बेहतर नींद चाहिए तो घर से बाहर निकलिए और चलिए कैंपिंग पर

    • Author, बेका वॉर्नर
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

मुझे बहुत अच्छी नींद नहीं आती. हालांकि बहुत बुरी भी नहीं, लेकिन हां, टुकड़ों में आने वाली नींद ही ठीक-ठाक से आती है. मुझे वे लंबी रातें याद हैं जब मेरी आंखों पर आई-मास्क लगा होता है और समय काटने के लिए मैं टिकटॉक चलाने की इच्छा को रोकने की कोशिश करती हूं.

इसके बावजूद भी मैंने ऐसी जगहों पर भी रात गुजारने कि कोशिश की है जहां रहना चुनौतियों से भरा था. मैंने स्कॉटलैंड की बर्फीली आंधियों में, अमेज़न की भारी बारिश में, स्वीडन के द्वीपों पर और ग्लास्टनबरी के पूरी तरह गीले मैदानों में टेंट लगाया है.

अजीब आवाज़ों और सख़्त ज़मीन की वजह से नींद आसानी से नहीं आती थी. और अब मेरा टेंट अलमारी के पीछे पड़ा रहता है.

लेकिन रिसर्च के अनुसार, अगर मुझे अच्छी नींद चाहिए, तो मुझे फिर से कैंपिंग शुरू करनी चाहिए.

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हममें से ज़्यादातर लोग सूरज ढलने के काफ़ी देर बाद सोते हैं, और यह दिनचर्या हमारे शरीर और दिमाग़ पर असर डालती है.

रिसर्च बताती है कि बाहर सोने से हम सूरज और चांद के साथ बेहतर तालमेल बना सकते हैं.

वैज्ञानिकों ने पाया है कि सिर्फ एक वीकेंड कैंपिंग करने से हमारी बॉडी क्लॉक रीसेट हो सकती है, जिससे हमारी नींद का समय कुदरत के साथ मेल खाने लगती है.

इसका मतलब है कि हम थोड़ा जल्दी सोने लगें तो देर से सोने से जुड़ी बीमारियों, जैसे दिल की बीमारी और डिप्रेशन से बच सकते हैं.

बॉडी क्लॉक का शिफ़्ट होना

क़रीब पंद्रह साल पहले, अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी के क्रोनोबायोलॉजी लैब के डायरेक्टर, केनेथ राइट ने यह समझने के लिए एक स्टडी की.

उन्होंने यह जानने की कोशिश शुरू की कि कैंपिंग का नींद पर क्या असर पड़ता है, ताकि हमारी बॉडी क्लॉक को बेहतर तरीके से समझा जा सके.

राइट जानना चाहते थे कि आजकल हमारी बॉडी क्लॉक, जो हर 24 घंटे में बदलती रहती है; वह दरअसल कुदरती दुनिया से कितनी अलग हो गई है.

इसके लिए उन्होंने कुछ लोगों को रॉकी माउंटेन्स में एक हफ़्ते के लिए समर कैंपिंग ट्रिप पर भेजा, ताकि वे दिन-रात के नेचुरल साइकल को महसूस कर सकें.

इस दौरान उन्हें टॉर्च या फ़ोन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी और उन्हें सामान्य से चार गुना ज़्यादा प्राकृतिक रोशनी मिल रही थी.

राइट ने इस स्टडी के लिए इसमें भाग लेने वालों की लार के सैंपल लिए ताकि रात के दौरान मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर मापा जा सके.

मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो हमें बताता है कि रात हो गई है. उन्होंने यह माप कैंपिंग ट्रिप से पहले और बाद में किया.

नतीजों से पता चला कि कैंपिंग के बाद लोगों की बॉडी क्लॉक लगभग 2 घंटे पहले की तरफ शिफ़्ट हो गई.

राइट कहते हैं, "इस स्टडी की एक अहम बात यह है कि प्राकृतिक रोशनी और अंधेरे के संपर्क में आने के बाद हमारी बॉडी क्लॉक जल्दी चलने लगती है, जबकि आधुनिक जीवनशैली में हम देर से चल रहे होते हैं."

केनेथ राइट कहते हैं, "बाहर सोने से हम सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि अपने शरीर के साथ भी ज़्यादा तालमेल में रहते हैं."

कैंपिंग के दौरान लोगों का मेलाटोनिन लेवल उनके जागने से थोड़ी देर पहले ही कम हो गया था. लेकिन जब वे घर पर सोते थे, तो सुबह के बाद भी कुछ समय तक मेलाटोनिन का स्तर हाई रहता था.

राइट कहते हैं, "आजकल की आर्टिफिशियल लाइट हमारी बॉडी क्लॉक को इस तरह बदल देती है कि जागने के बाद भी हमारा दिमाग़ कहता है कि हमें अभी सोना चाहिए."

इस तरह, बाहर सोना हमें अपने शरीर के साथ ज़्यादा सही तालमेल में रखता है और इसका हमारे स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.

राइट के अनुसार, "देर से सोना या बॉडी क्लॉक का देर से चलना कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है. जो लोग जल्दी सोते हैं, उनमें नशे की आदत, डिप्रेशन, मोटापा और डायबिटीज़ जैसी समस्याएं कम होती हैं."

हालांकि, जल्दी सोने और कम रोशनी के असर पर अभी भी रिसर्च चल रही है, लेकिन राइट का मानना है कि बाहर सोने के बाद लोग सुबह ज़्यादा तरोताजा और एक्टिव महसूस कर सकते हैं.

तारों के नीचे सोने का अनुभव

एला ह्यूटन का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है. एला एक ट्रेकर और कैंपर हैं और ब्रिटेन की एक महिला एडवेंचर संस्था 'लव हर वाइल्ड' की कम्युनिटी मैनेजर भी हैं.

ह्यूटन कहती हैं, "प्रकृति के साथ तालमेल में रहने की बात ही अलग होती है. सुबह पक्षियों की आवाज़ आपको जगा देती है. जैसे ही रोशनी होती है, उठना बहुत अच्छा लगता है."

उनको सबसे अच्छी नींद एक ऐसे ट्रिप में आई थी जहां कोई आर्टिफिशियल लाइट नहीं थी - न फोन, न टॉर्च, सिर्फ़ आग और गर्म रहने के लिए ऊनी कंबल.

वह जल्दी सो जाती थीं, लेकिन रात में आग जलाए रखने के लिए कुछ एक बार उठना पड़ता था.

वह कहती हैं, "फिर भी मैं दिन में ज़्यादा एक्टिव महसूस करती थी. मुझे ज़्यादा लाइवली और प्रकृति से जुड़ा हुआ महसूस होता था. साथ ही बिल्कुल थकान नहीं लगती थी और मैं सच में ज़्यादा देर तक सो रही थी."

ह्यूटन का अनुभव राइट की एक और स्टडी से भी मेल खाता है जहां उन्होंने कुछ कैंपर्स को कोलोराडो की कड़ाके की सर्दी में कैंपिंग के लिए भेजा था.

उन्होंने पाया कि लोग रात में थोड़ी ज़्यादा बार जागते थे, लेकिन कुल मिलाकर उन्हें घर के अंदर सोने के मुक़ाबले क़रीब 2 घंटे ज्यादा नींद मिलती थी.

जब लोग ट्रिप से वापस आए, तो राइट ने उनकी "बायोलॉजिकल नाइट" (वह समय जब शरीर मेलाटोनिन बनाता है) को मापा.

सर्दियों में कैंपिंग करने वाले लोगों की यह अवधि उन लोगों की तुलना में ज्यादा लंबी थी, जिन्होंने गर्मियों में कैंपिंग की थी.

राइट कहते हैं कि मेलाटोनिन कई जानवरों के जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाता है. यह मौसम के हिसाब से उनके फर का रंग बदलने, प्रजनन और वजन बढ़ने जैसी चीजों को प्रभावित करता है.

वे आगे कहते हैं, "हमारे नतीजे बताते हैं कि इंसान भी अलग नहीं हैं. हम भी प्राकृतिक रोशनी और अंधेरे के बदलते मौसम के अनुसार ख़ुद को ढाल सकते हैं."

आर्टिफिशियल लाइट के नुक़सान

आर्टिफिशियल लाइट को कम करना सिर्फ़ अच्छी नींद के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकता है.

रिसर्च बताती है कि रात में ज़्यादा आर्टिफिशियल लाइट के संपर्क में रहने से ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकता है, हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है और डिप्रेशन के लक्षण बढ़ सकते हैं.

इसका असर जानवरों पर भी पड़ता है. जैसे; चमगादड़, पक्षी, मछलियां और कीड़े-मकोड़े. इसलिए थोड़ा ज़्यादा अंधेरा होना हमारे लिए अच्छा है.

ह्यूटन बताती हैं कि बाहर सोने की आदत डालने में थोड़ा समय लगता है. शुरुआती रातों में अजीब आवाज़ों की वजह से नींद थोड़ी ख़राब हो सकती है, क्योंकि ये आवाज़ें घर जैसी नहीं होतीं.

लेकिन धीरे-धीरे शरीर और दिमाग़ इसकी आदत डाल लेते हैं, और फिर नींद बेहतर होने लगती है.

जब हमें इन आवाज़ों की आदत हो जाती है तो यही आवाज़ें नींद में मदद भी कर सकती हैं.

ब्रिटेन के कैंपिंग और कैरावैनिंग क्लब ने एक हज़ार लोगों पर सर्वे किया, जिसमें ये पाया कि 56% लोगों ने कहा कि वे नींद की समस्या वाले लोगों को बाहर सोने की सलाह देंगें.

साथ ही लगभग 25% लोगों ने कहा कि वे घर की तुलना में बाहर बेहतर सोते हैं.

इनमें से ज्यादातर लोगों ने कहा कि इसकी वजह प्रकृति की आवाज़ें हैं, जैसे बारिश की बूंदों की आवाज़, पत्तों की सरसराहट, कीड़ों की आवाज़, समुद्र की लहरें, यहां तक कि गरज की आवाज़.

कैंपिंग मैगज़ीन के एडिटर रोब गैनली कहते हैं, "मेरे अनुभव में उल्लुओं की आवाज़ और रात में घूमने वाले जानवरों की हल्की आवाज़ बहुत सुकून देती है. यह नींद लाने में मदद करती है."

हालांकि, उन्हें यह जानकर हैरानी हुई कि कुछ लोगों को गरज की आवाज़ भी नींद में मदद करती है.

गैनली कहते हैं, "मैंने कई बार खराब मौसम में कैंपिंग की है, जहां हमें उठकर टेंट फिर से लगाना पड़ा."

मुझे एक ऐसी रात भी याद है जब मैंने 40 मील प्रति घंटे (लगभग 64 किमी /घंटा) की तेज़ हवाओं में टेंट में सोने की कोशिश की थी और नींद बिल्कुल भी अच्छी नहीं आई.

फिर भी, यूट्यूब पर 'थंडर स्लीप सांउड्स' सर्च करने पर करीब 41,000 रिज़ल्ट मिलते हैं, जो दिखाता है कि तूफानी मौसम की आवाज़ें कुछ लोगों को सच में सोने में मदद करती हैं.

बाहर सोने को आरामदायक कैसे बनाएं

मेरे जैसे नए कैंपर या हल्की नींद वाले लोगों के लिए, बाहर सोना थोड़ा आसान बनाने के कुछ तरीके हैं. गैनली सलाह देते हैं कि कभी भी पेड़ के नीचे टेंट न लगाएं, वरना मोटी और भारी बारिश की बूंदें टेंट पर ऐसे गिरेंगी जैसे मशीनगन चल रही हो.

सबसे जरूरी बात अपने शरीर और जमीन के बीच अच्छा, मोटा इंसुलेशन रखें.

गैनली आगे कहते हैं, "क्योंकि रात में जब आप जागते हैं, तो जमीन हमेशा ठंडी ही होती है."

जो लोग पहली बार कैंपिंग करना चाहते हैं, उनके लिए गैनली कहते हैं कि अब टेंट बनाने वाली कंपनियां सेकंड-हैंड टेंट भी बेचने लगी हैं, ताकि कचरा कम किया जा सके. कई जगहों पर तो आप लाइब्रेरी से भी टेंट उधार ले सकते हैं.

वह कहते हैं, "इस शौक को शुरू करने के लिए बहुत ज्यादा पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं है."

जब राइट लैब में नहीं होते, तो वह खुद भी जंगलों में कैंपिंग करना पसंद करते हैं. वह आगे कहते हैं, "बाहर रहते ही मैं तुरंत प्राकृतिक माहौल के साथ तालमेल महसूस करने लगता हूं."

लेकिन राइट यह भी बताते हैं कि हम घर के अंदर रहकर भी कुछ हद तक प्रकृति जैसा माहौल बना सकते हैं, जिससे दिन ज्यादा उजला और रात ज्यादा शांत हो सके.

वह सुझाव देते हैं कि इसके लिए दिन में नीली रोशनी का इस्तेमाल करें. शाम को लाल या हल्की रोशनी रखें. वह कहते हैं, "इस तरह हम आधुनिक जिंदगी जीते हुए भी प्राकृतिक माहौल के करीब आ सकते हैं."

शायद अब समय आ गया है कि मैं अपना पुराना कैंपिंग सामान फिर से निकालूं या कम से कम घर की लाइट्स थोड़ी पहले कम कर दूँ.

यह तो बाद में पता चलेगा कि इससे मेरी नींद बेहतर होती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि मेरे दिमाग को रात में स्क्रीन और तेज़ रोशनी से थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी और अगर सुबह पक्षियों की आवाज़ से नींद खुले, तो उससे अच्छा क्या हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.