कच्छ में 150 साल बाद दिखा दुर्लभ प्रजाति का सांप, जानिए क्यों है ख़ास

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- Author, गोपाल कटेशिया
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
साल 2005 में गुजरात के कच्छ में करोड़ों साल पुराने एक विशाल सांप के अवशेष मिले थे. यह सांप वासुकी इंडिकस प्रजाति का था.
इसके अवशेष कच्छ के लखपत तालुका के पानंध्रो गांव में कोयले की एक खदान से मिले थे.
इस खोज से पता चला कि कच्छ में क़रीब चार करोड़ 70 लाख साल पहले किस तरह के जीव-जंतु रहते थे.
कच्छ के पूर्वी हिस्से में भचाऊ तालुका के धोलावीरा गांव के पास एक वुड फ़ॉसिल पार्क भी है. यहां मिले कुछ पुराने अवशेष वासुकी इंडिकस से भी पुराने माने जाते हैं.
कच्छ में दिखा एक और दुर्लभ सांप

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इस पार्क में मिले पेड़ों के अवशेषों को जुरासिक काल यानी 20 करोड़ से 14 करोड़ 50 लाख साल पहले का माना जाता है. यह डायनासोरों का दौर था.
शोधकर्ताओं को वासुकी इंडिकस के अवशेष 2005 में मिले थे. लेकिन आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने इसकी सही पहचान का काम 2022 में शुरू किया.
इन अवशेषों की जांच करने के बाद शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2024 में एक पत्रिका में अपना शोध लेख प्रकाशित किया.
इसके बाद दुनिया को क़रीब 10 से 11 मीटर लंबे इस विशाल सांप के बारे में पता चला.
इस शोध के क़रीब ढाई साल बाद कच्छ में एक और दुर्लभ सांप दिखाई दिया है.
फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार मिला सांप जीवित है. कच्छ के एक वन अधिकारी ने इसे बहुत ही अलग हालात में देखा.
दूसरा दुर्लभ सांप कैसे आ गया?

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इस साल छह सितंबर की शाम कच्छ वन विभाग के कच्छ पूर्व डिविज़न की भुज उत्तर रेंज के रेंज फ़ॉरेस्ट अधिकारी जयेश दुमाडिया और उनकी टीम को यह दुर्लभ सांप दिखाई दिया.
जयेश दुमाडिया अपनी टीम के साथ पाकिस्तान की सीमा के पास काला डूंगर इलाक़े में गश्त कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें एक सांप दिखाई दिया.
जयेश दुमाडिया ने बीबीसी से कहा, "इस साल अप्रैल में ही मेरा तबादला पंचमहल से कच्छ हुआ था. इसलिए कच्छ के वन्यजीव मेरे लिए एक तरह से नए हैं."
"हम गश्त कर रहे थे. इसी दौरान पेड़-पौधों से ख़ाली एक सूखे इलाक़े में हमें एक सांप दिखाई दिया."
"मैंने सांप को देखने के लिए अपनी बोलेरो कैंपर वैन रोक दी और हम नीचे उतर गए."
"मुझे सांपों के बारे में थोड़ी जानकारी है, इसलिए मैंने उसे पहचान लिया. वह ब्लैक-हेडेड क्राउन स्नेक था."
उन्होंने कहा, "गुजराती में इसे रजवाड़ी सांप कहा जाता है. इससे पहले मैंने कभी जीवित रजवाड़ी सांप नहीं देखा था."
"मैंने पहले एक मरा हुआ रजवाड़ी सांप देखा था. इसलिए इस सांप को क़रीब से देखने और उसका रिकॉर्ड रखने के लिए हमने उसकी तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं."
उन्होंने बताया कि रजवाड़ी सांप बचाव की मुद्रा में आ गया और उनकी कैंपर वैन के निचले हिस्से में घुस गया.
इसके बाद जो हुआ, वह काफ़ी नाटकीय था.
दुमाडिया ने कहा, "हम रजवाड़ी सांप को गाड़ी से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे. इसी दौरान हल्की रोशनी में वहां एक और सांप आ गया."
"यह सांप देखने में बिल्कुल अलग लग रहा था."
"इसलिए हमारा ध्यान कैंपर वैन में छिपे रजवाड़ी सांप से हट गया, जो ज़हरीला नहीं था. हमने नमक की परत पर रेंग रहे दूसरे सांप की तस्वीरें और वीडियो बनाने शुरू कर दिए."
"कुछ देर बाद वह सांप वहां से चला गया."
"उसकी पहचान के लिए मैंने तस्वीरें और वीडियो वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के जानकारों और सांपों की जानकारी रखने वाले दूसरे लोगों को भेजे."
"उन्होंने बताया कि तस्वीरों में दिखाई दे रहा सांप अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक है. यह गुजरात में बहुत कम दिखाई देता है."
यह सांप कितना दुर्लभ है?

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डॉक्टर राजू व्यास सांपों और रेंगने वाले दूसरे जीवों के जानकार हैं. वह कई साल तक वडोदरा के चिड़ियाघर में इंस्पेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं.
डॉक्टर राजू व्यास बताते हैं कि अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक यानी रेतीले इलाक़े में रहने वाले इस सांप का वैज्ञानिक नाम सामोफ़िस शोकारी है.
उनके मुताबिक़, सामोफ़िस परिवार के सांप सूखे और रेतीले इलाक़ों में रहते हैं.
डॉक्टर व्यास का कहना है कि इस परिवार के सांप अफ़्रीका से लेकर दक्षिण एशिया तक पाए जाते हैं.
वह बताते हैं कि सामोफ़िस परिवार की सामोफ़िस कोंडानारस और सामोफ़िस लेइथी प्रजातियों के सांप भी भारत में पाए जाते हैं.
गुजरात वन विभाग ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में बताया कि प्रकृति और जीव-जंतुओं का अध्ययन करने वाले फ़र्डिनांड स्टोलिच्का ने 1871-72 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए काम करते हुए कच्छ का सर्वे किया था.
इस सर्वे के दौरान स्टोलिच्का ने अध्ययन के लिए एक अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक पकड़ा था.
उन्होंने इसे सांप की एक अलग प्रजाति मानते हुए इसके बारे में लिखा था. उनका लेख 1872 में 'जर्नल ऑफ़ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' में प्रकाशित हुआ था.
हालांकि, बाद में पता चला कि वह अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक ही था.
यह सांप लगभग चार फ़ीट तक लंबा हो सकता है.
राजू व्यास कहते हैं, "यह सांप मुख्य रूप से ज़मीन पर रहता है. लेकिन छिपकलियों और दूसरे जीवों को खाने के लिए कम ऊंचाई वाली झाड़ियों पर भी चढ़ जाता है."
"लंबा और पतला यह सांप ज़मीन पर बहुत तेज़ी से दौड़ सकता है. यह छिपकलियां, कीड़े और दूसरे छोटे जीव खाता है. इसका ज़हर छिपकलियों जैसे जीवों पर असर करता है."
"लेकिन इसका ज़हर इंसानों पर ज़्यादा असर नहीं करता."
"यह बात सही है कि स्टोलिच्का ने 1871-72 में कच्छ में इस सांप की मौजूदगी दर्ज की थी."
"इसके बाद भी कच्छ में यह सांप देखे जाने के रिकॉर्ड मौजूद हैं. जुगल किशोर तिवारी के पास इसकी तस्वीरें भी हैं."
जुगल किशोर तिवारी कच्छ में रहने वाले पक्षियों के जानकार हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "साल 2009 में मुझे यह सांप बन्नी घास के मैदान के पूर्वी हिस्से में मौजूद लोडाई गांव में दिखाई दिया था."
"मैंने इसकी तस्वीरें भी ली थीं. जानकारों ने इसकी पहचान अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक के रूप में की थी."
"हालांकि, यह सांप बहुत कम दिखाई देता है. उसके बाद मुझे यह सांप फिर कभी नहीं दिखा."
दोनों सांप एक साथ दिखाई दिए

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रेंज फ़ॉरेस्ट अधिकारी जयेश दुमाडिया ने बताया कि ऐसा लग रहा था कि दोनों सांप सूखी ज़मीन से कच्छ के बड़े रण में पानी भरे एक इलाक़े की तरफ़ जा रहे थे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "रजवाड़ी सांप भी गुजरात में बहुत कम दिखाई देने वाला सांप माना जाता है."
"रजवाड़ी सांप और अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक का एक ही जगह पर एक साथ दिखाई देना बहुत कम होने वाली घटना है."
"छह सितंबर के बाद हमने उसी इलाक़े में दो-तीन बार जांच की, लेकिन दोनों में से कोई भी सांप दोबारा दिखाई नहीं दिया."
दुमाडिया ने बताया कि रजवाड़ी सांप ने वन विभाग की कैंपर वैन में ही काफ़ी लंबा सफ़र तय किया.
उन्होंने कहा, "हमने उसे कैंपर वैन से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह बाहर नहीं निकला."
"अंधेरा हो रहा था. इसलिए हम अपनी वैन में बैठकर वहां से क़रीब 30 किलोमीटर दूर वन विभाग के एक गेस्टहाउस चले गए."
"वहां पहुंचकर हमने जांच की, तो रजवाड़ी सांप कैंपर वैन के निचले हिस्से में छिपा हुआ था."
"आख़िरकार हम उसे कैंपर वैन से सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब रहे."
कच्छ वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर धीरज मित्तल ने बीबीसी से कहा, "रेंज फ़ॉरेस्ट अधिकारी ने अफ़्रो-एशियन सैंड स्नेक की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए हैं. इससे पता चलता है कि कच्छ में कई अलग-अलग तरह के वन्यजीव पाए जाते हैं."
"हम इस बारे में वैज्ञानिक पत्रिकाओं के संपादकों को लिखेंगे और कोशिश करेंगे कि यह जानकारी उनके रिकॉर्ड में भी शामिल हो."
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