चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण, फिर भी नहीं थम रहा एसआईआर विवाद, अब आगे क्या होगा? 5 बड़े सवाल

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चुनाव आयोग (ईसी) ने स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न (एसआईआर) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद के बीच शनिवार को बैठक की.
इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हुए. बैठक के बाद ईसी ने कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी बड़े फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे. आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया में कुछ बदलावों का भी एलान किया है. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के सवाल ख़त्म नहीं हुए हैं.
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दलों ने आयोग के स्पष्टीकरण का स्वागत किया है. ऐसे में सवाल है कि विवाद अब किस दिशा में जाएगा?
यह बैठक इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद हुई जिसमें चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर, वोटर डेटा और फ़ॉर्म-6 से जुड़े मुद्दों पर मतभेद का दावा किया गया था.
बैठक के बाद आयोग ने कहा कि एसआईआर से जुड़े उसके आदेश और शेड्यूल तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से जारी हुए हैं. आयोग ने यह भी कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की कैबिनेट सचिव को भेजी गई चिट्ठियां आयोग की किसी नीति या एसआईआर के फ़ैसले से जुड़ी नहीं थीं.
लेकिन कांग्रेस ने आयोग के बयान को टाल-मटोल वाला बताते हुए कहा कि इससे उसके उठाए मूल सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. पार्टी ने एसआईआर रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग दोहराई है.
वहीं, बीजेपी का कहना है कि आयोग के बयान से साफ़ हो गया है कि एसआईआर को लेकर लगाए गए आरोपों का आधार नहीं है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने विपक्ष पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया.
1. चुनाव आयोग ने क्या कहा और विपक्ष को इसमें क्या 'कमी' दिखी?

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आयोग का सबसे अहम जवाब था कि एसआईआर को लेकर तीनों चुनाव आयुक्तों में सहमति थी.
आयोग ने यह भी कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की कैबिनेट सचिव को भेजी गई चिट्ठी किसी चुनावी नीति या एसआईआर के फ़ैसले से जुड़ी नहीं थी. यह एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा मामला था.
- नोटिस पाने वाले मतदाताओं के दस्तावेज़ लेने के लिए बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) उनके घर जा सकेंगे. सामान्य तौर पर उन्हें इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफ़िसर (ईआरओ) या असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफ़िसर (एईआरओ) के सामने व्यक्तिगत रूप से जाने की ज़रूरत नहीं होगी. ज़रूरत पड़ने पर सुनवाई ऑनलाइन भी हो सकती है.
- आयोग ने यह भी कहा कि ईसीआईएनईटी (चुनाव आयोग का पोर्टल) की स्वतंत्र समीक्षा के लिए विशेषज्ञों वाली समिति बनाई जाएगी. बैठकों का एजेंडा पहले से साझा करने और मिनट्स जारी करने की व्यवस्था पर भी ज़ोर दिया गया है.
लेकिन कांग्रेस ने इसे विवाद का समाधान नहीं माना.
कांग्रेस का कहना है कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने फ़ॉर्म 6 में बदलाव को "अनाधिकृत और ग़ैर-क़ानूनी" कहा था, तो इस पर स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया.
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर आयोग के प्रेस नोट को "टू लेम, टू लिटिल, टू लेट" बताया.
उन्होंने कहा कि प्रेस नोट ने तीन बड़े सवालों के जवाब नहीं दिए- फ़ॉर्म-6 में बदलाव, युवा मतदाताओं का सवाल और ईसीआईएनईटी.
पवन खेड़ा ने एक्स पर लिखा, "जब तक चुनाव आयोग ख़ास क़ानूनी आपत्तियों का जवाब नहीं देता, तब तक कितने भी लंबे प्रेस नोट जारी कर दिए जाएं, सर्वसम्मति का कितना भी दावा कर लिया जाए या कोई और तमाशा कर लिया जाए, इससे ज्ञानेश कुमार गुप्ता की मुश्किलें ख़त्म नहीं होंगी."
"अभी भी उनके लिए देर नहीं हुई है. उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए और सरकारी गवाह बन जाना चाहिए, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहना चाहिए."
2. फ़ॉर्म-6 और युवा वोटरों का सवाल क्या है?

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'फॉर्म-6' वह फ़ॉर्म है जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम जोड़ने के लिए किया जाता है.
कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर से जुड़े बदलावों के दौरान इस फ़ॉर्म में ऐसा सवाल जोड़ा गया, जिससे नए मतदाताओं को अपने या अपने माता-पिता/दादा-दादी के पुराने एसआईआर रिकॉर्ड से संबंध बताना पड़ा.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को "अनाधिकृत और ग़ैर-क़ानूनी" बताया था.
चुनाव आयोग ने अपने नए प्रेस नोट में कहा कि एसआईआर से जुड़ा फ़ॉर्म-6 डिक्लेरेशन सुप्रीम कोर्ट से बरकरार रखा गया है.
कांग्रेस का कहना है कि जिन राज्यों में एसआईआर के बाद चुनाव हो चुके हैं, वहां युवा मतदाताओं का क्या होगा. पवन खेड़ा ने खास तौर पर पूछा कि बिहार और पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद बिना स्पेशल समरी रिवीज़न यानी एसएसआर के चुनाव हो गए, तो वहां एसआईआर के दौरान छूटे युवा मतदाताओं का क्या होगा? उन्होंने यह भी पूछा कि जनवरी 2024 के बाद एसएसआर नहीं हुआ तो पुराने फ़ॉर्म-6 की प्रासंगिकता क्या है
चुनाव आयोग ने दिल्ली में 29-30 सितंबर को युवा मतदाताओं के लिए विशेष कैंप्स लगाने का निर्देश दिया था. इसके बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर इसे "पैनिक रिएक्शन" बताया.
उनका आरोप था कि एक तरफ़ चुनाव आयोग युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए कैंप लगा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ़ फ़ॉर्म-6 में ऐसा नया मैंडेटरी रिएक्शन जोड़ा गया, जिसमें आवेदक से पूछा गया कि उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछली एसआईआर में मतदाता थे या नहीं. रमेश का कहना है कि इससे पहली बार वोट देने वाले जेन-ज़ी मतदाताओं के लिए नाम जुड़वाना मुश्किल हुआ.
3. बीजेपी का जवाब क्या है?

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बीजेपी ने आयोग के प्रेस नोट को अपने लिए महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण बताया है.
बीजेपी सांसद और प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि यह दावा ग़लत साबित हुआ कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के बीच असहमति थी और मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंच गया था.
पात्रा ने कहा कि आयोग के बयान ने इन आरोपों को स्पष्ट रूप से नकार दिया है.
पात्रा ने यह भी कहा कि अधिकारियों की बैठक और प्रशासनिक मामलों पर चर्चा को चुनाव आयोग के भीतर मतभेद के तौर पर पेश करना गलत है.
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने के लिए प्रोपेगेंडा करने का आरोप लगाया.
4. एनडीए के सहयोगियों का रुख़ क्या है?

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इस मामले में एनडीए सहयोगियों का रुख़ भी महत्वपूर्ण है.
टीडीपी (तेलुगु देशम) प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने आयोग के ताज़ा स्पष्टीकरण का स्वागत किया.
उन्होंने इसे "सर्वसम्मति से दिया गया स्पष्टीकरण" बताया और कहा कि इससे संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर पैदा हुई गलतफ़हमियां दूर होती हैं.
लेकिन इससे पहले एनडीए के कुछ सहयोगी दलों ने आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी.
लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के नेता चिराग पासवान ने कहा था कि आयोग को लोगों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना चाहिए ताकि संवैधानिक संस्था में जनता का भरोसा बना रहे.
5. अब आगे क्या होगा?

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सबसे बड़ा अगला राजनीतिक पड़ाव 30 सितंबर है.
विपक्षी इंडिया ब्लॉक के दल उस दिन बैठक करने वाले हैं. इसमें एसआईआर, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर आगे की रणनीति पर चर्चा हो सकती है.
कांग्रेस पहले ही ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर चुकी है.
राहुल गांधी ने भी चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं. कांग्रेस के मुताबिक़ वह आयोग पर अपना भरोसा खो चुकी है.
कांग्रेस के अलावा डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने भी ज्ञानेश कुमार को हटाने और एसआईआर रोकने की मांग की है.
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कहा है कि लोकतंत्र तभी मज़बूत रह सकता है जब लोगों को चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर पूरा भरोसा हो.
वहीं, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 26 सितंबर को सेरामपुर की रैली में कहा कि "मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देना होगा, वरना हमारा आंदोलन जारी रहेगा."
उन्होंने एसआईआर को लेकर आरोप लगाया कि इसके ज़रिए बंगाल में वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए और बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश हुई.
ज्ञानेश कुमार से जुड़ा एक और विवाद आया सामने
इसी बीच 26 सितंबर को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केरल के पूर्व मुख्य सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी जिजी थॉमसन के हालिया दावों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर फिर सवाल उठाए.
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "पहले ज्ञानेश कुमार का इस्तेमाल बीजेपी के लिए लोगों की भर्ती करने में किया गया. फिर मोदी और शाह ने उन्हें अंपायर बना दिया और भारत के चुनावों में मैच फिक्सिंग की ज़िम्मेदारी सौंप दी."
दरअसल, केरल के पूर्व मुख्य सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी जिजी थॉमसन ने दावा किया है कि ज्ञानेश कुमार ने उन्हें बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने की सलाह दी थी.
जिजी थॉमसन ने ऑनमनोरमा को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि यह बातचीत साल 2016 में हुई थी, जब दोनों ही सरकारी सेवा में थे.
उनके अनुसार, यह मुलाक़ात दिल्ली जाने वाली एक उड़ान के दौरान हुई थी. उस समय वह केरल के मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत थे.
थॉमसन ने कहा कि ज्ञानेश कुमार से उनकी अच्छी मित्रता थी. बातचीत के दौरान ज्ञानेश कुमार ने उनसे पूछा कि रिटायरमेंट के बाद उनकी क्या योजना है.
इस पर उन्होंने जवाब दिया कि उन्होंने कोई विशेष योजना नहीं बनाई है.
थॉमसन के अनुसार, इसके बाद ज्ञानेश कुमार ने उन्हें सुझाव दिया कि वह वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी उम्मीदवार के रूप में लड़ें.
जिजी थॉमसन ने दावा किया कि ज्ञानेश कुमार ने उनसे कहा था कि चुनाव जीतकर वे सांसद बन सकते हैं और आगे चलकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री बनने का अवसर भी मिल सकता है.
हालांकि, थॉमसन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और चुनावी राजनीति में जाने से इनकार कर दिया था.
राहुल गांधी ने इस आरोप का हवाला देते हुए ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा और चुनावों में "मैच-फ़िक्सिंग" का आरोप लगाया.
इस आरोप पर ज्ञानेश कुमार की तरफ़ से प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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