नेचर चैलेंज के रहे चौंकाने वाले नतीजे

    • Author, जेरेमी कोल्स
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ
  • प्रकाशित

क़ुदरत से नज़दीकी होने पर हम ज़्यादा ख़ुशी महसूस करते हैं और हमारी सेहत बेहतर होती है.

क़ुदरती माहौल के शौक़ीन लोग तो यही कहेंगे कि हम तो पहले से ही ऐसा मानते थे और हाल के दिनों में ऐसे तमाम अनुभव हमारे सामने आए हैं.

पिछले दिनों ब्रिटेन में अलग तरह का अनुभव किया गया और वह था एक महीने का 'नेचर चैलेंज'.

पिछले साल कुछ लोगों को कुछ अलग, रोमांचक और जोख़िम भरा काम करने को कहा गया, वो भी एक-दो दिन नहीं, बल्कि लगातार तीस दिनों तक.

इस दौरान प्रकृति के पास वक़्त बिताने के साथ-साथ लोगों से कुछ सवाल भी पूछे गए.

ये सवाल कुछ इस तरह के थे, जैसे कि वो ख़ुद को क़ुदरत के कितने क़रीब पाते हैं? क्या वो ऐसा महसूस करते हैं कि वो प्रकृति से बातचीत करते हैं? अगर हां, तो कैसे?

या फिर, क़ुदरती माहौल में वक़्त बिताकर क्या वो ज़्यादा बेहतर और ख़ुशी महसूस करते हैं?

ये सवाल, 'नेचर चैलेंज' के शुरू होने से पहले और मुक़ाबले के दौरान भी किए गए.

यही नहीं, इस तरह के माहौल से बाहर आने के दो महीने बाद भी, इसमें शामिल लोगों से ये सवाल पूछे गए.

ब्रिटेन की डर्बी यूनिवर्सिटी ने, ग़ैर-सरकारी संगठन 'द वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट' की मदद से लोगों के अनुभव को जानने की कोशिश की, ताकि तीस दिनों के 'नेचर चैलेंज' के असर का पता लगाया जा सके.

आम तौर पर हम सबको लगता है कि क़ुदरत हमारे ऊपर अच्छा असर डालती है, लेकिन इस तजुर्बे से जुड़ी लूसी मैकरॉबर्ट कहती हैं कि उनके सवालों के जो जवाब मिले, वो उम्मीद से कई गुना बेहतर थे.

प्रकृति के नज़दीक एक महीने बिताने के बाद लोग ज़्यादा सेहतमंद और ख़ुश महसूस कर रहे थे.

चिड़ियों को दाना ख़िलाकर, मधुमक्खियों के लिए फूल वाले पौधे लगाकर, उन्होंने बहुत अच्छा महसूस किया.

लोगों ने अपनी ज़िंदगी में ये बेहतरी न सिर्फ़ 'नेचर चैलेंज' के दौरान, बल्कि उसके कई महीनों बाद तक महसूस की.

क़रीब तीस फ़ीसद लोगों ने कहा कि उनकी सेहत में सुधार हुआ है, क्योंकि 'नेचर चैलेंज' में शामिल होने से उनका क़ुदरत से मेल-जोल का तरीक़ा बदला है.

जहां लोग पहले पेड़ पौधों के बीच कम वक़्त बिताते थे, वहीं इस मुक़ाबले के बाद उन्होंने क़ुदरती माहौल में ज़्यादा वक़्त बिताना शुरू कर दिया.

जिन बच्चों को प्राकृतिक माहौल में ज़्यादा वक़्त बिताने का मौक़ा मिला, उनका आत्मविश्वास और हौसला भी बढ़ा.

बच्चों के मुताबिक़, उन्हें क़ुदरत ने जोख़िम लेने का तरीक़ा सिखाया. उनकी क्रिएटिविटी भी इस दौरान बेहतर हुई.

इस दौरान बच्चों का किसी एक चीज़ में मन लगने की परेशानी भी दूर हुई.

'नेचर चैलेंज' में शामिल, जो लोग डिप्रेशन या फ़िक्र से परेशान थे, उन्हें अपनी बीमारियों से भी राहत मिली.

लूसी मैकरॉबर्ट्स कहती हैं कि क़ुदरत, हर मर्ज़ का चमत्कारिक इलाज नहीं है, लेकिन इसके बीच वक़्त बिताने से आप ख़ुश और सेहतमंद महसूस करेंगे.

डर्बी यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर माइल्स रिचर्डसन भी इस 'नेचर चैलेंज' के तजुर्बे से जुड़े हुए थे.

उन्होंने बताया कि ये कोई छोटा-मोटा प्रयोग नहीं था, इसमें 18 हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हुए थे, जिन्होंने मौज मस्ती के लिए इसमें भाग लिया.

डॉक्टर रिचर्डसन कहते हैं, "इस बात के सबूत पहले से मौजूद हैं कि क़ुदरत के क़रीब होने से आपका तनाव, ब्लड प्रेशर कम होता है, सांस लेने में परेशानी और दिल की दिक़्क़तें दूर होती हैं. किसी चीज़ में आपका ध्यान लगाकर काम कर सकें, इसके लिए आप क़ुदरत से मेल-जोल बढ़ाएं. इसका एक फ़ायदा यह भी है कि आप ज़्यादा राहत भी महसूस करेंगे".

डॉक्टर रिचर्डसन ने कहा कि लोगों को बेहतर और ख़ुशहाल ज़िंदगी के लिए क़ुदरत के बीच ज़्यादा वक़्त बिताना चाहिए, लेकिन चुनौती ये है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इस बात के लिए, कैसे राज़ी किया जा सके.

आजकल इसके लिए बहुत से सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठन काम कर रहे हैं, जो लोगों को क़ुदरती माहौल में ज़्यादा वक़्त बिताने की अहमियत समझाते हैं.

प्रकृति के बीच ज़्यादा वक़्त गुज़ारेंगे तो क़ुदरत को भी फ़ायदा होगा, आप पेड़ पौधों की फ़िक्र करेंगे, उनकी देखभाल करेंगे और नए पौधे भी लगाएंगे.

आप परिंदों की चहचहाहट सुनने के लिए उन्हें अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश करेंगे, इससे आपके आस-पास का माहौल ही बेहतर होगा.

जो लोग क़ुदरत को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करेंगे, आप उन्हें रोकेंगे और समझाएंगे.

इसलिए ब्रिटेन का 'वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट' चाहता है कि क़ुदरत से मेल-जोल बढ़ाने की ये मुहिम, एक राजनीतिक कार्यक्रम बन जाए.

उसका मानना है कि कारोबार जगत भी इससे जुड़े और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग भी आम लोगों को समझाने की इस मुहिम का हिस्सा बनें.

ब्रिटेन के 'नेचर चैलेंज' के नतीजों ने साबित किया है कि क़ुदरत हमारी सेहत पर कितना अच्छा असर डालती है.

इसके लिए आपको बहुत मशक़्क़त भी नहीं करनी है. हम जिस तरह से मकान, अस्पताल और सड़कें बनाते हैं; वैसे ही, पेड़ लगाएं और जंगलों का दायरा बढ़ाएं.

इस तरह हम आने वाली पीढ़ी के लिए भी क़ुदरती माहौल तैयार रख सकते हैं.

यह काम किसी एक संस्था, किसी एक इंसान या किसी एक सरकार का नहीं, बल्कि हर इंसान की ज़िम्मेदारी है.

डर्बी यूनिवर्सिटी और द वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट, इस साल भी 'नेचर चैलेंज' के तजुर्बे को दोहराने की तैयारी में है, ताकि ज़िंदगी में तनाव झेल रहे, नाख़ुश लोगों की ज़िंदगी में बेहतर बदलाव आ सके.

तो सोच क्या रहे हैं...घर से बाहर निकलिए और थोड़ा वक़्त तो क़ुदरत के बीच गुज़ारिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां </caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160420-how-nature-is-good-for-our-health-and-happiness" platform="highweb"/></link>क्लिक करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ </caption><url href="http://www.bbc.com/earth/world" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां </caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>क्लिक कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)