वो उज़्बेक शहर जहाँ से आया अलजेब्रा

    • Author, फिलिपा स्टीवर्ट
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
  • प्रकाशित

उज़्बेकिस्तान का शहर खीवा वर्ल्ड हेरिटेज़ साइट में शामिल है. करीब 2000 साल के इतिहास वाले शहर में सिल्क रोड के समय के महलों, मस्जिदों और मक़बरों के खंडहर मिलते हैं. कायजलकुम और काराकुम के रेगिस्तान से घिरा हुआ है ये शहर.

ईरान को जाने वाले कारवां का ये आख़िरी पड़ाव हुआ करता था. और, ये कारवां पेपर, चीनी मिट्टी, मसाले, घोड़े, ग़ुलाम और फल लेकर वहाँ जाते थे.

लेकिन खीवा शहर की सबसे बड़ी ख़ासियत है इस्लामी स्थापत्य से बनी इमारतें.

उज़्बेकिस्तान के अंदर रेगिस्तान में पूर्ण रूप से नख़लिस्तान - रेगिस्तान के बीच हरे-भरे क्षेत्र; जैसा शहर है खीवा. शहर का आंतरिक हिस्सा इचान काला के नाम से जाना जाता है जो 10 मीटर ऊंची ईंट की दीवारों से घिरा है.

इचान काला की बड़ी इमारतों के बाहर आपको अलग दिखने वाली दुकानें नज़र आएंगी. यहां की परंपरागत लाल हैट काफ़ी मशहूर है.

इचान काला से गुजरते हुए इस्लाम ख़्वाजा मदरसा एवं मीनार की उपेक्षा करना संभव नहीं है. 45 मीटर की ऊंचाई वाली यह इमारत खीवा की सबसे ऊंची इमारत है.

खीवा की सबसे शानदार इमारतों में एक है खाल्टा माइनर मीनार. यह मीनार चमचमाते टाइल्स से बनी है और पश्चिमी गेट से जैसे ही आप इमारत के अंदर आते हैं, इसकी ख़ूबसूरती आपको मोहित कर लेती है.

इस मिनी मीनार को मोहम्मद आमीन ख़ान ने बनवाया था. आमीन ख़ान खीवा के मशहूर शासक थे. वे इतनी ऊंची इमारत बनवाना चाहते थे, जिससे दक्षिण पूर्व में 400 किलोमीटर दूर बुख़ारा को देखा जा सके.

उन्होंने मीनार बनवाने का काम 1851 में शुरू किया था. 1855 में उनकी मृत्यु के बाद काम थम गया और तब तक 14 मीटर चौड़ा और 26 मीटर ऊंचा मीनार ही तैयार हो पाया था.

खीवा के शासकों का महल है कुहना आर्क. इसके अंदर की मस्जिद पर 1838 में स्थानीय टाइल्स लगाई गई थीं.

खीवा की कई इमारतों में आपको इस तरह की नक्क़ाशी देखने को मिल सकती है.

शताब्दियों तक मध्य एशिया अध्ययन का केंद्र रहा है. खीवा इसका अपवाद नहीं है. यहां 780 में फ़ारसी विद्वान अबू अब्दलाह मोहम्मद इब्न मूसा अल ख़्वारिज़्म का जन्म हुआ था.

उन्हें कई बार कंप्यूटर साइंस का 'ग्रैंड फादर' भी कहते हैं. दशमलव पद्धति को लोकप्रिय बनाने का श्रेय इन्हें ही है. वैसे अलजेब्रा का जन्म यहीं हुआ है. अलजब्रा पर उन्होंने महत्वपूर्ण किताब लिखी जिसका नाम था - हिसाब अल जबर वल मुक़ाबला. अबू अब्दलाह मोहम्मद की विरासत आज शहर के पश्चिमी दरवाज़े पर उनकी मूर्ति के रूप में भी देखी जा सकती है.

वैसे इस शहर की ख़ूबसूरती केवल दीवारों के अंदर तक सीमित नहीं है. बल्कि ज़्यादातर आबादी इसके बाहरी हिस्से में रहती है.

शहर का मिज़ाज जानना हो तो उसकी नब्ज़ यहां के बाज़ार में महसूस की जा सकती है.

यहां आने के बाद इचान काला के बाहर आप पूर्वी गेट से निकलें तो वहां बाहर शहर का बाज़ार मौजूद है.

शहर के इतिहास और ख़ूबसूरती को जानने के लिए बाहर निकलकर एक कप चाय पीना सबसे बेहतर विकल्प है.

चाय उज़्बेक संस्कृति का अहम हिस्सा है. यहां टी-हाउस को चाय ख़ाना कहते हैं. उज़्बेक लोगों में चाय खाना ब्रिटिश संस्कृति के पब की तरह है और ये ख़ासे लोकप्रिय भी हैं.

चाय देना यहां के स्वागत सत्कार की संस्कृति है. अमूमन यहां चाय बिना दूध और चीनी के पी जाती है और हर खाने की शुरुआत और अंत चाय के कप से होता है.