डीलिमिटेशन और महिला आरक्षण से जुड़े पाँच सवाल और उनके जवाब

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लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक खारिज हो गया है. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के खारिज होने के तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस नतीजे को दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

उन्होंने कहा कि केंद्र शासित प्रदेशों और परिसीमन से जुड़े दो अन्य विधेयको, जो इस संवैधानिक संशोधन से सीधे तौर पर जुड़े थे, अब टल गए हैं.

पिछले कुछ दिनों से डीलिमिटेशन पर संसद और संसद के बाहर पक्ष-विपक्ष में बहस छिड़ी हुई है. दक्षिण भारत में डीलिमिटेशन का विरोध हो रहा है. वहां के नेताओं का कहना है कि ये प्रस्ताव दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ नाइंसाफ़ी होगा. सरकार का कहना है ऐसा नहीं है और दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ कोई ज़्यादती नहीं होगी.

लेकिन ये पूरा माजरा क्या है? डीलिमिटेशन होता क्या है, वुमन रिज़र्वेशन से ये मामला किस तरह जुड़ा है? साउथ इंडियन स्टेट्स टेंशन में क्यों हैं? और इस पूरे घटनाक्रम में जनगणना की चर्चा क्यों हो रही है?

दरअसल, सरकार ने लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक विधेयक संसद में पेश किया है. इस पर संसद के विशेष सत्र में चर्चा जारी है.

लोकसभा में इस समय कुल 543 सीटें हैं, जिन पर आम चुनाव होते हैं. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक इस सीमा को बढ़ाकर 850 करने वाला था.

लेकिन लोकसभा में सरकार इस संशोधन विधेयक को पास नहीं करवा पाई.

1. ये डीलिमिटेशन होता क्या है?

डीलिमिटेशन को हिंदी में परिसीमन कहते हैं.

ये एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे आम तौर पर सेंसस के बाद किया जाता है. जनगणना के बाद ही पता चलता है कि निर्वाचन क्षेत्र की आबादी कितनी है और इसके आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों (लोकसभा और विधानसभा) में बदलाव किया जाता है.

इसके लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है.

अब तक भारत में चार बार- 1952, 1963, 1973 और 2002 में आयोग का गठन किया जा चुका है. इस आयोग को संविधान, शक्तियां और स्वायत्तता देता है और उनके लिए गए निर्णयों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.

1952 में कुल 489 लोकसभा सीटें थीं और 1973 में सीटों की संख्या 543 हो गई. साल 1976 में इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन के ज़रिए परिसीमन पर 25 साल के लिए रोक लगा दी थी.

इसके बाद 2001 में जनगणना हुई और 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 84वां संशोधन कर इस 25 साल के लिए टाल दिया था.

अब नए विधेयक में प्रस्ताव है कि लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 कर दी जाएं.

2. ये मामला महिला आरक्षण से किस तरह जुड़ा है?

साल 2023 में एक क़ानून पारित किया गया था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया गया, लेकिन इसे जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना था.

प्रस्तावित संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में कहा गया है कि इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की "प्रभावी और समर्पित भागीदारी में देरी होगी".

आगे इसमें प्रस्ताव है कि सीटों के परिसीमन में यह आरक्षण "ताज़ा प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों" के आधार पर लागू किया जाए-यानी फिर से 2011 की जनगणना.

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का रोटेशन हर डीलिमिटेशन साइकिल (परिसीमन चक्र) के बाद होगा. यह आरक्षण 15 साल की अवधि के लिए वैध रहेगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है.

हालांकि इस प्रावधान के इस अंतिम उद्देश्य पर ज़्यादातर पार्टियों में सहमति दिखती है लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसे राज्य चुनावों के बीच लाने के समय पर सवाल उठाए हैं.

सरकार के इस कदम का विरोध करने वालों का कहना है कि 33 फ़ीसदी आरक्षण, 543 सीटों में ही देना चाहिए, ना कि सीटें बढ़ाकर उसमें 33 फ़ीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए.

3. महिला आरक्षण को लेकर कब-कब क्या हुआ है?

1987 तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने एक कमेटी का गठन किया था, जिसका काम था नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान फॉर वुमेन पेश करना. इस कमेटी की सिफ़ारिशों से एक थी इलेक्टेड बॉडीज़ में महिलाओं के लिए आरक्षण.

1993 उस समय पीएम थे नरसिम्हा राव और उस दौरान संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों के तहत पंचायती राज संस्थानों के चुनाव में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं. ऐसा ही शहरी निकायों के लिए भी किया गया.

1996 पहली बार पीएम एचडी देवेगौड़ा ने विधायिका में महिलाओं के आरक्षण का बिल पेश किया. 81वें संविधान संशोधन के तहत इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान भी था. अन्य पिछड़ा वर्ग के कई सांसदों ने इसका विरोध किया और आख़िरकार ये बिल ख़ारिज हो गया.

1998 और 1999 में भी महिला आरक्षण से संबंधित बिल पेश करने की नाकाम कोशिश हुई थी.

2010 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में महिला आरक्षण से संबंधित 108वाँ संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पास हो गया. लेकिन यूपीए के अंदर ही इसको लेकर मतभेद हो गए और ये बिल कभी लोकसभा में पेश ही नहीं हो पाया.

2023 में पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने महिला आरक्षण से संबंधित 128वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया. ये विधेयक पास भी हो गया. उस बिल में ये बात कही गई थी कि महिला आरक्षण अगली जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया के बाद लागू होगा.

अब मोदी सरकार इस साल यानी 2026 में इसमें भी संशोधन लेकर आ रही है और इन दो शर्तों को इससे हटाने की बात कह रही है, जिसका विपक्ष विरोध कर रहा है.

4. दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता क्या है?

दशकों से भारत में आबादी में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है. लेकिन दक्षिणी राज्यों ने इसमें बेहतर प्रदर्शन किया है. अगर मौजूदा परिस्थितियों में आबादी के अनुपात में सीटें तय करने का यही मानदंड लागू किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर हो जाएगा.

दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि परिवार नियोजन पर बेहतर काम करने का उन्हें इनाम मिलने के बजाय नुक़सान झेलना पड़ेगा. सीटों को तय करने का आधार जनसंख्या ही होगा तो ज़्यादा जनसंख्या वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में सीटें दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़ जाएंगी और संसद में इन राज्यों से जुड़े मुद्दों को वरीयता दी जाने लगेगी.

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि ऐसा नहीं है.

गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि परिसीमन विधेयक 2026 से दक्षिण के राज्यों को नुक़सान नहीं बल्कि फ़ायदा होगा.

उन्होंने कहा कि 50% वृद्धि मॉडल के बाद लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों की संख्या 816 हो जाने से दक्षिण के सभी राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ जाएगी. गृह मंत्री ने कहा कि लोकसभा में दक्षिण के राज्यों की मौजूदा 129 सीटों की संख्या बढ़कर 195 हो जाएगी और सदन की कुल सीटों में दक्षिण के राज्यों की सीटों का प्रतिशत भी मौजूदा लगभग 24 फ़ीसदी ही रहेगा.

अमित शाह के बयान में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल की मौजूदा सीटों और विधेयक पास होने की सूरत में भविष्य की सीटों का ब्योरा दिया गया है, लेकिन उत्तर भारतीय राज्यों की लोकसभा सीटें बढ़कर कितनी हो जाएंगी, इसकी जानकारी नहीं दी गई है.

5. जनगणना का क्या मामला है?

कई दशकों के बाद प्रस्तावित इस परिसीमन से भारत का राजनीतिक नक़्शा बदल सकता है.

परिसीमन या सीटों का पुनर्वितरण जनसंख्या के आधार पर किया जाना है और इसके लिए साल 2011 की जनगणना को आधार माना जा सकता है.

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सरकार ने डीलिमिटेशन कमिशन एक्ट के अंदर कोई बदलाव नहीं किया है, पुराने एक्ट को फ़ुल स्टॉप और कॉमा के साथ रिपीट किया है.

गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि परिसीमन आयोग की रिपोर्ट तभी लागू होगी, जब संसद उसे मंज़ूरी देगी और राष्ट्रपति की मुहर लगेगी. इसलिए यह प्रक्रिया 2029 से पहले लागू होने का प्रश्न ही नहीं उठता.

सरकार का कहना है कि चुनावों में चाहे तमिलनाडु हो या पश्चिम बंगाल इनमें इस एक्ट का कोई असर नहीं होगा.

साल 2029 तक होने वाले सभी चुनाव वर्तमान व्यवस्था और मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही संपन्न होंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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