'यहां सरकार 5 साल भी नहीं चलती, मैडम नूर जहां का शासन 60 साल तक कायम रहा और अभी भी है' - मोहम्मद हनीफ़ का नज़रिया

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- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
मैडम नूर जहाँ 100 साल की हो गई हैं. किसी ने शिकायत की है कि पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें उनका सही मुकाम नहीं दिया है. उनका 100वां जन्मदिन ऑफिशियली नहीं मनाया गया. न ही किसी सरकारी टीवी पर कोई सेलिब्रेशन हुआ है.
पहले मुझे भी लगा था कि सरकार को कुछ करना चाहिए था. इस्लामाबाद और लाहौर में चिरागा (दीपक जलाए जाना ) होना चाहिए था. कोई यादगार डाक टिकट जारी होती. पाँच हज़ार रुपये के नोट पर उनकी तस्वीर छप जाती.
लेकिन फिर मुझे ध्यान आया कि अच्छा हुआ, सरकार ने कुछ नहीं किया. क्योंकि हमारी सरकार को तो एक ही काम आता है, वह एक आम छुट्टी कर देती. बच्चों की स्कूल से छुट्टी हो जाती और फिर इस्लामाबाद में कोई सरकारी फंक्शन होता, जहाँ किसी बेसुरे ने यह गाना था कि...
"ऐ वतन के सजीले जवानों, मेरे नग़मे तुम्हारे लिए हैं"
"हर दिन मैडम नूर जहाँ का हैप्पी बर्थडे है"
सरकार उन्हें याद करे जिन्हें लोग भूल गए हैं. मैडम को और उनके गानों को तो लोग कभी भूले ही नहीं हैं. हर दिन मैडम नूर जहाँ का हैप्पी बर्थडे है और लोग इसे मनाते हैं.
जिन लोगों ने मैडम को अपनी ज़िंदगी में कभी देखा भी नहीं और न ही कभी नहर में नहाए हैं , वे भी गाते फिरते हैं कि...
"साणु नहर वाले पुल 'ते बुला के'"
जिन्होंने समंदर भी सिर्फ़ फ़िल्मों में देखा है, उन्हें भी मैडम का यह गाना याद है कि...
" तू समंदर है , मैं साहिलों की हवा"
शहरों में रिक्शों पर मैडम के गाने बजते हैं. गांवों में लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर स्पीकर लगाकर सुन लेते हैं. हर दिन दरगाहों पर मैडम के नाम पर जश्न होते हैं. शादियों में तो लोग गा ही लेते हैं कि...
"माही आवेगा, मैं फुलां नाल धरती सजावांगी"
कई कव्वालों ने भी उनके गानों की धुनों पर कव्वालियां बनाई हैं. कई नात-ख्वान भी अपने गानों को लेकर उन्हें रूहानी/आध्यात्मिक टच देकर नात बना लेते हैं.
मैडम का राज 60 साल तक कायम रहा और अभी भी है.

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कहते हैं कल्चर लोगों को जोड़ता है. जोड़ता होगा , लेकिन अमीर और गरीब के कल्चर को कोई जोड़ नहीं सकता.
यह मैडम का ही काम है कि एक ही गाना किसी सेठ को भी पसंद हो और उसके ड्राइवर को भी पसंद आ जाए.
एक ही गाने का मज़ा सड़क पर पत्थर तोड़ने वाला मज़दूर भी ले लेता है और अपने एयर-कंडीशन्ड ड्राइंग रूम में बैठा बाबू भी उस गाने का स्वाद लेता है.
पाकिस्तान जिसने भी बनाया हो, इसके रखवाला और रक्षक (राजा या मुखिया) कोई भी हो, इस देश को चलाया तो मैडम नूर जहाँ ने ही है.
यहां सरकार पांच साल तक नहीं चलती, मैडम का राज 60 साल तक चला और अभी भी चल रहा है.
'मुझसे पहली सी मुहबत, मेरे मेहबूब न मांग'

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कभी-कभी कोई नस्तलीक़ इंसान कह देता है कि 'उन्होंने पंजाबी में कुछ बेहुदा, बकवास गाने गाए , जिससे मुंह का जायका खराब हो जाता है.'
ऐसी बातों की परवाह मैडम ने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं की थी, तो अब क्यों करेंगे ?
लगता है सरकारी मीडिया में भी कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें हर पब्लिक बात बेतुकी लगती है.
अच्छा किया कि सरकार ने कोई आवामी दिन (नेशनल डे) नहीं मनाया , कोई छुट्टी नहीं घोषित की, कोई सरकारी फंक्शन नहीं हुआ. नहीं तो उसमें भी शायद कोई गा देता कि...
"मुझसे पहली सी मुहबत, मेरे मेहबूब न मांग"
रब्ब राखा
(नोट - ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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