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दो-तिहाई बहुमत के बिना संविधान संशोधन बिल लाने के पीछे मोदी सरकार का मक़सद क्या था?
- Author, अरशद मिसाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
लोकसभा में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन बिल पेश हुआ और इस पर वोटिंग हुई, लेकिन यह बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका.
संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है और एनडीए गठबंधन इसे हासिल करने में नाकाम रहा.
बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, वहीं इसके विरोध में 230 वोट पड़े. इस बिल को पास कराने के लिए कम से कम 352 वोटों की ज़रूरत थी.
इस बिल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण से जुड़े क़ानून को लागू करना, 2026 से पहले की जनगणना के आधार पर सीटों के परिसीमन की इजाज़त देना और लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करना था.
लेकिन इस बिल की टाइमिंग और सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं. जब सरकार को पता था कि उसके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, फिर भी यह बिल क्यों लाया गया? इस बिल को लाने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी?
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बिल लाने के पीछे सरकार का मक़सद क्या?
संविधान संशोधन बिल पर बहस के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण के ख़िलाफ़ है.
बिल गिरने के बाद एक्स पर पोस्ट कर उन्होंने लिखा, "आज लोकसभा में बहुत अजीब दृश्य दिखा. नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए ज़रूरी संविधान संशोधन बिल को कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने पारित नहीं होने दिया. महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने के बिल को गिरा देना और उसका उत्साह मनाना सचमुच निंदनीय और कल्पना से परे है."
अमित शाह ने आगे लिखा कि, "अब देश की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फ़ीसदी आरक्षण, जो उनका अधिकार था, वह नहीं मिल पाएगा. कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह पहली बार नहीं किया, बल्कि बार-बार किया है. उनकी यह सोच न महिलाओं के हित में, न देश के हित में है."
हालांकि, विपक्ष इसे संविधान पर हमला बता रहा है.
मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, "ये संविधान पर हमला था, और इसको हमने हरा दिया है तो अच्छी बात है."
राहुल गांधी ने कहा, "हमने साफ़ कहा है कि ये महिला बिल नहीं है, भारत का जो चुनावी ढांचा है उसे बदलने की कोशिश है. मैं प्रधानमंत्री से कह रहा हूं कि अगर आप महिला बिल चाहते हैं तो 2023 का महिला बिल लाइये और उसे आज से लागू कीजिए और पूरा विपक्ष 100 फ़ीसदी आपको समर्थन देगा."
राजनीतिक विशेषज्ञ आदेश रावल कहते हैं, "जो बिल 2023 में पारित हो चुका था और संविधान का हिस्सा है और हमें पता था कि इसे 10 साल बाद लागू किया जाएगा. उसे विधानसभा चुनावों के बीच फिर से लेकर आया गया. इससे साफ़ समझ में आता है कि सरकार की कोशिश है कि विपक्ष को- इस देश की आधी आबादी यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ दिखाया जाए."
बिल की टाइमिंग पर सवाल
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक्स पर लिखा कि कांग्रेस पार्टी ने गुनाह किया है. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधा.
उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, "ज़िंदगी भर के लिए कांग्रेस पार्टी पर काला धब्बा लग गया है. महिला विरोधी कांग्रेस पार्टी को भारत की जनता, ख़ासकर भारत की महिलाएं कभी माफ़ नहीं करेंगी."
आदेश रावल का मानना है कि देश में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच इस बिल को लाने का मक़सद विपक्ष के ख़िलाफ़ इसे हथियार बनाना हो सकता है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए आदेश रावल कहते हैं, "यह संशोधन पारित नहीं हुआ, लेकिन यह साफ़ दिखाता है कि इसका मक़सद बंगाल चुनाव है. उन्हें (बीजेपी) लगता है कि बंगाल की महिलाएं ज़्यादा प्रोग्रेसिव हैं, सभी चीज़ों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं, और यह भी बात है कि टीएमसी महिलाओं को सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी देती है. आने वाले तमाम विधानसभा और लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री यह बार-बार कहेंगे कि महिला आरक्षण के लिए हमने कोशिश की थी, लेकिन विपक्ष नहीं माना."
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी का मानना है कि सरकार ये नैरेटिव बनाने की कोशिश करेगी कि विपक्ष महिलाओं के ख़िलाफ़ है.
बीबीसी से बात करते हुए विजय त्रिवेदी कहते हैं, "सरकार को पता था कि उनके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है. हो सकता है कि सरकार संभावनाएं तलाशने की कोशिश कर रही हो. लेकिन ये बात साफ़ है कि सरकार ये नैरेटिव बनाना चाहती है कि विपक्ष महिलाओं के ख़िलाफ़ है."
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता
फिलहाल, दक्षिण भारत के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं. जबकि उत्तर भारत के सिर्फ़ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में कुल मिलाकर 120 लोकसभा सीटें हैं.
दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनेताओं को लग रहा है कि नए परिसीमन के बाद ये अंतर और बढ़ सकता है.
मंगलवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने प्रदर्शनों की चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर सरकार परिसीमन को लेकर आगे बढ़ी और इससे उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक राजनीतिक ताक़त मिली तो पूरा राज्य ठहर जाएगा.
आदेश रावल समझाते हुए कहते हैं, "दक्षिण के नेताओं की चिंता ये है कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत में कहीं इतनी सीटें न हो जाएं कि सरकार बनाने के लिए दक्षिण की ज़रूरत ही न पड़े. और ये देश के लिए विभाजनकारी हो सकता है."
एमके स्टालिन ने मंगलवार को कहा, "मैं आंबेडकर का नाम लेकर कहता हूं, अगर तमिलनाडु प्रभावित हुआ, तो हम भारत का ध्यान खीचेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये आपके लिए तमिलनाडु से अंतिम चेतावनी है, तमिलनाडु लड़ेगा, तमिलनाडु जीतेगा."
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "यह बिल पास नहीं हुआ, इसलिए मुझे लगता है कि यह तमिलनाडु में बड़ा मुद्दा नहीं बनेगा, क्योंकि वहां मुद्दा परिसीमन का था. वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एक महिला नेता के तौर पर काम कर रही हैं, और उनके साथ जो महिला वोटर्स जुड़ी हुई हैं, उन्हें बीजेपी अपनी ओर करने की कोशिश करेगी. और एक राजनीतिक पार्टी के लिए ऐसा करना मेरे हिसाब से ग़लत भी नहीं है. इसमें बीजेपी कितना सफल हो पाएगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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