'वोटिंग अधिकार से वंचित करना शरीर से आत्मा निकालने जैसा' कहकर चर्चा में आए जस्टिस उज्जल भुइयां कौन हैं?

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वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर) को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मिले वोटिंग के अधिकार से कोई भी छेड़छाड़ नहीं कर सकता.
जस्टिस भुइयां रविवार को हैदराबाद की नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोल रहे थे.
इस दौरान उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया जो 'बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दे और वे बगैर वोट देने के अधिकार वाले नागरिक बन जाएं, संविधान का उल्लंघन होगी.'
उन्होंने कहा कि इसे सही ठहराने के लिए दूसरे मामलों का हवाला देना भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि किसी भारतीय नागरिक को उसके मतदान के अधिकार से वंचित करना 'शरीर से आत्मा निकालने' जैसा होगा.
उनकी ये टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश भर के कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं. विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर सही ढंग से नहीं हो रहा है और इसके ज़रिये करोड़ों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.
पिछले सप्ताह अंग्रेजी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट में कहा गया था कि एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद रहे हैं.
उज्जल भुइयां ने क्या कहा?

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क़ानूनी ख़बरों और विश्लेषण की वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक़ हैदराबाद के कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने कहा, ''अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है और अपने ही देश में उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है, यानी ऐसा नागरिक जिसके पास वोट देने का अधिकार नहीं है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी है. दूसरे मामलों का हवाला देकर इसे किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता."
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 325 कहता है कि लोकसभा या किसी राज्य की विधानसभा के चुनाव के लिए हर क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र की एक सामान्य मतदाता सूची होगी. किसी व्यक्ति को केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या इनमें से किसी एक के आधार पर उस सूची में शामिल होने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.
उन्होंने कहा, ''संविधान के अनुच्छेद 326 के मुताबिक, लोकसभा और हर राज्य की विधानसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे. यानी भारत का हर नागरिक, जिसकी उम्र 18 साल या उससे अधिक है (28 मार्च 1989 से पहले यह उम्र 21 साल थी) और जो संविधान या संबंधित कानून के तहत गैर-निवास, मानसिक अस्वस्थता, अपराध या भ्रष्ट अथवा अवैध आचरण के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया गया हो, ऐसे चुनाव में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड होने का हकदार होगा.''
डॉ. बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, "सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को सही ठहराते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि चूंकि हमने एक ऐसा अहम फ़ैसला लिया है, जो अतीत को लगभग पूरी तरह बदल देता है, इसलिए संविधान में स्पष्ट रूप से यह बताया जाना बेहतर है कि यही वह आधार है जिसके कारण ड्राफ़्ट संविधान में अनुच्छेद 289ए और 289बी शामिल किए गए, जो अब संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 हैं.''
कौन हैं जस्टिस उज्जल भुइयां?

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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की वेबसाइट के मुताबिक़ जस्टिस उज्जल भुइयां का जन्म 2 अगस्त 1964 को गुवाहाटी में हुआ था. उनके पिता सुचेंद्र नाथ भुइयां सीनियर वकील और असम के पूर्व एडवोकेट जनरल थे.
उन्होंने गुवाहाटी के डॉन बॉस्को हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा हासिल की और इसके बाद कॉटन कॉलेज, गुवाहाटी में पढ़ाई की.
दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से बीए करने के बाद उन्होंने गुवाहाटी के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से एलएलबी और गौहाटी यूनिवर्सिटी से एलएलएम की डिग्री हासिल की.
उन्होंने गुवाहाटी हाई कोर्ट की प्रमुख बेंच में वकालत की और अगरतला, शिलॉन्ग, कोहिमा और ईटानगर की बेंचों में में भी पेश हुए.
वह करीब 16 वर्षों तक आयकर विभाग के स्थायी वकील रहे. मई 1995 में उन्होंने जूनियर स्टैंडिंग काउंसल के रूप में काम शुरू किया.
जुलाई 2011 को उन्हें असम का अतिरिक्त एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया.
2023 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें भारत के सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की. इसके बाद 14 जुलाई 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया.
तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (नलसर) के चांसलर के रूप में भी काम किया. सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने तक वह इस पद पर रहे.
जस्टिस भुइयां का कानूनी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ाव भी जारी रहा है. वह बेंगलुरु की नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी की जनरल काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य हैं. वह महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद की जनरल काउंसिल के भी सदस्य हैं.
जस्टिस भुइयां के कुछ चर्चित फ़ैसले

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वी. वसंता मोगली बनाम तेलंगाना सरकार (2023)- जस्टिस उज्जल भुइयां ने 1919 के औपनिवेशिक दौर के तेलंगाना एनच एक्ट को असंवैधानिक करार दिया था. उन्होंने कहा था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर लोगों की गरिमा और अधिकारों का उल्लंघन करता है.
दिल्ली आबकारी नीति मामला (2024)- अरविंद केजरीवाल को जमानत देने के फैसले में सहमति जताते हुए जस्टिस भुइयां ने सीबीआई की ओर से की गई गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाया था. उन्होंने कहा था कि ऐसा लगता है कि गिरफ़्तारी का मक़सद ईडी मामले में पहले मिली जमानत को निष्प्रभावी करना था.
कॉन्फेडरेशन ऑफ़ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ इंडिया बनाम वनशक्ति ( 2025) - पर्यावरणीय मंजूरियों को बाद में देने के मुद्दे पर जस्टिस भुइयां ने असहमति जताई थी. उन्होंने इस मामले में कहा था कि पूर्व प्रभाव से दी जाने वाली मंजूरी के जरिए पर्यावरण संबंधी कानून के असर को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए.
विकीमीडिया फाउंडेशन इंक. बनाम एएनआई मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ( 2025) - इस मामले में जस्टिस भुइयां ने कहा कि था ऑनलाइन सामग्री हटाने के निर्देश जारी करने के लिए जरूरत और आनुपातिकता की कसौटी का सख़्ती से पालन किया जाना चाहिए.
कुछ चर्चित टिप्पणियां

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गंगा में बिरयानी खाना अपराध नहीं - जस्टिस भुइयां ने मार्च 2026 में रमजान के दौरान वाराणसी में गंगा में इफ़्तार खाने पर गिरफ़्तार युवाओं के मामले में अहम टिप्पणी की थी. चिकन खाने के आरोप में 14 लोगों की गिरफ़्तारी के बाद जमानत न दिए जाने पर उन्होंने कहा था कि गंगा में चिकन खाना कोई अपराध नहीं है.
भोपाल में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने इस मामले का हवाला देते हुए कहा था कि आम और रोज़मर्रा की गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में डालने और शांतिपूर्ण असहमति को सीमित करने की बढ़ती प्रवृत्ति लोकतांत्रिक आज़ादी के लिए चिंता का विषय है.
उन्होंने कहा था कि लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए.
अलग राय या असहज सवाल पूछने पर स्टूडेंट्स को धमकी देना गलत - इसी साल जस्टिस भुइयां ने नई दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में कहा था कि सिर्फ़ अलग राय रखने और असहज सवाल उठाने की वजह से स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई या सज़ा की धमकी नहीं दी जानी चाहिए.
उन्होंने कहा था इस तरह की कार्रवाई असंवैधानिक है और यह अधिकार और सत्ता के दुरुपयोग के बराबर है. जस्टिस भुइयां ने कहा था कि यूनिवर्सिटी ऐसी जगह होनी चाहिए जहां स्वतंत्र सोच को बढ़ावा मिले और स्टूडेंट बिना किसी डर के चुनौतीपूर्ण सवाल पूछने में आत्मविश्वास महसूस करें.
उन्होंने कहा था कि कैंपस ऐसी जगहें हैं जहां युवा मन अपने विचारों और मान्यताओं से अलग विचारों से रूबरू होते हैं. विश्वविद्यालयों को स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने और उनकी पड़ताल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.
मुस्लिम होने की वजह से घर नहीं दिया जाना संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ़- फरवरी 2026 में उन्होंने हैदराबाद में तेलंगाना जजेज़ एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी की ओर से आयोजित एक सेमिनार में उन मामलों का ज़िक्र किया था, जहां मुस्लिम होने के कारण लोगों को घर नहीं दिया जाता है.
जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को आज भी उनकी पहचान के आधार पर घर किराये पर देने से इनकार किया जाता है. उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रथाएं समाज में मौजूद उन पूर्वाग्रहों को दर्शाती हैं, जो संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं.
उन्होंने कहा था, ''ऐसी प्रथाएं संवैधानिक आदर्शों और सामाजिक व्यवहार के बीच के अंतर को दिखाती हैं. उनके मुताबिक़, संविधान समानता, गरिमा और बंधुत्व की गारंटी देता है और घर पाने के अधिकार में किसी भी तरह का भेदभाव इन संवैधानिक गारंटियों के विपरीत है.''
उन्होंने कहा था कि संविधान में समानता और भेदभाव से सुरक्षा की गारंटी के बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में इस तरह का भेदभाव अब भी जारी है.
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