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गुजरात: पोरबंदर में पहली बार शराब की दुकान को मंज़ूरी, गांधीवादियों और स्थानीय लोगों ने क्या कहा?
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
गुजरात का पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्म स्थान है. इस शहर में पहली बार एक शराब की दुकान खुल रही है, जहां सरकारी परमिटधारक शराब ख़रीद सकेंगे.
पोरबंदर के लॉर्ड्स होटल की शराब की बिक्री से जुड़ी दो साल पुरानी अर्ज़ी को गुजरात के गृह विभाग ने मंज़ूरी दे दी है.
इस मंज़ूरी के बाद पोरबंदर ज़िले में रहने वाले और शराब का परमिट रखने वाले लोग वहाँ से शराब ख़रीद सकेंगे. गुजरात में पर्यटक, स्वास्थ्य कारणों से शराब का सेवन करने वाले लोगों और कॉरपोरेट इवेंट में हिस्सा लेने वालों को राज्य में शराब पीने के लिए ख़ास तरह के परमिट जारी होते हैं.
पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्मस्थान है. महात्मा गांधी शराबबंदी के पक्ष में थे और उनके विचारों की वजह से ही गुजरात में शराबबंदी का क़ानून लागू किया गया था.
कुछ लोग इसे 'रूटीन प्रक्रिया' बता रहे हैं तो कई लोग इससे नाराज़ भी हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने कई लोगों से बात करके यह जानने की कोशिश की कि पोरबंदर में शराब बेचने को मंज़ूरी पर उनकी क्या राय है.
गौर करने वाली बात यह भी है कि गुजरात के अलग अलग इलाक़ों में शराब पकड़े जाने की ख़बरें लगातार मीडिया में आती रहती हैं.
गुजरात विधानसभा में भी राज्य सरकार ज़िलेवार शराब से जुड़े आंकड़े पेश करती है. हाल ही में राज्य सरकार ने सदन में बताया था कि पिछले दो साल में पुलिस ने पूरे राज्य से अवैध ढंग से बेची जा रही कुल 42 करोड़ रुपये की शराब ज़ब्त की है.
गुजरात में शराब को लेकर क़ानून क्या कहता है?
गुजरात में शराबबंदी का क़ानून मुख्य रूप से गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 के तहत लागू है.
इस क़ानून के मुताबिक राज्य में शराब का उत्पादन, बिक्री, ख़रीद, भंडारण, परिवहन और सेवन आम तौर पर प्रतिबंधित है. राज्य में शराब की बिक्री और सेवन के लिए सरकार लाइसेंस, परमिट या कोई विशेष अनुमति जारी करती है.
इसी एक्ट की धारा 11 और 12 के अनुसार शराब की बिक्री या सेवन केवल क़ानूनी अनुमति के आधार पर ही की जा सकती है.
यानी गुजरात में शराब की पूरी तरह खुले तौर पर बिक्री की इजाज़त नहीं है, लेकिन कुछ ख़ास वर्ग के लोगों के लिए नियंत्रित परमिट की व्यवस्था की गई है.
गुजरात में शराब की परमिट शॉप एक क़ानूनी दुकान होती है, जो आमतौर पर किसी होटल में होती है, जहां सिर्फ़ वैध परमिट रखने वाले लोगों को ही शराब बेची जा सकती है.
ये परमिट पर्यटकों, विदेशी नागरिकों, दूसरे राज्यों के निवासियों, हेल्थ परमिट रखने वाले लोगों या ख़ास मौकों के लिए अनुमति पाने वालों को दिए जाते हैं.
क़ानून के मुताबिक ऐसे परमिटधारक तय मात्रा में ही शराब ख़रीद सकते हैं और उसका सेवन कर सकते हैं.
परमिट शॉप के लिए राज्य के गृह या एक्साइज़ विभाग से मंज़ूरी लेना ज़रूरी होता है. यह कोई आम खुली शराब की दुकान नहीं होती, बल्कि एक नियंत्रित बिक्री केंद्र के रूप में काम करती है.
पोरबंदर के परमिट शॉप के मालिक क्या कहते हैं?
इस बारे में जब बीबीसी गुजराती ने शराब परमिट शॉप के मालिक विक्रमभाई ओडेदरा से बात की.
उन्होंने बताया, "हमारी जानकारी के मुताबिक पूरे ज़िले में करीब 1500 परमिटधारक हैं. ये सभी लोग अब तक जूनागढ़, जामनगर और मोरबी जैसे शहरों में जाते थे. अब उन्हें अपने परमिट के आधार पर क़ानूनी शराब लेने के लिए इतनी दूर नहीं जाना पड़ेगा, उन्हें यहीं उपलब्ध हो जाएगी."
ओडेदरा ने इस परमिट शॉप के लिए क़रीब दो साल पहले आवेदन किया था.
वह कहते हैं, "क़रीब दो साल पहले से हमने यह मंज़ूरी लेने की प्रक्रिया शुरू की थी. सबसे पहले ज़िला स्तर पर आवेदन किया था. वहां से मंज़ूरी मिलने के बाद हमने राज्य स्तर की कमिटी के सामने अपनी बात रखी. इसके बाद पूरा शुल्क भरने पर हमें यह परमिट मिला है."
ओडेदरा ने इसके लिए क़रीब 9 लाख रुपये ख़र्च किए हैं. आगे भी ओडेदरा हर तीन महीने में सरकार को 6 लाख रुपये का भुगतान करेंगे.
पोरबंदर के लोगों ने शराबबंदी को लेकर क्या कहा?
आबकारी विभाग के मुताबिक, इस समय पोरबंदर में क़रीब 1400 से 1500 परमिटधारक हैं, जिनमें विदेशी पासपोर्ट रखने वाले लोग और हेल्थ परमिटधारक भी शामिल हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर एक्साइज़ विभाग के अधिकारी बालुभाई कमरटा से बातचीत की.
वह कहते हैं, "हमारे पास सिर्फ़ दो ही अर्ज़ियां आई हैं, जिनमें से एक को मंज़ूरी मिल चुकी है और दूसरी अभी कलेक्टर कार्यालय में विचाराधीन है. कोई भी आवेदन आने पर उसकी ठीक से जांच की जाती है, उसके बाद आगे की कार्रवाई होती है."
बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर के रहने वाले लोगों से भी बात की.
निजी कंपनी में काम करने वाले विनोदभाई आहीर कहते हैं, "महात्मा गांधी की धरती पर शराब को क़ानूनी तौर पर उपलब्ध कराना एक बड़ी ग़लती है. जिस चीज़ का वह जीवन भर विरोध करते रहे, उसे उनकी जन्मभूमि पर क़ानूनी रूप से दुकानों में बेचने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए."
हालांकि दूसरी तरफ़, पोरबंदर में एक एनजीओ चलाने वाले वीनेशभाई गोस्वामी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "महात्मा गांधी पूरे देश के राष्ट्रपिता हैं, उन्हें सिर्फ़ पोरबंदर से जोड़कर देखना सही नहीं है. वह पोरबंदर से ज़्यादा अहमदाबाद और दिल्ली में रहे. अगर उनके सम्मान में शराबबंदी लागू करनी है, तो वह हर जगह होनी चाहिए, सिर्फ़ उनके जन्मस्थान पर ही नहीं."
वह आगे कहते हैं, "पोरबंदर में इतने लोगों को परमिट को क्यों परमिट दिया गया? और अगर उन्हें परमिट दिया गया है, तो उन्हें परमिट शॉप भी मिलनी ही चाहिए."
पोरबंदर के वरिष्ठ पत्रकार परेश पारेख का मानना है, "कई लोग चाहते हैं कि शराबबंदी हटा दी जाए. ख़ास तौर पर युवा पीढ़ी यह मानती है कि शराब आसानी से मिलनी चाहिए. हालांकि दूसरी तरफ़ ऐसे भी कई लोग हैं, जो मानते हैं कि पोरबंदर महात्मा गांधी की धरती है, इसलिए यहां परमिट शॉप नहीं होनी चाहिए."
हालांकि उनका यह भी दावा है कि पोरबंदर में शराब का ग़ैरक़ानूनी कारोबार तो सालों से चलता आ रहा है.
'कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था'
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने गांधी विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों से भी बातचीत की.
गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति और पूर्व ट्रस्टी सुदर्शन आयंगर कहते हैं, "कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था. अगर इस सरकार में गांधी के लिए आदर सम्मान होता, तो पोरबंदर में यह अनुमति नहीं दी जाती. गांधी विचारधारा से जुड़े हुए बहुत से लोग हैं, पूरी दुनिया में उनका सम्मान है, पूरी दुनिया उन्हें मानती है. ऐसे में उनके जन्मस्थान को तो अलग रखा जा सकता था."
इसी तरह गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति अनामिक शाह कहते हैं, "जिस तरह किसी धार्मिक स्थल के आस-पास क्या बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा, इस पर नियंत्रण रखा जाता है, उसी तरह पोरबंदर में परमिट शॉप पर नियंत्रण क्यों नहीं रखा जा सकता? और अगर पर्यटन की बात की जाए, तो ऐसे लोग नहीं होते जो गांधी के जन्मस्थान पर आकर शराब पीना चाहें."
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश एन शाह ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "एक समय था जब राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में शराबबंदी को तार्किक बनाने की बात करते थे, और अब वह बात ज़मीनी स्तर पर नज़र आ रही है. हालांकि इसका नुक़सान यह है कि जिस चीज़ का गांधी विरोध करते थे, वही शराब धीरे धीरे ज़्यादा सुलभ होती जा रही है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.