40 से ऊपर तो हफ़्ते में 25 घंटे ही करें काम

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर
    • Author, जॉर्जिना केन्यॉन
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल
  • प्रकाशित

एक ताज़ा रिसर्च के मुताबिक़, अगर आप ज़्यादा काम करते हैं तो आपके दिमाग़ पर बुरा असर पड़ता है.

ये रिसर्च ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न इंस्टीट्यूट ऑफ़ एप्लाइड इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च ने किया है.

रिसर्च के मुताबिक़, 40 साल से ज़्यादा उम्र के लोग अगर हफ़्ते में 25 घंटे से ज़्यादा काम करते हैं तो चीज़ों के संज्ञान लेने की उनकी ताक़त कमज़ोर पड़ने लगती है.

मेलबर्न के शोधकर्ताओं ने 40 साल से ज़्यादा उम्र के क़रीब छह हज़ार लोगों पर सर्वे किया था.

उनके पढ़ने की आदत के बारे में जानकारी जुटाई. फिर उनकी याददाश्त का इम्तिहान लिया.

फिर इसके नतीजों का मिलान उनके काम करने के घंटों के साथ किया गया.

ये रिसर्च करने वालों का दावा है कि हफ़्ते में 25 से ज़्यादा घंटे काम करने का दिमाग़ी ताक़त पर बुरा असर पड़ता है.

ये रिसर्च टोक्यो यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर कॉलिन मैकेंज़ी की अगुवाई में किया गया था.

उन्होंने कहा कि काम करने से हमारे दिमाग़ की गतिविधि बढ़ जाती है.

लेकिन प्रोफ़ेसर कॉलिन मैकेंज़ी ये भी कहते हैं कि ज़्यादा काम करने से थकान होती है, तनाव होता है.

सवाल ये है कि चालीस की उम्र ही वो पड़ाव क्यों है जब ये दिक़्क़त होती है?

प्रोफ़ेसर मैकेंज़ी के मुताबिक़ किसी भी चीज़ को सोचने-समझने की हमारी क़ाबिलियत बीस साल की उम्र के बाद घटने लगती है.

प्रोफ़ेसर मैकेंज़ी कहते हैं कि काम दुधारी तलवार की तरह है. एक तरफ़ तो ये दिमाग़ के काम करने को बेहतर बना सकता है.

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर

वहीं ज़्यादा काम करने से आपको दिमाग़ी थकान का भी सामना करना पड़ सकता है.

वक़्त और ज़रूरत की मांग है कि आज हम ज़्यादा उम्र तक काम करें.

हफ़्ते में पांच दिन, रोज़ आठ घंटे काम करें ताकि अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बनी रहे.

मगर हमारा दिमाग़ इतना तनाव झेलने के लिए अभी तैयार नहीं हुआ है.

पहले हुए रिसर्च से भी ये बात सामने आ चुकी है कि ओवरटाइम करने वालों को ज़्यादा तनाव और दिमाग़ी बीमारियों का सामना करना पड़ता है.

1996 में अमरीका के बॉस्टन शहर में ऐसा ही तजुर्बा हुआ था.

इसमें पता चला था कि मोटरगाड़ियों के उद्योग में ओवरटाइम करने वाले कर्मचारियों को कई तरह की दिमाग़ी बीमारियों का सामना करना पड़ता है.

प्रोफ़ेसर मैकेंज़ी का रिसर्च, बॉस्टन में हुए तजुर्बे से अलग ही नतीजे देने वाला है.

इसके मुताबिक़ ओवरटाइम ही नहीं, चालीस की उम्र के बाद हफ़्ते में 40 घंटे काम करने वाला भी तमाम बीमारियों को दावत देता है.

हालांकि चालीस की उम्र के बाद ये परेशानी बढ़ने की और भी वजहें हैं.

प्रोफ़ेसर मैकेंज़ी कहते हैं कि चालीस के आस पास की उम्र में लोगों को या तो अपने बच्चों की या फिर अपने मां-बाप की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है.

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर

ये काम के साथ और काम करने जैसा होता है.

अमरीका में हुए सर्वे के मुताबिक़, बुजुर्ग मां-बाप या रिश्तेदारों की देख-रेख करने वालों की अमरीका में औसत उम्र 49 साल के आस-पास होती है.

इसके अलावा उनकी पेशेवर और दूसरी घरेलू ज़िम्मेदारियां भी होती हैं. नींद न आने से ये परेशानी और भी बढ़ जाती है.

ख़ास तौर से काम के लंबे घंटे और थकाऊ हफ़्ता, आपकी क़ाबिलियत को कम कर सकता है.

हालांकि पहले कामयाब लोग बड़ी ख़ुशी से ये दावा करते थे कि वो बहुत कम सोते हैं.

जैसे कहा जाता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ़ चार घंटे की नींद लेते हैं.

इसी तरह ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के बारे में भी कहा जाता है कि वो भी केवल चार घंटे की नींद लेकर पूरा दिन काम कर लेती थीं.

लेकिन उनके कई वीडियो में वो ऊंघती हुई नज़र आई हैं.

इसी तरह हफिंग्टन पोस्ट की संपादक एरियाना हफिंग्टन भी दावा करती थीं कि वो केवल पांच घंटे की नींद से काम चला लेती हैं.

लेकिन, एक दिन वो दफ़्तर में ही सो गई थीं. जिसके बाद उन्होंने अच्छी नींद न होने को बीमारी के तौर पर लिया और इसे नया नशा बताने लगीं.

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर

मगर, दिक़्क़त ये है कि अब तक किसी को ये नहीं पता कि कितनी नींद ज़रूरी है.

अमरीका का नेशनल स्लीप फाउंडेशन कहता है कि 26 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए सात घंटे की नींद काफ़ी है.

नई चीज़ सीखने की क़ाबिलियत और याददाश्त, पूरी तरह से नींद और खेल-कूद, मनोरंजन की बुनियाद पर टिकी है.

अमरीका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर कार्ल एरिक्सन कहते हैं कि बेहतर ढंग से काम करने के लिए अच्छी नींद आना ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर एरिक्सन ने भी प्रोफ़ेसर मैकेंज़ी जैसा ही सर्वे किया है.

वो इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि हफ़्ते में चालीस घंटे काम करना अच्छी बात नहीं.

हालांकि वो इसका उम्र से कोई वास्ता नहीं बताते.

प्रोफ़ेसर एरिक्सन के मुताबिक़ कामयाब लोग अक्सर हफ़्ते में 21 से 35 घंटे काम करते हैं.

हालांकि किसी दिन ये काम आठ-दस घंटे और किसी दिन दो-तीन घंटे होता है.

लेकिन, ये बात तो साफ़ है कि हफ़्ते में 21 से 35 घंटे का काम हमारे दिमाग़ के लिए ठीक है. इससे ज़्यादा करना पड़े तो मुसीबत.

अगर, लोगों के पास पैसे हों और विकल्प मौजूद हों तो कोई भी ज़्यादा काम नहीं करना चाहेगा.

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर

मगर जिसे ज़्यादा पैसों की ज़रूरत है उसे ज़्यादा काम करना होगा.

ऐसे में वो चालीस के बाद हफ़्ते में 25 घंटे ही काम करने की शर्त पर नहीं चल सकता.

कुछ कामकाजी लोग तो इस रिसर्च को ही ख़ारिज करते हैं.

जैसे कि ऑस्ट्रेलिया के रिचर्ड सैलिसबरी जिन्होंने नौकरी भी की है और पार्ट-टाइम काम भी किया है.

वो कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं कि ज़्यादा काम करने से अक़्ल कमज़ोर होती है.

सैलिसबरी के मुताबिक़ बढ़ती उम्र के साथ उनका तजुर्बा बढ़ता गया और वो ज़्यादा काम का बोझ संभालने के लायक़ बने.

लंदन की रहने वाली पेनी इवांस इस बारे में दो तरह की राय रखती हैं. आजकल वो हफ़्ते में चार दिन काम करती हैं.

मगर पहले वो हफ़्ते में केवल 25 घंटे काम किया करती थीं.

पेनी कहती हैं कि घर-परिवार के लिहाज़ से हफ़्ते में तीन दिन काम करना बहुत अच्छा होगा.

लेकिन दफ़्तर में तो आप इतना कम काम करने पर किनारे लगा दिए जाएंगे.

पेनी इवांस कहती हैं कि इस बारे में हमारा रुख़ लचीला होना चाहिए.

अगर आप काम का तनाव झेल सकते हैं तो आप हफ़्ते में चार-पांच दिन काम कर लीजिए.

अगर घर-दफ़्तर की ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाने से तनाव हो रहा है, तो आपको काम के घंटे कम करने चाहिए.

पेनी के मुताबिक़, हफ़्ते में कितना काम करना ठीक होगा, इस सवाल का जवाब आसान नहीं.

आज दौर बदल गया है. आप दफ़्तर से निकलकर भी सोशल मीडिया, ई-मेल वग़ैरह के चलते दफ़्तर से जुड़े रहते हैं.

ज़्यादा काम से अक़्लमंदी पर बुरा असर

इस बहस में ब्रिटेन के न्यू हैम कॉलेज की कैरोल ब्लैक की बात सबसे सटीक लगती है.

वो कहती हैं कि काम अच्छा होना चाहिए. फिर इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि काम के घंटे कितने हैं.

अगर काम अच्छा नहीं है तो वो बोझ उठाना किसी की भी सेहत के लिए नुक़सानदेह होगा.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160714-is-full-time-work-bad-for-our-brains" platform="highweb"/></link><link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160714-is-full-time-work-bad-for-our-brains" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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