'काश मैं अपने माता-पिता का चेहरा देख पाती': पैलेट गन से आँखों की रोशनी खोने वाली इंशा की कहानी

- Author, ग़ाफ़िरा क़ादिर
- पदनाम, बीबीसी रिपोर्टर
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
(चेतावनी: इस ख़बर के कुछ ब्यौरे विचलित कर सकते हैं.)
14 साल की इंशा मुश्ताक़ को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि एक शाम उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगी.
उस घटना को हुए लगभग दस साल बीत चुके हैं. वह अपने घर की खिड़की से बाहर देखते हुए कहती हैं, "उस दिन अंधेरा था. शाम के लगभग 8 या 9 बजे थे. मैं यहाँ खड़ी थी, तभी मैंने बाहर गाड़ियाँ देखीं."
"हालात बहुत ख़राब थे और यहां बड़ी संख्या में सिक्योरिटी फ़ोर्स मौजूद थी. जब मैंने बाहर देखा तो मुझे धुएँ जैसा कुछ महसूस हुआ."
फिर मैंने दोबारा देखा और मुझे छर्रे लगे. छर्रे मेरे माथे पर लगे. मुझे लगा कि मुझे गोली मार दी गई है. इसके बाद मैं ज़मीन पर गिर गई."
"मेरी माँ ने मुझे उठाया.
मेरी दायीं आँख बुरी तरह ज़ख़्मी हो गई थी, माथे पर चोट लगी थी, और मेरे पाँच दाँत वहीं टूटकर ज़मीन पर गिर गए थे.
"मैं सजदा नहीं कर पाती थी क्योंकि मेरा माथा बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था. लगभग पाँच से छह महीने तक हालत बहुत खराब रही."
वे आगे कहती हैं, "मुझे ऐसा महसूस होता था जैसे मैं ख़ुदा से दूर हो गई हूँ. मैं दुआ करती थी कि ख़ुदा मुझे अपने पास बुला ले. मैंने सारी उम्मीद खो दी थी."
मैं कहती थी, "शायद मैं मरने वाली हूँ. शायद मैं बच नहीं पाऊँगी."

2010 में भारत प्रशासित कश्मीर कई महीनों तक हिंसा की चपेट में रहा.
उस समय उमर अब्दुल्लाह सरकार ने हालात पर क़ाबू पाने के लिए केंद्र सरकार से ग़ैर-घातक हथियारों की माँग की थी.
उसी साल पहली बार पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया.
ये ऐसे हथियार हैं जो फ़ायर किए जाने पर सैकड़ों छोटे धातु के छर्रे छोड़ते हैं. ये छर्रे चारों दिशाओं में फैल जाते हैं.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी इन्हें प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे ख़तरनाक हथियारों में से एक बताया है.
2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने राज्य विधानसभा में कहा था कि 2016 में उग्रवादी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों के दौरान 6,000 से ज़्यादा लोग पैलेट गनों से घायल हुए थे.
कई लोगों की एक या दोनों आँखों की रोशनी चली गई. इंशा मुश्ताक़ भी उनमें से एक हैं.
पहले डॉक्टर बनना चाहती थीं, अब ये सपना है..

पिछले कई वर्षों से इंशा अपनी पढ़ाई पूरी करने के दौरान श्रीनगर में किराए के एक घर में रह रही हैं. आज सुबह हम इंशा और उनकी माँ के साथ उनके गाँव सेदोव गए.
हमारा मक़सद यह समझना था कि छर्रों का शिकार हुए लोगों की ज़िंदगी पर इसका क्या असर पड़ता है.
वह कहती हैं कि जब मैं अपने गांव जाती हूं तो सफ़र के दौरान देखने की कमी को बहुत ज़्यादा महसूस करती हूं.
"मैं सोचती हूँ कि आज यह जगह कैसी दिखती होगी. आज सड़कें कैसी दिखती होंगी, बाज़ार कैसा दिखता होगा, और यहाँ कितना कुछ बदल गया होगा. मुझे इन सब चीज़ों की कमी महसूस होती है."
"मुझे फूलों, पार्कों, दरगाह, पानी और डल झील को देखना बहुत पसंद था."
इन वर्षों में इंशा ने कई चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन सबसे मुश्किल बात यह स्वीकार करना था कि वह फिर कभी देख नहीं पाएँगी.

वह बोलीं, "पहले एक या दो साल तक यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि अब यही मेरी हक़ीक़त है. और मुझे इसी के साथ जीना है."
फिर भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई जारी रखी.
वह बताती हैं, "छर्रे लगने से पहले मेरा सपना डॉक्टर बनने का था. विज्ञान में मेरी बहुत रुचि थी. लेकिन उस घटना के बाद सब कुछ बदल गया."
वह अपना किराए का कमरा दिखाते हुए कहती हैं, "मैं घर के लगभग सारे काम ख़ुद कर सकती हूँ. मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं होती."
उन्होंने श्रीनगर के अथवाजन स्थित डीपीएस में ब्रेल सीखी.
वह कहती हैं कि जब शुरुआत में वह स्कूल जाती थीं तो उन्हें कुछ समझ में नहीं आता था और रोते हुए ब्रेल फेंक देती थीं.
हालांकि अब वे आत्मनिर्भर बनकर दूसरों ख़ासकर विकलांग लोगों के लिए एक मिसाल बनना चाहती हैं.
वे बताती हैं कि उन्हें गुलाबी, मैरून और आसमानी नीला बेहद पसंद है. और उन्हें सर्दियां पसंद हैं जब शोपियां में बहुत बर्फ़बारी के चलते सबकुछ सफेद हो जाता है. चाहे पेड़ हो, सड़कें हों या घरों की छतें.
पैलेट गन पर ये बोलीं इंशा

वे अपने सपनों के बारे में भी बताती हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे सपनों में मुझे अक्सर शादियाँ दिखाई देती हैं. मुझे अक्सर फ़ोर्स दिखाई देती है. और अजीब तरह के सपने आते हैं. कभी-कभी मुझे साँप भी दिखाई देते हैं."
हाल ही में एक बॉलीवुड फ़िल्म में पैलेट गनों को ऐसे हथियारों के रूप में दिखाया गया जो सिर्फ़ सीमित नुक़सान पहुँचाते हैं.
जब उनसे इसका ज़िक्र किया गया तो वे बोलीं, "वे कहती हैं कि पैलेट सिर्फ़ सीमित नुक़सान पहुँचाते हैं, लेकिन ये ज़िंदगियाँ तबाह कर देते हैं. कश्मीर में मेरे जैसे कई बच्चे हैं जिनके मां-बाप आज भी रोते हैं. सिर्फ़ वे ही उस दर्द को समझ सकते हैं."

वे कहती हैं कि अब उन्हें अपने माता-पिता के चेहरे की धुंधली याद है.
वह बोलीं, "मेरी माँ भी तब ज़्यादा स्वस्थ थीं और ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती थीं. अब मुझे लगता है कि वह बहुत दुबली हो गई हैं."
वे यह भी कहती हैं कि अब "काश" शब्द उनकी ज़िंदगी की एक कसक है. वे सोचती हैं, "काश मैं अपने दम पर चल पाती, पढ़ पाती और किसी पर निर्भर न रहती. काश मैं अपने माता-पिता का चेहरे देख पाती. जब मैं अकेली होती हूँ, तो यह सोचकर बहुत रोती हूँ."
"मगर मुझे पता है कि मैं मजबूत हूं."
पैलेट गनों के इस्तेमाल पर बहस
2016 में व्यापक प्रदर्शनों के बाद भारत सरकार ने कहा था कि वह पैलेट गनों के इस्तेमाल पर दोबारा विचार करेगी लेकिन इनका इस्तेमाल जारी रहा.
उस समय जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में पैलेट गनों पर प्रतिबंध लगाने की माँग वाली याचिका पर सुनवाई चल रही थी.
तब सुरक्षा बलों ने दलील दी थी कि अगर पैलेट गनों का इस्तेमाल बंद किया गया, तो उन्हें ज़्यादा घातक हथियारों का सहारा लेना पड़ सकता है. इससे मौतों का ख़तरा बढ़ सकता है.
हालाँकि, पैलेट से अपनी आँखों की रोशनी खोने वाली इंशा कश्मीर की अकेली शख़्स नहीं थीं. कई और लोग भी पैलेट गनों का शिकार हुए. उनकी ज़िंदगी भी हमेशा के लिए बदल गई.
ये एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जिसमें हिबा जान, वक़ार रफ़ीक़, हसीना बेगम, सुहैल अहमद बडर, उल्फ़त हमीद पर्रे, एजाज़ अहमद मीर, ख़ुर्शीद अहमद लोन, जावेद अहमद मल्ला, परवीना बानो मीर, इम्तियाज़ अहमद सूफ़ी, उमैर हमीद गनई, मोहम्मद रमज़ान ख़ान, निसार अहमद लोन, जॉन मोहम्मद पर्रे, इक़बाल हमीद रादर, बासित अशरफ़ मीर, तौसीफ़ अहमद मल्ला शामिल हैं.
कश्मीर में पैलेट गनों के इस्तेमाल की आख़िरी व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई घटना 2020 में श्रीनगर में एक मुहर्रम जुलूस के दौरान सामने आई थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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