पाकिस्तान के बढ़े डिप्लोमैटिक प्रोफ़ाइल के बीच यूएई ने उसे झटका क्यों दिया?

यूएई-पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, यूएई के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह बिन ज़ाएद अल-नाह्यान
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

ईरान से अमेरिका और इसराइल के युद्धविराम के बाद पाकिस्तान का डिप्लोमैटिक प्रोफाइल भले बढ़ गया है लेकिन यूएई से उसके संबंधों को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

दलअसल सात वर्षों में पहली बार संयुक्त अरब अमीरात के साथ पाकिस्तान तीन अरब डॉलर के क़र्ज़ को आगे बढ़ाने के समझौते तक नहीं पहुँच सका.

ब्लूमबर्ग के अनुसार, यह क़र्ज़ पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 18% है. इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है. 27 मार्च तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 16.4 अरब डॉलर था, जो लगभग तीन महीने के आयात बिल भरने से ज़्यादा नहीं है.

यह स्पष्ट नहीं है कि यूएई ने इस समय क़र्ज़ क्यों मांगा. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने चार अप्रैल को कहा कि यह एक सामान्य वित्तीय लेन-देन है.

पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच संभावित राजनीतिक मतभेद की अटकलों को कम करने की कोशिश की थी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि रोलओवर की शर्तों पर बातचीत टूट गई थी.

टॉपलाइन सिक्योरिटीज लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहम्मद सुहैल ने ब्लूमबर्ग से कहा, "यूएई को भुगतान अप्रत्याशित था और इसके लिए पहले से कोई व्यवस्था नहीं थी. हमारा मानना है कि केंद्रीय बैंक डॉलर स्वैप के ज़रिए वाणिज्यिक बैंकों से उधार लेने के पुराने तरीक़े को अपनाएगा. आईएमएफ को यह पसंद नहीं है और इसमें तिमाही सीमाएं होती हैं, लेकिन यही एक उपलब्ध विकल्प है."

पाकिस्तान की सरकार बता रही है कि दोनों देशों में किसी भी तरह के मतभेद नहीं हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने चार अप्रैल को जारी एक बयान में कहा था, ''यूएई के क़र्ज़ के संबंध में की गई भ्रामक और निराधार टिप्पणियों को पाकिस्तान सख़्ती से ख़ारिज करता है.''

लेकिन पाकिस्तान में इस क़र्ज़ वापसी को यूएई के भारत के साथ गहराते संबंधों से भी जोड़ा जाने लगा.

सऊदी-पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, पिछले साल सितंबर महीने में सऊदी और पाकिस्तान के बीच डिफेंस पैक्ट हुआ था

यूएई के भारत से रिश्ते को लेकर तंज़

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पाकिस्तान के सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने एक एक टीवी चैनल से बातचीत में यूएई पर तंज़ कसते हुए कहा, ''पाकिस्तान ने उनका पैसा वापस करने का बिल्कुल अच्छा फ़ैसला किया है. यूएई के हमारे भाई मजबूर हैं, ज़रूरतमंद हैं तो उन्हें वापस कर देना चाहिए. वैसे भी यूएई को बनाने में पाकिस्तान का बड़ा किरदार है. लेकिन मैं इन्हें भाई होने के नाते एक मशवरा दूंगा कि जनाब आपकी आबादी एक करोड़ है और इनमें से 43 लाख लोग हिन्दुस्तान के हैं. ज़रा अपना ख़्याल रखें. आपकी उनसे जो दोस्ती बढ़ रही है, उसका नतीजा कहीं ये ना हो कि आप भी अखंड भारत का हिस्सा बन जाएं.''

लेकिन पाकिस्तान में इस तरह के सेंटीमेंट का विरोध भी हुआ.

पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर ने चार अप्रैल को एक्स पर लिखा, ''यूएई की जमा राशि की वापसी को लेकर हो रही भावनात्मक बहस पर मुझे हैरानी है. पाकिस्तान और यूएई के बीच मज़बूत और भाईचारे वाले संबंध रहे हैं और आगे भी बने रहेंगे. दोनों देश समझदार हैं और एक-दूसरे के हितों के साथ फ़ैसलों का सम्मान करते हैं. पाकिस्तान यूएई के हमेशा समर्थन के लिए आभारी है.''

पाकिस्तान की सरकार को इस महीने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान भी करना है. पाकिस्तान अब भी आईएमएफ से 1.2 अरब डॉलर के क़र्ज़ के किस्त का इंतज़ार कर रहा है.

पाकिस्तान के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार डॉन में वहाँ के बिज़नेस पत्रकार ख़ुर्रम हुसैन ने नौ अप्रैल को अपने कॉलम में लिखा है, ''यूएई की ओर से अपनी जमा राशि वापस मांगना पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती है. इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है. पाकिस्तान कुछ हद तक चीन और सऊदी अरब से समर्थन लेकर भी संसाधन जुटा सकता है.''

यूएई के क़र्ज़ को रोलओवर करने में नाकामी को उसके रुख़ में बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है. जब पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ अपने संबंध को मज़बूत कर रहा है, तब यूएई की क़र्ज़ वापसी को इस आईने में भी देखा जा रहा है.

ईरान-पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को लेकर ईरान ख़फ़ा रहता है

पाकिस्तान के लिए झटका

इस्लामाबाद स्थित सस्टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर साजिद अमीन ने ब्लूमबर्ग से कहा, "हमें स्वीकार करना चाहिए कि यूएई की मदद उस समय बहुत अहम थी जब पाकिस्तान आईएमएफ प्रोग्राम के लिए न्यूनतम वित्तीय व्यवस्था पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहा था. मेरा मानना है कि सरकार ने इसे चुकाने का फ़ैसला तब किया जब वह रोलओवर सुनिश्चित नहीं कर पाई. भले ही 6.5% की ऊंची लागत चुकानी पड़ रही थी. हालांकि, बदलती जियोपॉलिटिक्स को पूरी तरह नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता."

पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय यूएई के रुख़ को सामान्य बता रहा है लेकिन वाक़ई यह इतना सामान्य है?

यही सवाल मैंने यूएई में भारत के राजदूत रहे नवदीप सिंह सूरी से पूछा तो उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने क़र्ज़ के बदले यूएई से कई तरह के वादे किए थे लेकिन कोई वादा पूरा नहीं किया.

नवदीप सिंह सुरी कहते हैं, ''यूएई को समझ में आ गया है कि पाकिस्तान जिन कट्टरपंथियों को समर्थन करता है, वह उसके हक़ में नहीं है. जनवरी 2017 में कंधार में तालिबान के हमले में यूएई के डिप्लोमैट मारे गए थे और तब पाकिस्तान तालिबान के साथ था. पाकिस्तान ने अभी जो युद्धविराम कराया, उसमें यूएई को शामिल नहीं किया. यूएई ने सबसे ज़्यादा ईरान के हमले झेले हैं. ईरान ने 2000 से ज़्यादा मिसाइल और ड्रोन हमले यूएई में किए हैं. ऐसे में यूएई को उम्मीद थी कि उसे बातचीत में शामिल किया जाएगा.''

नवदीप सिंह सूरी कहते हैं, ''गल्फ़ के देश पाकिस्तान के साथ हमेशा से खड़े रहे हैं लेकिन यूएई ने अब उदार राष्ट्र के रूप में पहचान बनाई है. ऐसे में वह पाकिस्तान से उम्मीद करता है कि इस्लामिक अतिवाद को हवा ना दे. यूएई के भारत के साथ संबंध भी गहरे हुए हैं. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद सात बार यूएई जा चुके हैं. डॉ जयशंकर अभी यूएई जा रहे हैं. ऐसे में पाकिस्तान के भीतर यूएई और भारत के संबंधों को लेकर असहजता रहती हैं.''

क्या सऊदी अरब और पाकिस्तान के डिफेंस पैक्ट को लेकर भी यूएई नाराज़ है क्योंकि यूएई और सऊदी अरब के रिश्ते अच्छे नहीं हैं.

इसके जवाब में नवदीप सिंह सूरी कहते हैं, ''मेरा मानना है कि यूएई और सऊदी अरब का डिफेंस पैक्ट दिखावे के लिए ज़्यादा है. अभी जब ईरान ने सऊदी पर हमला किया तो पाकिस्तान ने क्या कर लिया? जब कुछ करने की घड़ी आएगी तो पाकिस्तान कुछ भी नहीं कर पाएगा. अबू धाबी में एक आम धारणा बनी है कि पाकिस्तान भरोसे लायक नहीं है.''

यूएई-भारत

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी सात बार यूएई जा चुके हैं

पाकिस्तान की दुविधा

यूएई ने ईरान, अमेरिका और इसराइल में युद्धविराम की घोषणा पर जो बयान जारी किया है, वह बहुत ही सतर्क है.

यूएई ने कहा है कि पूरे घटनाक्रम पर उसकी नज़र बनी हुई है. यूएई ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया है. भारत ने भी युद्धविराम का स्वागत किया है लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया है.

ईरान खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने से नाराज़ रहता है. इस बार जब ईरान ने यूएई, सऊदी अरब, क़तर और कुवैत में हमला किया तो उसका ग़ुस्सा इसी बात को लेकर था.

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर वली नसर ने मार्च के मध्य में ब्लूमबर्ग वीकेंड से कहा था, "ईरान खाड़ी देशों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिकी ठिकाने वास्तव में उनकी रक्षा के लिए नहीं हैं, बल्कि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने और खाड़ी में युद्ध को आमंत्रित करने के लिए हैं. वे उम्मीद कर रहे हैं कि जब यह युद्ध समाप्त होगा, तो इससे क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी पर सवाल उठेंगे."

1980 के दशक में सऊदी अरब ने ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में इराक़ी नेता सद्दाम हुसैन का समर्थन किया था. 2003 में अमेरिका ने जब सद्दाम हुसैन को हटाया तब ईरान ने इराक़, लेबनान के अलावा फ़लस्तीनी क्षेत्रों के साथ सीरिया और यमन जैसे देशों में सहयोगी सरकारों और प्रॉक्सी मिलिशिया के नेटवर्क के ज़रिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की.

सऊदी अरब ने 2016 में तेहरान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ दिए थे, जिन्हें 2023 में चीन की मध्यस्थता से हुए समझौते के बाद फिर से बहाल किया गया था.

ऐसे में पाकिस्तान के लिए दुविधा की स्थिति रहती है.

ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी देश है. दोनों देशों की 900 किलोमीटर से ज़्यादा सरहद लगती है. ईरान शिया बहुल मुस्लिम देश है और पाकिस्तान की आबादी में भी 20 फ़ीसदी शिया हैं.

दूसरी तरफ़ सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए हर मुश्किल वक़्त में खड़ा रहा है. ऐसे में जब सऊदी और पाकिस्तान में दुश्मनी बढ़ती है तो पाकिस्तान के लिए भी मुश्किल स्थिति हो जाती है.

इसी साल जनवरी में यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नहयान नई दिल्ली आए थे. यूएई के राष्ट्रपति जब दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पहुँचे तो उनकी अगवानी में भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद खड़े थे. पीएम मोदी ऐसी गर्मजोशी दुनिया के कम ही नेताओं के लिए दिखाते हैं.

यूएई के राष्ट्रपति भले ही नई दिल्ली कुछ घंटों के लिए ही आए लेकिन एक साथ कई समझौते हुए. इनमें से सबसे ज़्यादा चर्चा स्ट्रैटिजिक डिफेंस पार्टनरशिप के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर दोनों देशों के हस्ताक्षर की हुई थी. दोनों देशों में रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर सहमति तब बनी, जब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल सितंबर में एक डिफेंस पैक्ट हुआ था.

संयुक्त अरब अमीरात अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, साथ ही वह भारत का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार भी है. दोनों देशों ने रुपये और दिरहम में व्यापार को सक्षम बनाया है, जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हुई है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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