बाबासाहेब आंबेडकर की पहली प्रतिमा लगाने की कहानी क्या है?

कोल्हापुर के बिंदू चौक पर मौजूद बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, कोल्हापुर के बिंदू चौक पर मौजूद बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, नितिन सुलताने
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

बचपन की कुछ यादें आज भी मेरे मन में ताज़ा हैं, जब मैं अपने परिवार के साथ छत्रपति संभाजीनगर (तब औरंगाबाद) से 50 किलोमीटर दूर अपने पैतृक गांव जाया करता था. आज भी उन दिनों की तस्वीर मेरी आंखों के आगे उभर आती है.

ऐसी ही एक तस्वीर सड़क किनारे स्थित कुछ प्रमुख गांवों के द्वार पर लगी डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमाओं की है.

ऐसा लगता है कि इन गांवों की पहचान इन प्रतिमाओं से हो. हमारे घर के पास भी एक प्रतिमा थी, लेकिन वहां 14 अप्रैल को ही लोगों का जाना होता था.

बचपन में मुझे बस इतना ही पता था कि यह भारत रत्न डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा है. लेकिन उम्र और अनुभव के साथ पता चला कि ये प्रतिमा भारत के एक महान व्यक्ति की है.

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जब मैंने उनकी प्रतिमाओं को देखना शुरू किया, तो मुझे उनमें सिर्फ़ एक व्यक्ति ही नहीं, बल्कि विचारों का एक पूरा संसार, एक जोशीला संघर्ष और अनगिनत सपने दिखाई देने लगे.

इसके अलावा, यह भी समझ में आया कि ये प्रतिमाएं आम लोगों को डॉक्टर आंबेडकर के विचारों के कैसे क़रीब लाती हैं.

दरअसल, ये महज़ धातु-पत्थर की बनीं या किसी ख़ास आकृति की प्रतिमाएं नहीं हैं, बल्कि वास्तव में इतिहास और आत्मसम्मान की प्रतीक हैं.

आज आंबेडकर की प्रतिमाएं खूब देखने को मिलती हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बाबासाहेब की पहली प्रतिमा कौन सी थी? इसे किसने बनवाया था? या इस प्रतिमा के निर्माण के पीछे की क्या कहानी है? हम यहाँ इसी के बारे में जानेंगे.

चलिए शुरुआत भाई बागल से करते हैं, जिन्होंने इस प्रतिमा के निर्माण की पहल की थी.

भाई बागल कौन थे?

भाई बागल

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इमेज कैप्शन, कोल्हापुर के विचारक, स्वतंत्रता सेनानी और कलाकार माधवराव खंडेराव बागल को 'भाई बागल' के नाम से जाना जाता है
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बाबासाहेब आंबेडकर की पहली प्रतिमा की कहानी बेहद ख़ास है. इसका श्रेय कोल्हापुर के विचारक, स्वतंत्रता सेनानी और कलाकार माधवराव खंडेराव बागल को जाता है, जिन्हें 'भाई बागल' के नाम से जाना जाता है.

भाई बागल कोल्हापुर के खंडराव और कमलाबाई बागल के बेटे थे. खंडराव बागल राजर्षि शाहू महाराज के सानिध्य में रहे. वो सत्यशोधक विचारधारा के अनुयायी भी थे. माधवराव (भाई) बागल पर भी इसका प्रभाव पड़ा.

बाद में, जब वो किसान मज़दूर पार्टी के नेता बने, तो लोग माधवराव बागल को 'भाई' के नाम से जानने लगे.

भाई बागल स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे. स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में, विशेषकर छुआछूत और सामाजिक असमानता के ख़िलाफ़ काम करना शुरू किया.

इन सबके साथ-साथ भाई बागल कला प्रेमी भी थे और ख़ुद भी कलाकार थे. उनकी शिक्षा मुख्य रूप से कला के क्षेत्र में हुई थी.

भाई बागल ने डॉक्टर आंबेडकर और महात्मा फुले के साथ-साथ शाहू महाराज और महात्मा गांधी की प्रतिमा बनाने की भी पहल की थी.

महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें 'दलित मित्र' की उपाधि दी है और उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया है.

भाई बागल 'भगवान' में यकीन नहीं करते थे. उन्होंने अपने जीवन से ईश्वर और धर्म की अवधारणा को ही नकार दिया था.

महाराष्ट्र सांस्कृतिक परिषद से प्रकाशित उनके लेखों के संग्रह के अनुसार, महात्मा फुले और डॉक्टर आंबेडकर ही उनके 'ईश्वर' थे.

आंबेडकर की प्रतिमा बनाने का ख़्याल किसके मन में आया

बिंदू चौक पर बनाया गया स्मारक

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बाबासाहेब आंबेडकर की पहली प्रतिमा कोल्हापुर के बिंदू चौक में स्थापित की गई थी. यह आज भी मौजूद है. दिलचस्प बात यह है कि यह प्रतिमा बाबासाहेब के जीवित रहते ही स्थापित की गई थी.

भाई बागल ने अपनी आत्मकथा 'जीवन प्रवाह' में इस प्रतिमा की स्थापना की कहानी का ज़िक्र किया है.

उन्होंने लिखा है कि इस प्रतिमा का विचार एक शादी में आया था.

भाई बागल अपनी आत्मकथा में बताते हैं, "गंगाराम कांबले ने अपने एक रिश्तेदार की शादी में इस प्रतिमा को स्थापित करने का सुझाव दिया था."

गंगाराम कांबले का नाम राजर्षि शाहू महाराज के कारण इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है. उस समय ऊँची जाति के लोगों ने पानी की टंकी को छूने के कारण गंगाराम कांबले को कोड़ों से पीटा था.

शाहू महाराज की गैरमौजूदगी में यह घटना हुई थी. जब उन्हें इस बारे में पता चला, तो राजर्षि शाहू महाराज ने ऐसा करने वालों को कड़ी सज़ा दी.

कोल्हापुर में बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित करने का विचार गंगाराम कांबले के मन में आया और उन्होंने इसे भाई बागल के सामने रखा. भाई बागल ने भी इस संबंध में जल्द ही निर्णय ले लिया.

यह प्रतिमा कैसे बनाई गई?

गंगाराम कांबले से चाय लेते राजर्षि शाहू महाराज की एक भित्ति कोल्हापुर के शाहू मेमोरियल भवन में स्थित है

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भाई बागल ने अपनी किताब 'जीवन प्रवाह' में लिखा है, "गंगाराम कांबले ने यह विचार सुझाया और मैंने उसी समय यह घोषणा कर दी कि मैं इस विचार को पूरा करूंगा और मैंने काम शुरू कर दिया, और जल्द ही वह इच्छा पूरी हो गई."

इस प्रतिमा को बनाने का दायित्व मूर्तिकार बाल चव्हाण को सौंपा गया था. लेकिन इस प्रतिमा को स्थापित करने में सबसे बड़ी चुनौती धन जुटाना था.

प्रतिमा स्थापित करने का अंतिम निर्णय लेने के बाद, एक प्रतिमा समिति का गठन किया गया और काम शुरू हुआ. इस प्रतिमा समिति के अध्यक्ष ख़ुद भाई बागल थे.

इस प्रतिमा के लिए ज़रूरी ज़्यादातर रकम भाई बागल ने प्रतिमा समिति के सहायक वीजी चव्हाण के साथ मिलकर जमा की. भाई बागल का कहना था कि अगर चव्हाण की कार न होती तो धनराशि जुटाने के लिए यात्रा करना संभव न होता.

इस तरह प्रतिमा के लिए धनराशि एकत्रित की गई और प्रतिमा बनाने का काम तेज़ हुआ. हालांकि, भाई बागल ने ज़िक्र किया है कि स्थानीय प्रशासन ने इस कार्य में बाधाएँ भी डालीं.

भाई बागल अपनी किताब में लिखते हैं, "नगरपालिका ने दान और प्रतिमा के लिए स्वीकृत स्थान, दोनों को रद्द कर दिया."

उनके मुताबिक़, प्रतिमा के लिए संगमरमर के एक चबूतरे का अनुरोध किया गया. वो उसके लिए भुगतान को भी तैयार थे लेकिन फिर भी उन्हें इसकी मंज़ूरी नहीं मिली.

आख़िरकार आंबेडकर की प्रतिमा के लिए जगह मिली

भाई बागल (बाएं) बाबासाहेब अंबेडकर की प्रतिमा के साथ (फ़ाइल फ़ोटो)

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उस वक़्त बाबासाहेब आंबेडकर के साथ-साथ महात्मा फुले की प्रतिमा स्थापित करने का भी निर्णय लिया गया. बाबूराव पेंटर ने पीतल की प्रतिमा दान में दी. इसका सारा ख़र्च भाऊसाहेब पाटिल शाहिर और सत्यशोधक समाज के तत्कालीन सचिव ने जुटाया.

इसके बाद 9 दिसंबर, 1950 को दोनों प्रतिमाओं का अनावरण करने का निर्णय लिया गया.

जब किसी प्रतिमा का अनावरण या किसी स्मारक का उद्घाटन करने की बात आती है, तो इस बात पर काफ़ी चर्चा होती है कि इसे कौन करे.

हालांकि, भाई बागल को समाज के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या सरकारी अधिकारी के हाथों प्रतिमाओं का अनावरण करने की परंपरा पसंद नहीं थी.

भाई बागल की राय थी कि डॉक्टर आंबेडकर अपने जीवनकाल में आम लोगों के कल्याण के लिए काम कर रहे थे, इसलिए उनकी प्रतिमा का उद्घाटन भी एक आम व्यक्ति ही करे.

उन्होंने ठीक वैसा ही किया, और 9 दिसंबर, 1950 को, भाई बागल ने उस कार्यक्रम के लिए एकत्रित आम जनता में से दो लोगों का हाथ पकड़कर उन्हें आगे बढ़ाया, और उनके हाथ से प्रतिमा का अनावरण हुआ.

भाई बागल ने कार्यक्रम के लिए एकत्रित हुए आम लोगों में से दो लोगों का हाथ पकड़कर उन्हें आगे बढ़ाया और उन्हीं से मूर्तियों का अनावरण करवाया गया (फ़ाइल फ़ोटो)

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भाई बागल को बाबासाहेब से मिलने का अवसर भी मिला था. उन्होंने महाराष्ट्र राज्य साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड से प्रकाशित लेखों के संग्रह में इसका ज़िक्र किया है.

उन्होंने लिखा है, "मैं कुछ समय के लिए ऐसे महान व्यक्तित्व के सानिध्य में बैठा रहा. उन्होंने जानबूझ कर किसी को मुझे बुलाने के लिए भेजा. उन्होंने कुछ इच्छाएं व्यक्त कीं. मैं ख़ुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैं उसे पूरा कर पाया. मैंने मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर कोच में उनके साथ दोपहर का भोजन भी किया."

डॉक्टर आंबेडकर ने उन्हें एक सलाह भी दी थी.

उनके मुताबिक़ बाबासाहेब ने कहा था, "माधवराव, आप इन लोगों से क्यों डरते हैं? वे आप पर जातिवाद का आरोप ही लगाएंगे, है ना? उन्हें लगाने दीजिए. वे मुझ पर तो नहीं लगाएंगे? इतना बड़ा बहुजन समुदाय जातिवादी नहीं हो सकता. संगठन को मज़बूत होने दीजिए."

माधवराव बागल ने लिखा, "मैंने एक ही बहुत ही पवित्र काम किया है. मुझे इस पर गर्व है. उनकी प्रतिमा भारत में पहली बार मेरी अध्यक्षता में, उनके जीवनकाल में स्थापित की गई थी, और वे स्वयं इसे देख सके थे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.