तब भी हालात नहीं सुधरते, तो उसे वापस केंद्र लेकर आइए."
आयशा बताती हैं कि परेशान और चिंतित बहुत से माता-पिता इस केंद्र में फोन कर रहे हैं और लोग खुद आकर भी मिल रहे हैं.
"हमें काफ़ी मामले नींद पूरी न होने के, डरावने सपने आने के, एकाग्रता में कमी और यहां तक कि आक्रामक व्यवहार के भी दिख रहे हैं.
"जब आप किसी बच्चे को पालने पोसेने के लिए इतनी जद्दोजहद करते हैं, और अंत में वही बच्चा- चाहे प्रदर्शनों में या ऐसे युद्ध में- मारा जाता है, तो मेरा मानना है कि कोई भी माता पिता इस दुनिया में किसी बच्चे को लाने के लिए तैयार नहीं होगा."
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (एचआरएएनए) पूरे ईरान से आंकड़े जुटाती है. उसके अनुसार इस युद्ध में 3,636 लोग मारे गए हैं. इनमें कम से कम 254 बच्चे शामिल हैं. इसके अलावा, घायल होने वालों की संख्या भी हज़ारों में है.
ईरानी शासन पर आरोप
कहा जा रहा है कि ईरानी शासन की ओर से बच्चों को सीधे ख़तरे में झोंकने की भी एक संगठित कोशिश की गई है. सरकार ने माता पिता से अपील की है कि वे अपने बच्चों को बसीज स्वयंसेवी मिलिशिया में शामिल होने की इजाज़त दें, जो राज्य की ताक़त लागू करने वाला एक अहम अंग है, ताकि वे नाकों की निगरानी में मदद कर सकें.
टीवी पर दिए गए एक भाषण में शासन से जुड़े एक व्यक्ति ने माता-पिता से कहा, "अपने बच्चों का हाथ पकड़िए और सड़कों पर निकल आइए."
उस शख़्स ने इस युद्ध को लड़कों के लिए मर्दानगी की परीक्षा बताया. उसने कहा, "क्या आप चाहते हैं कि आपका बेटा मर्द बने? उसे महसूस करने दीजिए कि वह युद्धभूमि में एक हीरो है, लड़ाई का नेतृत्व कर रहा है. मांओं, पिताओं, अपने बच्चों को रात में बैरिकेड्स पर भेजिए. ये बच्चे मर्द बन जाएंगे."
11 साल के अलीरेज़ा जाफ़री के लिए हथियार उठाने की यह अपील मौत साबित हुई. 29 मार्च को तेहरान में वह अपने पिता के साथ एक चेकपाइंट पर ड्यूटी पर था, जब एक ड्रोन हमले में उसकी मौत हो गई.
एक स्थानीय अख़बार ने उसकी मां, सदाफ़ मोनफ़रेद के हवाले से लिखा कि बेटे ने उनसे कहा था कि वह "शहीद बनना चाहता है."
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ईरानी अधिकारियों पर आरोप लगाया है कि वे बच्चों को सैन्य सेवा में भर्ती करके "बच्चों के अधिकारों को कुचल रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून का गंभीर उल्लंघन कर रहे हैं, जो युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है."
ईरान के सुरक्षा क़ानूनों के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों की भर्ती की अनुमति है, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून का सीधा उल्लंघन है.
'किसी भी हाल में बेटे को जंग में शामिल नहीं होने दूंगी'
तेहरान की एक निवासी, जिसे हम नूर कह रहे हैं, का एक बेटा है जिसकी किशोरावस्था शुरू ही हुई है. वह कसम खाती हैं कि अपने बेटे को सेना से दूर ही रखेंगी.
वह कहती हैं, "12 साल का बच्चा कभी भी सही फ़ैसले नहीं ले सकता. वास्तव में उसे समझ ही नहीं आ रहा होता कि क्या हो रहा है. मुमकिन है कि वह इसे किसी तरह का खेल समझ ले."
"जब बच्चों को हथियार थमा दिए जाते हैं और कहा जाता है कि जाओ, युद्ध करो, तो वे सोचते हैं कि जैसे कोई वीडियो गेम खेल रहे हों… और अगर कोई बच्चा उस रास्ते पर चला जाता है, तो फिर वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं होता."
युद्ध शुरू होने के पांच हफ़्ते बाद नूर अपने बेटे को तेहरान से बाहर ले गईं. वह उनका इकलौता बच्चा है.
वह कहती हैं, "मैं कभी भी, किसी भी हाल में अपने बेटे को युद्ध में शामिल होने नहीं दूंगी. बच्चों का इस तरह इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?
"लगभग एक महीने पहले जैसे ही लड़ाई शुरू हुई, मैंने सबसे पहला काम यही किया कि शहर छोड़ दिया, क्योंकि मैं तनाव में थी और मुझे डर था कि मेरा बेटा कहीं सड़कों पर निकल न जाए और उसके साथ कुछ हो न जाए, युद्ध में भेजने की तो बात ही अलग है."
फ़िलहाल उम्मीद यही है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत किसी स्थायी संघर्ष-विराम तक पहुंच जाए.
लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता है, तब भी बमबारी से हुई हिंसा, बचपन का सैन्यीकरण और सुरक्षा के एहसास के खो जाने से बच्चों के दिमाग़ और शरीर पर जो नुकसान हुआ है, उसका असर आने वाले लंबे समय तक बना रहेगा.
ऐलिस डोयार्ड की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.