सीज़फ़ायर टिके या न टिके, मध्य पूर्व में बदलाव अभी अधूरा है

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

सीज़फ़ायर के बाद पाकिस्तान में बातचीत के लिए सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि अमेरिका और ईरान, दोनों के पास युद्ध रोकने की ठोस वजह है.

उनकी सफलता में सबसे बड़ी रुकावट है, भरोसे की कमी और कोई स्पष्ट साझा आधार न होना. इसके साथ ही यह तथ्य कि इस युद्ध में अमेरिका के पूर्ण सहयोगी इसराइल ने लेबनान पर अपने हमले बहुत ज़्यादा तेज़ कर दिए हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जीत की घोषणा कर दी है और अब उन्हें इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता चाहिए.

ट्रंप के सामने इस महीने के आख़िर में किंग चार्ल्स की राजकीय यात्रा है, उसके बाद मई में ट्रंप का चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक शिखर सम्मेलन भी है. साथ ही नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी होने हैं.

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अमेरिका में गर्मियों की छुट्टियों का मौसम नज़दीक आ रहा है, ऐसे में ट्रंप यह भी चाहते हैं कि पेट्रोल की कीमतें फिर से वहीं पहुँच जाएँ जहाँ वे युद्ध शुरू होने से पहले थीं. शाही यात्राएँ, शिखर सम्मेलन और चुनाव ये सब उनके लिए युद्ध के साथ ठीक नहीं बैठते.

ईरान की सरकार के पास युद्ध ख़त्म करने के अपने कारण हैं. हालाँकि ईरान अब भी मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करने में सक्षम है, और उसके सोशल मीडिया वॉरियर्स एआई वीडियो बनाकर डोनाल्ड ट्रंप का मज़ाक उड़ा रहे हैं.

ईरान को भी इस युद्ध में भारी नुक़सान हुआ है. शहरों की अर्थव्यवस्था ठप पड़ गई है और सरकार को फिर से मज़बूत होने के लिए समय चाहिए. उसकी कोशिश पाकिस्तान में होने वाली बातचीत का इस्तेमाल अपनी स्थिति को मज़बूत करने की होगी.

इस बातचीत में दोनों प्रतिनिधिमंडलों के बीच संदेश पहुँचाने वाले पाकिस्तानी मध्यस्थ के सामने एक मुश्किल काम होगा. दोनों पक्षों के घोषित रुख़ एक-दूसरे से इतने अलग हैं कि उनके बीच कोई तालमेल बिठाना लगभग नामुमकिन लगता है.

ट्रंप के पास एक 15-सूत्रीय योजना है जिसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन लीक हुए दस्तावेज़ों को देखकर ऐसा लगता है कि यह बातचीत का आधार होने के बजाय ईरान के आत्मसमर्पण का दस्तावेज़ ज़्यादा है.

जबकि ईरान की 10-सूत्रीय योजना में ऐसी मांगों की एक सूची है जिन्हें अमेरिका ने अतीत में लगातार ख़ारिज किया है.

इस संघर्षविराम को ज़्यादा टिकाऊ रखने के लिए किसी ऐसे समझौते की ज़रूरत होगी, जिससे कम-से-कम दोनों पक्षों के बीच मौजूद उन पेचीदा मुद्दों की परस्पर विरोधी सूचियों पर बातचीत जारी रखी जा सके.

शांति के समय में भी इन मुद्दों को सुलझाना काफ़ी मुश्किल होता.

युद्ध के दौर में जब दोनों पक्षों के बीच किसी भी तरह का आपसी भरोसा न हो तो बड़े मुद्दों पर कोई सहमति न होने के बावजूद संघर्ष-विराम को जारी रखने के लिए इस स्थिति को भी सकारात्मक ही माना जाएगा.

अगर कोई समझौता बिल्कुल नहीं होता, तो इसका मतलब होगा कि हम वापस युद्ध की राह पर लौट रहे हैं.

उनके सामने सबसे नई और सबसे ज़रूरी समस्या होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने की है, जो खाड़ी से बाहर निकलने का एक संकरा रास्ता है.

इसे बंद रखने से ईरान को दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से काबू पाने का मौक़ा मिल जाता है.

इस जलमार्ग को फिर से खोलना अब दोनों पक्षों के बीच बातचीत का मुख्य मुद्दा बन गया है.

इस संघर्ष में फंसे मध्य पूर्व के लाखों आम नागरिक उम्मीद करते हैं कि यह बातचीत इस युद्ध का अंत साबित होगी.

जीत का कोई परेड नहीं

28 फ़रवरी को इसराइल के साथ मिलकर अमेरिका ने बड़े हवाई हमलों के साथ युद्ध शुरू किया था. इन हमलों में कई अन्य लोगों के साथ-साथ ईरान के सर्वोच्च नेता, उनकी पत्नी और उनके परिवार के अन्य सदस्य भी मारे गए थे.

अमेरिकियों को यह उम्मीद नहीं थी कि अप्रैल की शुरुआत में उन्हें सीज़फ़ायर (युद्धविराम) की बातचीत में बैठना पड़ेगा.

ट्रंप को इस युद्ध में जल्द ही जीत की उम्मीद थी. जैसे जनवरी में अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी के चौंका देने वाले अपहरण का एक ईरानी संस्करण हो.

दोनों पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज़्म के आरोप में मुक़दमा चल रहा है, और अमेरिका ने उनके पूर्व डिप्टी को वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति भवन में बिठा दिया है.

यह उम्मीद कि युद्ध के शुरुआती हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता, आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई को मार गिराने से वहाँ की सत्ता ढह जाएगी, पूरी तरह से ग़लत साबित हुई.

उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को उनका उत्तराधिकारी बनाने के बाद से देखा नहीं गया है. ऐसी अटकलें हैं कि जिस हमले में उनके माता-पिता, कथित तौर पर उनकी बहन, उनकी पत्नी और उनके बेटों में से एक मारे गए थे, उसमें मोजतबा भी गंभीर चोटें आई थीं.

नए सर्वोच्च नेता की सक्रिय भागीदारी के साथ हो या उसके बिना, ईरान की सत्ता ने जिस ज़बरदस्त मज़बूती और युद्ध के सामने टिके रहने की क्षमता का प्रदर्शन किया है, उसने ट्रंप को हैरान कर दिया है.

अब उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिनिधि को उन विरोधियों के साथ बातचीत करनी होगी, जिन्हें उन्होंने हराने का (ग़लत) दावा किया था. जैसा कि अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा था, "एक 'V' अक्षर वाली बड़ी सैन्य जीत."

होर्मुज़ स्ट्रेट का मुद्दा

अमेरिका और इसराइल ने जिस युद्ध को शुरू किया है, वह पहले से ही मध्य पूर्व की जियोपॉलिटिक्स को बदल रहा है. जैसे-जैसे इस युद्ध के लंबे समय तक चलने वाले नतीजे सामने आएंगे, यह प्रक्रिया और भी गहरी होती जाएगी.

अमेरिका और इसराइल ने ईरान की सेना के साथ-साथ उसके सैन्य और नागरिक बुनियादी ढांचे को भी भारी नुक़सान पहुँचाया है. हालाँकि इन हमलों में भले ही ईरानी शासन को चोट पहुँची हो, लेकिन वह अभी भी बरकरार है और शासन में कोई बदलाव नहीं हो रहा है.

ईरान के पास अभी भी मिसाइलें और ड्रोन लॉन्च करने की क्षमता है. इसका मतलब यह है कि बड़े-बड़े दावों के बावजूद, अमेरिका और इसराइल अपनी सामरिक जीतों को रणनीतिक बढ़त में नहीं बदल पाए हैं.

दूसरी ओर, ईरान ने यह दिखा दिया है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने से उसे एक ऐसी रणनीतिक बढ़त मिलती है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने या तो नज़रअंदाज़ कर दिया था या फिर समझा ही नहीं था.

खासकर तब, जब वे ईरानी प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की ईरान के साथ युद्ध छेड़ने की दलीलों को सुन रहे थे.

यह कोई हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए थी कि जब ईरान पर हमला हुआ, तो उसने होर्मुज़ स्ट्रेट को ब्लॉक कर दिया. ईरान ने पहले भी ऐसा करने की धमकी दी है. 1980 के दशक में इस्लामिक गणराज्य के शुरुआती सालों में इराक़ के साथ युद्ध के दौरान उसने होर्मुज़ स्ट्रेट में तेल की शिपमेंट में रुकावट डाली थी.

दशकों से होर्मुज़ के बंद होने के असर को लेकर वॉर-गेमिंग करना उन सभी देशों के विदेश और रक्षा मंत्रालयों की प्लानिंग का एक आम हिस्सा रहा है, जो इस समुद्री रास्ते से होकर गुज़रने वाली शिपिंग पर निर्भर हैं.

इन देशों में अमेरिका भी शामिल है. लेकिन इस बात ने भी डोनाल्ड ट्रंप को एक नासमझी भरे युद्ध में कूदने से नहीं रोका.

जब तक अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला नहीं किया था, तब तक दुनिया के 20% तेल और गैस को ले जाने वाले जहाज़ हर दिन इस स्ट्रेट से गुज़रते थे.

वे पेट्रोकेमिकल उद्योगों के अन्य ज़रूरी उत्पाद भी ले जाते थे, जिनका इस्तेमाल खेती के लिए खाद और सेमीकंडक्टर जैसे हाई-टेक उत्पादों को बनाने में होता है. आज जब दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था आपस में जुड़ी हुई है तो इस जलडमरूमध्य को ब्लॉक करने का असर कई गुना बढ़ जाता है. शायद उससे भी कहीं ज़्यादा, जितनी उम्मीद ईरान के नेताओं ने की थी.

दुनिया की सबसे ज़रूरी व्यापारिक मार्गों में से एक के ज़रिए शिपिंग रोकने की क्षमता एक बहुत ही असरदार हथियार है, जिसे ईरान लंबे समय तक चलने वाले रणनीतिक फ़ायदे में बदलना चाहता है.

इस इलाक़े में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने, युद्ध से हुए नुक़सान की भरपाई, यूरेनियम संवर्धन को फिर से शुरू करने और पाबंदियों को हटाने की मांगों के साथ ही, ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट पर अपने नियंत्रण को संस्थागत बनाना चाहता है.

इस स्ट्रेट पर कोई समझौता करना उतना ही मुश्किल होगा जितना कि ईरान की परमाणु क्षमताओं पर चर्चा करना. ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मक़सद दुश्मनों को रोकने के लिए ज़्यादा विकल्प तैयार करना था, चाहे वे समृद्ध यूरेनियम को बम में बदलने का कदम उठाते या नहीं.

अब यह स्पष्ट हो गया है कि होर्मुज़ को बंद करना कहीं ज़्यादा सस्ता है. यह पड़ोसी और दुश्मन देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए संभावित रूप से तबाह करने वाला है, और इसे बंद करना कहीं ज़्यादा आसान है.

पहले से तय दो हफ़्ते के संघर्ष-विराम के दौरान, ईरान इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि जो भी जहाज़ होर्मुज़ से गुज़रना चाहेगा, उसे ईरान की सेना से इजाज़त लेनी होगी, वरना उस पर हमला करके उसे तबाह कर दिया जाएगा.

उसने उन कुछ जहाज़ों से टोल के तौर पर लाखों डॉलर वसूले हैं, जिन्हें यहां से गुज़रने की इजाज़त दी गई है. अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो वह अरबों डॉलर जुटा सकता है; यह एक ऐसी संभावना है जिससे खाड़ी के अरब देश दहशत में हैं.

दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियों को दोगुना करने के लिए, यमन में ईरान के सहयोगी, हूती विद्रोहियों ने ग़ज़ा युद्ध के दौरान यह दिखा दिया कि वे अपनी मारक क्षमता का इस्तेमाल करके बाब अल-मंदेब को रोक सकते हैं.

यह लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है. सऊदी अरब उस तेल को, जिसे आम तौर पर खाड़ी और होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते निर्यात किया जाता है, एक पाइपलाइन के ज़रिए अपने लाल सागर बंदरगाहों तक पहुँचा रहा है. यहां से उसे एशिया भेजा जा सकता है.

अगर हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब के रास्ते दक्षिण की ओर जाने वाले मार्ग को रोक देते हैं, तो यह प्रक्रिया भी रुक जाएगी.

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई युद्ध की शुरुआत में इसराइल के हाथों मारे गए थे. वो अमेरिका, इसराइल और पश्चिमी देशों के प्रति अपनी कट्टरपंथी शंका को सावधानी के तौर पर अपनी साख के साथ मिलाकर चलते थे.

उनके बाद अब जो युवा लोग, जिनमें से ज़्यादातर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से हैं, वो सत्ता की बागडोर संभाल रहे हैं.

ये लोग आयतुल्लाह के विचारों से तो सहमत हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि उनमें 'पहले इंतज़ार करो और फिर देखो' जैसे उनके गुण भी हों.

उनके लिए तो महज़ ज़िंदा बच जाना ही जीत के बराबर है. एक ऐसा दावा जिसे इस शासन के मुखपत्रों ने बड़े ज़ोर-शोर से प्रचारित किया है. अब, शायद उन्हें युद्ध में जो कुछ भी गंवाना पड़ा था, उसे फिर से खड़ा करने का मौक़ा भी मिल जाए.

नेतन्याहू की महत्वाकांक्षा

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की छवि भी काफ़ी सतर्क रहने वाले नेता की थी.

भले ही उन्होंने सालों तक आक्रामक बयानबाज़ी की हो, लेकिन 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद यह बदल गया.

अब उन्होंने युद्ध की नीति अपना ली है. उन्होंने इसराइलियों से बार-बार वादा किया है कि वे उनकी बेजोड़ ताक़त और सूझबूझ का इस्तेमाल करके मध्य-पूर्व को इस तरह से बदल देंगे, जिससे उनका देश और ताक़तवर हो जाएगा.

नेतन्याहू के अपने लक्ष्यों को पाने के लिए अपनाए गए आक्रामक रवैये ने इसराइल को एक ऐसा देश बना दिया है, जिसे उसके पड़ोसी इस पूरे क्षेत्र में सबसे ज़्यादा अशांति फैलाने वाली ताक़त के तौर पर देखते हैं.

नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक जीवन का एक अहम मक़सद रहा है ईरान की उस क्षमता को पूरी तरह से ख़त्म करना, जिससे वह सीधे तौर पर या अपने सहयोगियों और प्रॉक्सी ताक़तों के ज़रिए इसराइल को धमका सकता है.

भले ही ट्रंप ईरान पर बमबारी रोकने की मांग क्यों न करें, लेकिन ईरान के लेबनानी सहयोगी हिज़्बुल्लाह पर लगातार हमले जारी रखने की नेतन्याहू की ज़िद, पाकिस्तान में चल रही संघर्षविराम की बातचीत को भी पटरी से उतार सकती है.

बेरूत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, संघर्ष-विराम के पहले ही दिन इसराइल ने लेबनान पर ज़बरदस्त हवाई हमले किए, जिनमें 300 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई.

इसके बाद, ईरान ने अमेरिकियों से कहा कि उनके पास एक ही विकल्प है – युद्धविराम या फिर से युद्ध. इसराइली प्रेस ने बताया कि ट्रंप ने नेतन्याहू से संयम बरतने को कहा.

उन्होंने लेबनान के साथ सीधी बातचीत के अनुरोध को मान लिया, लेकिन साथ ही और हवाई हमले करने का आदेश भी दिया.

ईरान और पाकिस्तान का कहना है कि यह युद्धविराम लेबनान पर भी लागू होता है. जबकि इसराइल और अमेरिका का कहना है कि ऐसा नहीं है. हालाँकि इन हालात से चिंतित ब्रिटेन और अन्य देशों का कहना है कि 'ऐसा होना चाहिए'. इन देशों के पास इलाक़े में हो रही घटनाओं को प्रभावित करने के बहुत कम तरीके हैं.

पाकिस्तान में बातचीत की शर्तों को लेकर जो भ्रम है, वह ट्रंप के युद्ध के लक्ष्यों को लेकर मौजूद भ्रम को ही दिखाता है.

इसराइल का कहना है कि वह हिज़्बुल्लाह को निशाना बना रहा है. जबकि ज़्यादातर लेबनानी लोगों का मानना है कि असल में वह लेबनान को ही निशाना बना रहा है, क्योंकि अब उसने देश के दक्षिणी हिस्से में एक बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लिया है.

इसराइल ने हज़ारों लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया है, और कुछ मामलों में तो वह उनके घरों को तबाह भी कर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे उसने ग़ज़ा के एक बड़े हिस्से को मलबे में बदल दिया था.

इस युद्ध के दूरगामी नतीजे पूरे मध्य पूर्व और उससे भी आगे तक महसूस किए जाएँगे. खाड़ी देशों के अमीर अरब राजघरानों ने ख़ुद को व्यापार, पर्यटन और हवाई यात्रा के वैश्विक केंद्र बनाने में सालों और अरबों डॉलर ख़र्च किए हैं.

ईरानी हमलों के कुछ ही हफ़्तों ने आधुनिकीकरण और विकास की उस रणनीति को गहरा और लंबे समय तक रहने वाला नुक़सान पहुँचाया है.

वे अमेरिका के साथ अपने गठबंधन पर भी फिर से विचार कर रहे हैं. वे अमेरिका से अपने संबंध नहीं तोड़ेंगे क्योंकि उन्हें अमेरिकियों की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. लेकिन वे अपनी भविष्य की सुरक्षा के लिए दूसरे विकल्प भी तलाश रहे हैं.

उनके लिए अमेरिका के जितना हो सके क़रीब रहने का पुराना मॉडल काम नहीं आया है.

जबकि चीन और रूस इस पूरे घटनाक्रम पर क़रीब से नज़र रखे हुए हैं. क्योंकि ट्रंप एक बार फिर नेटो सहयोगियों को धमकी दे रहे हैं. ट्रंप का आरोप है कि जब अमेरिका को उनकी ज़रूरत थी, तब वे वहाँ मौजूद नहीं थे.

चीन ने ईरानियों पर युद्धविराम के लिए राज़ी होने का दबाव डाला और संभावना है कि वह उन्हें बातचीत जारी रखने के लिए दबाव डालता रहेगा.

वह मध्य पूर्व के तेल पर निर्भर है. ईरान ने अपने उन टैंकरों को होर्मुज़ से गुज़रने दिया है जो चीन जा रहे थे. लेकिन वह ट्रंप की बेतरतीब विदेश नीति से पैदा हुई किसी भी कमी का फ़ायदा उठाने के लिए भी तैयार रहेगा.

और ईरान के लोगों का क्या? शासन के बारे में उनके विचार चाहे कुछ भी हों, लेकिन हफ़्तों तक चले हवाई हमलों, मौत और डर के माहौल के बाद, इंटरनेट बंद होने की वजह से उनका बाहरी दुनिया से संपर्क टूट गया है.

28 फ़रवरी को ट्रंप और नेतन्याहू ने शासन के विरोधियों से वादा किया था कि उन्हें अपना देश वापस पाने का मौक़ा दिया जाएगा. उस वादे को अब भुला दिया गया है.

सीज़फ़ायर से ठीक पहले तक डोनाल्ड ट्रंप ईरान में सरकार के विरोधियों को सुरक्षा देने के वादों से हटकर सभी ईरानियों पर बमबारी करके उन्हें "स्टोन एज" में वापस पहुँचाने की बात कर रहे थे.

अब उन्हें भविष्य के बारे में पक्के तौर पर बस यही यकीन है कि यह मुश्किल होगा.

जिस सरकार ने क़रीब पचास साल से ईरानियों की ज़िंदगी को कंट्रोल किया है, वह अपनी ताक़त और ईरान के इस्लामिक सिस्टम के सामने आने वाली किसी भी चुनौती को कुचलने के लिए पहले की तरह ही ताक़तवर, गुस्से और पक्के इरादे वाली है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.