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'तीन महीने तक रोज़ सड़क पर घूमती रही': इकलौते बेटे की मौत के मामले में सुबूत जुटाती एक मां की कहानी
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- ........से, देहरादून से
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
देहरादून के प्रेमनगर इलाक़े में 18 साल के क्षितिज चौधरी की एक सड़क हादसे में हुई मौत को क़रीब दो साल हो चुके हैं.
लेकिन परिवार का कहना है कि अब तक आरोपी चालक तक पुलिस नहीं पहुंच सकी है.
इकलौते बेटे को खो चुकी मां ललिता चौधरी इन दो सालों में थानों और पुलिस अधिकारियों के चक्कर काटती रही हैं.
उनका आरोप है कि जांच के शुरुआती चरण में गंभीरता की कमी रही और जब उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने ख़ुद ही सुबूत जुटाने शुरू कर दिए.
हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक बार फिर अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाई. जिसके बाद पुलिस ने दोबारा जांच का आश्वासन दिया है.
पूरा मामला
16 फ़रवरी 2024 की रात करीब 2:45 बजे क्षितिज चौधरी अपने एक दोस्त के साथ देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र में पैदल जा रहे थे.
परिवार के मुताबिक़, इसी दौरान तेज़ रफ़्तार में आए एक डंपर ने उसे टक्कर मार दी और चालक मौक़े से फ़रार हो गया.
क्षितिज की मां ललिता चौधरी का कहना है कि हादसे के बाद उसके दोस्तों ने एंबुलेंस के लिए कॉल किया, लेकिन क़रीब 45 मिनट तक कोई मदद नहीं पहुंची. उनका आरोप है कि पुलिस भी मौक़े पर समय से नहीं पहुंची.
बाद में एंबुलेंस के ज़रिए उसे दून अस्पताल ले जाया गया. हालत गंभीर होने पर डॉक्टरों ने उसे ऋषिकेश स्थित एम्स रेफ़र कर दिया. वहां इलाज के दौरान 17 फ़रवरी की शाम उसकी मौत हो गई.
हादसे के दो दिन बाद, 19 फ़रवरी को ललिता चौधरी ने प्रेमनगर थाने में अज्ञात डंपर चालक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया. उनका आरोप है कि इससे पहले पुलिस ने मौक़े पर मौजूद लोगों की शिकायत दर्ज नहीं की.
'मुझे कहा गया- सुबूत है तो लेकर आओ'
ललिता चौधरी अपने बेटे को याद करते हुए कहती हैं, "मेरा बेटा कभी मेरी आंखों में आंसू नहीं देख सकता था. हमारा रिश्ता मां-बेटे का कम, दोस्त जैसा ज़्यादा था."
वह बताती हैं कि हादसे वाली रात उन्हें क़रीब तीन बजे फ़ोन आया.
"जब मैंने उससे बात की तो एक बार के लिए उसकी आवाज़ भी नहीं पहचान पाई. वह बहुत दर्द में था. जब मैं अस्पताल पहुंची तो उसने कहा- 'मम्मी आप आ गई हो?'"
ललिता का मानना है कि अगर समय पर मदद मिलती तो शायद उनके बेटे की जान बच सकती थी. वह बताती हैं, "अगर 100 नंबर और 108 पर कॉल समय पर उठ जाता, तो मेरा बेटा आज मेरे पास होता."
लेकिन उनके मुताबिक़, असली संघर्ष इसके बाद शुरू हुआ.
"जब मैंने पुलिस से केस की प्रगति के बारे में पूछा तो मुझे कहा गया- 'अगर आपके पास कोई सुबूत है तो लेकर आओ, हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है'."
ललिता कहती हैं कि इसी के बाद उन्होंने ख़ुद ही जांच शुरू करने का फ़ैसला किया. उन्होंने कहा, "मुझे लगा कि अगर मैं नहीं करूँगी, तो कोई नहीं करेगा."
उनके मुताबिक़, उन्होंने कई महीनों तक उस सड़क पर जाकर लोगों से बात की, दुकानों और होटलों में लगे सीसीटीवी कैमरों की तलाश की और हर संभव जानकारी जुटाने की कोशिश की.
वह बताती हैं, "मैं तीन महीने तक रोज़ सड़क पर घूमती रही."
ललिता का कहना है कि उन्हें एक सीसीटीवी फ़ुटेज मिला, जिसके आधार पर वह आरटीओ कार्यालय पहुंचीं. वहां से उन्होंने शक के आधार पर कई गाड़ियों के नंबर जुटाए.
वह कहती हैं, "मैंने क़रीब 10 गाड़ियों के नंबर निकाले और पुलिस को दिए."
हालांकि उनका आरोप है कि इसके बावजूद जांच में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई. उन्होंने कहा, "मुझे कहा गया कि जांच कर ली गई है, लेकिन कुछ नहीं मिला."
क़रीब डेढ़ साल बाद उन्हें पता चला कि मामले में फ़ाइनल रिपोर्ट लगा दी गई है. ललिता कहती हैं, "उस दिन मुझे लगा कि मेरी सारी मेहनत ख़त्म हो गई."
किसान यूनियन तक पहुंचा मामला
क़रीब दो साल बाद यह मामला एक बार फिर तब सामने आया, जब ललिता चौधरी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचीं.
देहरादून में आयोजित एक विरोध कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपने बेटे के लिए न्याय की मांग उठाई.
इस दौरान उनकी मुलाक़ात भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत से हुई. उन्होंने उन्हें पूरे मामले की जानकारी दी.
भारतीय किसान यूनियन वेलफेयर फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोमदत्त शर्मा बताते हैं, "हमारी मुलाकात ललिता चौधरी से हुई और उनकी कहानी सुनकर हम उनके साथ खड़े हो गए. हम उन्हें लेकर एसएसपी से मिले और सारे सुबूत दिखाए."
सोमदत्त शर्मा के मुताबिक, पहले उन्हें बताया गया कि मामले में फ़ाइनल रिपोर्ट लग चुकी है, लेकिन जब सुबूत सामने रखे गए तो दोबारा जांच की बात कही गई.
वह कहते हैं, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मां को ख़ुद सुबूत जुटाने पड़े."
उन्होंने चेतावनी भी दी है कि अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं होती है, तो आंदोलन किया जाएगा. उन्होंने कहा, "अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो हम सड़कें जाम करेंगे और भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत भी यहां खड़े होंगे."
पुलिस क्या कहती है?
देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र डोभाल का कहना है कि मामले की जांच पहले की जा चुकी है, लेकिन अब नए सुबूतों के आधार पर इसे दोबारा देखा जा रहा है.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "जितने भी सीसीटीवी फ़ुटेज उपलब्ध थे, उनका निरीक्षण किया गया था. अब दिए गए साक्ष्यों के आधार पर संबंधित थाना प्रभारी को दोबारा जांच के निर्देश दिए गए हैं."
एसएसपी के मुताबिक़, मामला फ़िलहाल अदालत में विचाराधीन है और आगे की जांच के लिए न्यायालय से अनुमति ली जा रही है.
उन्होंने यह भी कहा कि अगर जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.
ललिता चौधरी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हैं. पिछले कुछ वर्षों से वह अकेले काम करते हुए अपने परिवार की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं. उनकी बेटी दिल्ली में इंटर्नशिप कर रही हैं.
ललिता चौधरी कहती हैं कि उन्होंने अपने बेटे के लिए जो किया, वह एक मां का कर्तव्य था.
वह कहती हैं, "जो काम पुलिस को करना चाहिए था, वो मैंने किया."
उनकी आवाज़ में आज भी वही दर्द साफ़ झलकता है. वो बताती हैं, "मेरा बेटा मुझसे कह रहा था-'मम्मी मुझे बचा लो.'"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.