रात में जगमगाते हैं ये भारतीय जंगल

    • Author, नीलिमा वालांगी
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
  • प्रकाशित

जब हम महाराष्ट्र में मुंबई से 100 किलोमीटर दूर भीमशंकर वाइल्ड लाइफ़ रिज़र्व के जंगलों में भ्रमण के लिए पहुंचे तो आसमान में काले घने बादल मंडरा रहे थे.

सितंबर महीने के आखिरी दिन थे और बीते दो महीने से मानसून का मौसम अपने पूरे शबाब पर था. जंगली जोंक, फिसलने वाली ढलान और लगातार होने वाली बारिश के बावजूद यह भारत के पश्चिमी घाट की ख़ूबसूरती देखने का बेहतरीन समय है.

पहाड़ी चढ़ाई और लैंडस्केप की ख़ूबसूरती के साथ चारों तरफ हरियाली ही हरियाली देखने को मिलती है. प्रत्येक इंच ज़मीन ख़ूबसूरत हरी घास से सजी दिखती है.

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल और दुनिया के आठ बायो-डायवर्सिटी के प्रमुख केंद्रों में से एक पश्चिमी घाट अपनी ख़ास स्थानीय वनस्पतियों के लिए दुनिया भर में मशहूर है.

भारत के पश्चिमी तट पर ये गुजरात से लेकर केरल के दक्षिणी तट तक 1600 किलोमीटर में फैला हुआ है जो बाघ, तेंदुए और ख़ास ब्लैक पैंथर के लिए मशहूर हैं.

जंगली एशियाई हाथी भी यहीं सबसे ज़्यादा पाए जाते हैं. यहां दिसंबर, 2014 में जानवरों की नई प्रजाति का पता चला है. इस रिजर्व की ख़ासियतों के बारे में दुनिया जानती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत का पता हमें रात में चला.

जंगल जगमगा उठा

जंगल के अंदर प्रवेश करने के साथ ही पसीने और बारिश की बूंदें मेरे चेहरे पर छलकने लगी थी. दोपहर में मैंने एक छोटे से आदिवासी समुदाय के ठिकाने एहूपे तक चढ़ाई की थी.

लेकिन इसके बाद शाम से ही बारिश शुरू हो गई थी. रात में हम लोग अपने टॉर्च बंद करके आराम कर रहे थे, तभी जमीन पर हरा रंग चमकने लगा.

ये रोशनी हमें तब दिखी जब आंखों ने रात के अंधेरे में देखने की कोशिश शुरू ही की थी. इसके बाद हमें पूरी रात तक थोड़ी थोड़ी दूरी पर हरी रोशनी दिखाई देती रही. जंगल रोशनी से जगमगा रहा था.

मानसून में जून से अक्तूबर के दौरान, बारिश से प्रभावित इस जंगल में रात में होनी वाली रोशनी बायोल्यूमिनेसेंट फंग्स की वजह से होती है, जो पेड़ पौधों की छाल और टहनियों के सड़ने से बनती है. यह दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी होता है. ख़ासकर उन पुराने जंगलों में जहां तापमान ज्यादा होता है और उष्णकटिबंधीय जलवायु होती है.

नमी और आर्द्रता की वजह से बायोल्यूमिनिसेंट फंग्स ज्यादा होती है. दुनिया भर में ऐसा केवल पश्चिमी घाट के जंगलों में होता है, ख़ासकर महाराष्ट्र और गोवा से सटे क्षेत्रों में.

रोशनी की वजह

यह आसानी से पकड़ में नहीं आता. बायोल्यूमिनिसेंट वाटर और समुद्री जीवों का चमकना तो बेहद आम है, दो बायोल्यूमिनिसेंट जीवों के बारे में ही जानकारी है- एक तो फायर फ्लाई और दूसरा ग्लो वर्म. बायोल्यूमिनिसेंट फंग्स की करीब एक लाख प्रजातियों में 70 ही इतनी बड़ी होती हैं कि उन्हें देखना संभव हो.

पश्चिमी घाट के जंगलों में पाए जाने वाले फंग्स माएसेना जीनस के होते हैं, छोटे छोटे मशरूम के आकार के. वैज्ञानिक आज तक इसका पता नहीं लगा पाए हैं कि ये चमकते क्यों हैं?

चमकने वाली लकड़ी का जिक्र भी अतीत में मिलता रहा है. पहले रोम के प्रकृतिविज्ञानी प्लिनी द एल्डर ने यूरोप में भी पहली शताब्दी के दौरान ऐसे पेड़ों की मौजूदगी की बात कही थी.

कुछ स्कैंडिनेवियन आदिवासी समुदाय तो आज भी घने जंगल में रास्ता देखने के लिए चमकने वाली लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं. अमरीकी अनुसंधानकर्ता डेविड बुशनेल ने 18वीं शताब्दी में पहली सैन्य पनडुब्बी में ग्लोइंग वुड का इस्तेमाल पानी के अंदर प्रकाश के स्त्रोत के रूप में किया था.

जब हम आगे चढ़ने लगे तो मेरी आंखें चमकीली रोशनी को फिर तलाश कर रही थीं, लेकिन यह सब बेकार गया. हालांकि हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमें एक जगह और वैसी चमकीली रोशनी मिली.

अगली सुबह आगे चढ़ने पर हमें सूर्य की चमकीली रोशनी दिखी. इसके बाद हमें महाराष्ट्र के घाटों की सह्याद्री श्रृंखला की चोटियां दिखाई दीं. नीचे देखने पर हमें शानदार झील, हरियाली, जंगली फूल इत्यादि नजर आए. जमीन का हर टुकड़ा हरा ही हरा नजर आ रहा था. मैं बादलों में घिरा था और खुश था कि प्रकृति की ख़ूबसूरती को इतने नजदीक से देखने का मुझे मौका मिला.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/travel/story/20150709-indias-mysterious-glowing-forests" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ</caption><url href="http://www.bbc.com/travel" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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