वाक़ई, थकान से मौत भी हो सकती है?

थकान
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आपके दफ़्तर में बहुत से लोग हफ़्ते की छुट्टी के बाद भी थके हुए नज़र आते होंगे.

कई बार आपको भी दो दिन के वीकली ऑफ़ के बावजूद ताज़गी नहीं महसूस होती होगी.

कभी सोचा आपने कि आख़िर इसकी क्या वजह है?

होता यूं है कि लोग छुट्टियों में भी देर रात तक फ़ोन पर लगे रहते हैं. ऑफ़िस की ई-मेल पढ़ते हैं.

घर पर रहते हुए भी कॉन्फ्रेंस कॉल निपटाते हैं. कुल मिलाकर छुट्टी के दिन भी लोग दफ़्तर की ज़िम्मेदारियों को सिर पर सवार रखते हैं.

ऐसे में जब वो दो दिन की छुट्टी के बाद दफ़्तर आते हैं तो तरोताज़ा लगने के बजाय थके हुए नज़र आते हैं.

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ऐसे हालात पूरी दुनिया में हैं. कुछ लोग आगे बढ़ने के लिए अपने छुट्टी के दिन को भी क़ुर्बान करने को तैयार रहते हैं.

तो कुछ के लिए छुट्टी के दिन भी कंपनी का काम करना मजबूरी होती है.

आज नई-नई तक़नीक़ के चलते आप 24 घंटे अपने दफ़्तर से जुड़े रहते हैं.

इसी वजह से ज़िंदगी में हमेशा तनाव बना रहता है.

अमरीका के इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेस के मुताबिक़, काम के तनाव के चलते अमरीकी अर्थव्यवस्था को हर साल 300 अरब डॉलर का नुक़सान होता है.

ऑनलाइन ट्रैवेल कंपनी एक्सपेडिया के मुताबिक़ उसके केवल आधे कर्मचारी साप्ताहिक छुट्टी के बाद ताज़गी के साथ दफ़्तर आते हैं.

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ब्रिटेन में 'सैटरडे सिंड्रोम' की बड़ी चर्चा होती है, जब लोग अपने ख़ाली वक़्त में बीमार पड़ जाते हैं.

वहीं अमरीका में हफ़्ते में साठ घंटे काम करने का चलन तनाव बढ़ा रहा है. लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है.

जापान में तो काम के बोझ के चलते मौत के लिए नया शब्द ही ईजाद कर लिया गया है-करोशी, यानी थकान से मौत.

ब्रिटेन की सामन्था किंग कहती हैं कि लोगों को हर वक़्त फ़ेसबुक स्टेटस या इंस्टाग्राम पर फोटो अपडेट करना होता है.

यूं लगता है कि ऐसा नहीं किया तो मानों ज़िंदगी में कुछ नहीं किया. लोग सवाल पूछने लगते हैं कि आप ठीक हैं कि नहीं.

वैसे कुछ थके हुए लोगों के साथ कुछ ऐसे भी होते हैं जो छुट्टी के बाद एकदम फ्रेश नज़र आते हैं.

इनमें से कई तो ऐसे होते हैं जिनके ऊपर काम का बोझ ज़्यादा होता है.

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आख़िर क्यों कुछ लोग बीमार पड़ जाते हैं तो कुछ लोग ज़्यादा काम होने पर भी ताज़ादम नज़र आते हैं.

अमरीका में मनोवैज्ञानिक जेनिफ़र रैग्सडेल कहती हैं कि जब आप दफ़्तर का तनाव घर ले जाते हैं तो ये आपके दिमाग़ को एक्टिव रखता है.

उन बातों पर उसका ध्यान लगा रहता है, जिनसे आप दफ़्तर में जूझते हैं. ये आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं.

बहुत दिनों से इस बात की तुलना की जा रही है कि जो लोग वीकेंड पर भी दफ़्तर का काम निपटाते हैं और जो लोग छुट्टियों में पूरी तरह काम से दूर रहते हैं, उनमें क्या फ़र्क़ होता है?

मगर इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है. जेनिफर कहती हैं कि दो लोग अलग हालात में अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं.

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असल में सबकुछ हमारी सोच, हमारे दिमाग़ में होता है. जो लोग पॉज़िटिव थिंकिंग वाले होते हैं उनके लिए घर पर भी दफ़्तर का काम थकाने वाला नहीं होता.

वहीं जो लोग नेगेटिव थिंकिंग वाले होते हैं, उनके लिए हर जगह, हर काम उबाऊ और थकाने वाला होता है.

ये लोग छुट्टियों के दिन भी थकान उतारने में नाकाम रहते हैं. फिर दफ़्तर लौटते हैं तो थके हुए नज़र आते हैं.

तनाव से निपटने का तरीक़ा भी अलग-अलग हो सकता है. मनोवैज्ञानिक जेन क्लार्क कहती हैं कि कई बार थकान उतारने में भी लोग खीझ उठते हैं.

उन्हें लगता है कि कितने दिनों से उन्होंने ई-मेल या सोशल मीडिया अकाउंट ही नहीं चेक किया. इससे भी उनका तनाव बढ़ सकता है.

यानी कुछ लोगों के लिए ख़ाली बैठना भी तनाव को दावत देने जैसा है. तो उन्हें कुछ न कुछ काम करते रहना चाहिए.

जैसे कि योग या ध्यान करें. किसी खेल-कूद में मन लगाएं. दौड़ने ही निकल जाएं.

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या जाकर पास के पार्क में टहलें. इससे तनाव कम करने में मदद मिलेगी.

चीज़ों और माहौल को लेकर अपनी सोच में बदलाव लाना, तनाव कम करने के लिए बहुत ज़रूरी है.

सोच में बदलाव लाने में थोड़ा वक़्त लगता है. तीन से छह महीने भी लग सकते हैं.

तब तक आप अपने आप को बदलने की कोशिश जारी रखिए. और हां, दफ़्तर जाना मत छोड़िए.

क्योंकि रोज़ के रूटीन के साथ बदलाव आएगा तो ही वो स्थायी होगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160728-this-is-why-you-cant-switch-off-at-the-weekend" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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