कैलाश मानसरोवर यात्रा का तिब्बत रूट कितना मुश्किल है, रास्ते में क्या चुनौतियां आती हैं?

कैलाश मानसरोवर समुद्र तल से 6638 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है

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नेपाल के भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद मरने वालों की संख्या 332 हो गई है. अब तक 900 से अधिक लोग लापता हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है.

नेपाल के विदेश मंत्री ने कहा है कि भारत के क़रीब 300 लोग लापता हैं. इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए तीर्थयात्री शामिल हैं.

इस बीच भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि तमिलनाडु से मानसरोवर की यात्रा पर गए 21 लोगों को नेपाल में सुरक्षित बचा लिया गया है.

बुधवार को आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव ने बताया कि उनके ईशा फ़ाउंडेशन के 80 लोग इस आपदा से प्रभावित हो सकते हैं और उनके बारे में कोई ख़बर नहीं है.

जग्गी वासुदेव ने कहा, "कुल 80 लोग हैं, जिनमें 34 पुरुष और 46 महिला शामिल हैं, साथ ही कुछ अन्य वालंटियर भी हैं जो पास के होटलों में ठहरे हुए हैं. जितनी बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, स्थिति बहुत खराब लग रही है. अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है."

ईशा फ़ाउंडेशन के ग्रुप में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी और भारत समेत 19 देशों के श्रद्धालु शामिल हैं. गुरुवार को जग्गी वासुदेव ने प्रशासन से ग्यिरोंग जाने की अनुमति मांगी है.

ग्यिरोंग काउंटी का बॉर्डर चीन और नेपाल के बीच टूरिस्ट और ट्रैफिक के लिए मेन क्रॉसिंग पॉइंट है. वहां क़रीब 4,000 लोग रहते हैं.

बुधवार सुबह तिब्बत से होकर बहने वाली नदी में अचानक आई बाढ़ से नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा और चितवन ज़िले प्रभावित हुए हैं.

फ़्लैश फ़्लड से कैलाश मानसरोवर जाने वाले मुख्य रास्तों में से एक रसुवा ज़िले में सड़कें, पुल और संचार संपर्क पूरी तरह तबाह हो चुके हैं.

कैलाश मानसरोवर जाने के रूट

पश्चिमी नेपाल के हुमला से होते हुए कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं की तादाद बढ़ी है.

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समुद्र तल से 6,638 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में विशेष मान्यता है. और हर साल सैकड़ों तीर्थ यात्री यहां की यात्रा करते हैं.

भारत सरकार तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन हर साल जून से सितंबर के दौरान दो अलग-अलग मार्गों - लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड)- धारचूला या दिल्ली, और नाथू ला दर्रा (सिक्किम)- गंगटोक या दिल्ली से कराती है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, कैलाश मानसरोवर यात्रा को कोई भी निजी संस्था लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथुला (सिक्किम) से आयोजित नहीं कराती है.

लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) के रास्ते पर क़रीब 200 किलोमीटर ट्रैकिंग करनी पड़ती है. जबकि नाथु ला दर्रे वाले मार्ग पर क़रीब 36 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी होती है.

एक तीसरा रूट है काठमांडू से, जिसे प्राइवेट टूर ऑपरेटर संचालित करते हैं. इस रूट में काठमांडू से नेपालगंज और फिर यहां से ज़मीन के रास्ते तिब्बत की यात्रा की जाती है.

नेपाल के रास्ते दो प्राइवेट रूट

नेपाल-चीन बॉर्डर पर ग्यिरोंग घाटी में कीचड़ और पानी की बाढ़ के बाद का सीसीटीवी का दृश्य

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नेपाल से कैलाश मानसरोवर जाने का रास्ता काठमांडू से शुरू होता है और निजी टूर ऑपरेटरों की ओर से संचालित सड़क या हेलीकॉप्टर मार्गों से तिब्बत पहुंचता है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, तिब्बत में ग्यिरोंग और नेपाल में रसुवा से होकर जाने वाले सड़क मार्ग से क़रीब 10 से 14 दिनों का समय लगता है.

इसमें काठमांडू से सड़क मार्ग से सीमा चौकी तक और फिर तिब्बत में दारचेन तक यात्रा जारी रहती है. दारचेन से पैदल यात्रा शुरू होती है.

दूसरा हेलीकॉप्टर मार्ग नेपालगंज और सिमिकोट/हिल्सा होकर जाता है. इसमें करीब 5 से 11 दिन लगते हैं. इसमें काठमांडू से नेपालगंज, फिर छोटे विमान से सिमिकोट और उसके बाद हेलीकॉप्टर से सीमा पर स्थित हिलसा पहुंचना होता है.

यहां से पुरांग और कैलाश पर्वत तक छोटी दूरी सड़क से तय की जाती है.

इन यात्रियों के लिए वैध पासपोर्ट और चीन के विशेष परमिट जरूरी होते हैं. इनमें चीनी ग्रुप वीजा और तिब्बत ट्रैवल परमिट शामिल हैं.

हर साल मई से सितंबर के बीच बड़ी संख्या में यात्री इन मार्गों से जाते हैं.

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सबसे प्रभावित रसुवा मार्ग क्यों लोकप्रिय है

नेपालगंज से 45 मिनट की उड़ान से वो हुमला के सिमीकोट पहुंचते हैं

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इमेज कैप्शन, नेपालगंज से 45 मिनट की उड़ान से वो हुमला के सिमीकोट पहुंचते हैं जहां से आगे का रास्ता हेलीकॉप्टर से तय किया जाता है
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रसुवा और यहां की रसुवागढ़ी सीमा चौकी नेपाल से तिब्बत में कैलाश मानसरोवर जाने के रास्ते का मुख्य गेटवे है.

यात्रा काठमांडू से शुरू होकर रसुवा ज़िले से गुजरती है और नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी सीमा चौकी तक पहुंचती है.

बुधवार को हुई आपदा का केंद्र भी यही इलाक़ा था. यहां बड़े पैमाने पर तबाही हुई है.

यहां से सीमा पार करने के बाद रास्ता सीधे तिब्बत के अंदर जिरोंग पोर्ट तक जाता है. इसके बाद यात्रा कैलाश मानसरोवर की ओर बढ़ती है.

तिब्बत और नेपाल के बीच सीमा चौकी रसुवागढ़ी तक काठमांडू से पहुंचने में करीब 6 से 8 घंटे लगते हैं. इसके लिए उनका चीनी ग्रुप वीज़ा और तिब्बत ट्रैवल परमिट पहले से तैयार और मंजूर होना जरूरी है.

आम तौर पर रसुवागढ़ी में चीनी ग्रुप वीज़ा और तिब्बत ट्रैवल परमिट के लिए इंतज़ार करना नहीं पड़ता क्योंकि पहले से इसे हासिल कर लिया जाता है. और दस्तावेज़ पूरा होने के बाद ही काठमांडू से लोग यात्रा शुरू करते हैं.

नेपाल के टूरिज़्म डिपार्टमेंट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में रसुवागढ़ी सीमा चौकी से गुजरने वाले यात्रियों की संख्या 13,523 थी.

यह रूट विदेशी यात्रियों में लोकप्रिय है क्योंकि भारत सरकार द्वारा संचालित दो रूट केवल भारतीय नागरिकों के लिए होते हैं.

कैलाश मानसरोवर यात्रा के क्या हैं नियम

नेपाल से जाने वाला रास्ता कैलाश तक पहुंचने के तीन रास्तों में से एक है.

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कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए विदेश मंत्रालय ने नियम बनाए हैं. इसके तहत सबसे पहली योग्यता है कि तीर्थयात्री को भारतीय नागरिक होना चाहिए.

तीर्थयात्री के पास 1 सितंबर को कम से कम छह महीने की वैधता वाला भारतीय पासपोर्ट होना चाहिए. चल रहे वर्ष की 1 जनवरी को कम से कम 18 साल और अधिकतम 70 वर्ष की आयु होनी चाहिए.

तीर्थ यात्रा के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण बात है बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई. सिर्फ़ 25 या उससे कम बीएमआई वाले व्यक्ति को ही इस यात्रा पर जाने की अनुमति होती है.

इस यात्रा के लिए व्यक्ति का शारीरिक रूप से स्वस्थ और चिकित्सा के दृष्टि से उपयुक्त होना भी आवश्यक है.

यात्रा में विदेशी नागरिक आवेदन नहीं कर सकते हैं. इसके साथ ही ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया यानी ओसीआई कार्ड रखने वाले लोग भी इस यात्रा में आवेदन नहीं कर सकते हैं.

इस यात्रा के लिए सफल ऑनलाइन आवेदन के बाद विदेश मंत्रालय ड्रॉ से तीर्थयात्रियों का चुनाव करता है.

ड्रॉ के साथ ही यात्री के मार्ग और बैच का आवंटन कर दिया जाता है. यात्रा शुरू करने से पहले चिकित्सा जांच होती है.

विदेश मंत्रालय के मुताबिक सभी यात्रियों का एक साथ यात्रा करना और लौटना अनिवार्य है. सभी यात्रियों के लिए यात्रा शुरू करने का स्थान दिल्ली है.

यात्रा शुरू करने से पहले आपको मंत्रालय के निर्धारित अधिकारियों को वैध पासपोर्ट, छह पासपोर्ट साइज रंगीन तस्वीरें और 100 रुपए का नोटरी सत्यापित क्षतिपूर्ति बांड देना होता है.

इसके साथ ही आपात स्थिति में हेलीकॉप्टर निकासी के लिए एफिडेविट और चीनी क्षेत्र में मौत के बाद पार्थिव शरीर का वहीं अंतिम संस्कार करने का सहमति पत्र भी देना होता है.

इसमें से किसी भी कागज़ में कोई कमी पाई जाती है तो यात्रा की अनुमति नहीं दी जाती है.

भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, साल 2025 में लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) से यात्रा का अनुमानित खर्च 1 लाख 74 हजार रुपए था. वहीं नाथु ला दर्रे का अनुमानित खर्च 2 लाख 83 हजार रुपए था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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