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आशा भोसले : ज़िद और टैलेंट के दम पर दशकों तक किया राज
- Author, यासिर उस्मान
- पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
मशहूर सिंगर आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया.
भारतीय संगीत जगत की एक बड़ी हस्ती के रूप में उनका नाम शुमार था और प्लेबैक सिंगर के रूप में उन्होंने कई यादगार गाने दिए.
शरीर चला जाता है, लेकिन कुछ आवाज़ें हवा में ठहरी रह जाती हैं, दूर तक, देर तक, कभी-कभी हमेशा के लिए. 'नया दौर' से 'तीसरी मंज़िल', 'हरे रामा हरे कृष्णा' से 'उमराव जान' और 'इजाज़त' से होते हुए 'रंगीला' तक... वक़्त बदला, मंज़र बदले, पीढ़ियां बदलीं, पर्दे पर नायिकाएं बदलीं, पर आशा भोसले की आवाज़ हमेशा जवान रही.
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लेकिन उनकी आवाज़ की शोखियों और चुलबुले गीतों के ज़िक्र में अक्सर उनके लंबे और कठिन संघर्ष की बात कम होती है.
सच तो यह है कि अपनी विलक्षण प्रतिभा के बावजूद, आशा भोसले को 'नंबर दो' के पायदान से ही संतोष करना पड़ा, क्योंकि हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में 'नंबर एक' पर उनकी अपनी ही महान और दिग्गज बड़ी बहन, लता मंगेशकर थीं.
हिंदी प्लेबैक सिंगिंग के क्षितिज पर जब लता नाम के सूरज की चमक के आगे अपनी एक अलग लौ जलाना आशा की ज़िद थी.
उस दौर में यह लगभग असंभव जैसा था. लेकिन अपनी ज़िद और बेमिसाल प्रतिभा के दम पर, आशा उस साये से बाहर निकलीं और संगीत के क्षितिज पर अपना एक मुकम्मल आसमां बनाया.
संगीत की विरासत और संघर्ष का आगाज़
संगीत से आशा का नाता बचपन में ही जुड़ गया था. उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता और मराठी रंगमंच के एक सम्मानित शख़्सियत थे.
उनके पांच बच्चों- लता, मीना, आशा, ऊषा और पुत्र हृदयनाथ के बीच सुरों की सरगम बचपन से ही गूंजती थी.
बचपन के दिनों में लता और नन्हीं आशा की जोड़ी अटूट थी. आशा साये की तरह अपनी बड़ी बहन के पीछे-पीछे चलतीं.
लेकिन जब आशा सिर्फ नौ साल की थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया. पिता के जाने से मंगेशकर परिवार गहरे आर्थिक संकट में घिर गया.
गुज़ारे की तलाश में परिवार पुणे और कोल्हापुर से होता हुआ 1945 में बंबई (मुंबई) आ बसा.
यहां 14 साल की लता ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली और फ़िल्मी दुनिया के मुश्किल गलियारों में अपना संघर्ष शुरू किया.
जल्द ही आशा भी उनके संघर्ष में साथ हो लीं.
पहला कदम और सफलता की लुका-छिपी
साल 1948 में फ़िल्म 'चुनरिया' के ज़रिए आशा ने पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा.
उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ अपना पहला गीत 'सावन आया रे' गाया.
इसके ठीक एक साल बाद, 1949 में फ़िल्म 'रात की रानी' से उन्हें अपना पहला सोलो (एकल) गीत मिला.
यही वह साल था, जब बड़ी बहन लता मंगेशकर के लिए 'टर्निंग पॉइंट' साबित हुआ.
फ़िल्म 'महल' के गीत 'आएगा आनेवाला' ने लता को रातों-रात कामयाबी के उस शिखर पर पहुंचा दिया जहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
1950 के दशक में लता तेज़ी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगीं. नौशाद, सी रामचंद्र, शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों की वे पहली पसंद बन गईं.
लता का क़द और आशा की जद्दोजहद
लता हिंदी पार्श्व गायन पर एकाधिकार जमा रही थीं, वहीं जी-तोड़ मेहनत के बावजूद आशा को वह मुकाम नहीं मिल पा रहा था.
उस दौर में आशा को ज़्यादातर बी-ग्रेड या कम बजट वाली फ़िल्मों में ही मौके मिलते थे.
वे एआर क़ुरैशी, सज्जाद हुसैन और सरदार मलिक जैसे संगीतकारों के साथ काम तो कर रही थीं, लेकिन बड़े संगीतकार और मुख्यधारा के बड़े बैनर उनसे दूर थे.
आशा भोसले की जीवनी लिखने वाले फ़िल्म इतिहासकार राजू भारतन ने उनके शुरुआती दिनों को याद करते हुए एक इंटरव्यू में कहा था, "शुरुआत में आशा भोसले कोई करिश्मा नहीं थीं. वे बस एक 'स्ट्रगलर' थीं. मैंने उन्हें काम के लिए जूझते देखा है. अगर निर्माता लता को नहीं ले पाते थे, तो उनकी अगली पसंद गीता दत्त या शमशाद बेगम होती थीं. उस फ़ेहरिस्त में आशा का तो कहीं नाम भी नहीं आता था."
"इसलिए, उन्हें जो भी मिला, उन्होंने गाया. उनके साथ एक समस्या उनकी 'मराठी-मिश्रित हिंदी' और उच्चारण की भी थी, उन्होंने लता की तरह अपनी उर्दू सुधारने पर उतना काम नहीं किया था. इसके अलावा, उनकी निजी ज़िंदगी और शादीशुदा जीवन भी बेहद उतार-चढ़ाव और मुश्किलों से भरा रहा."
जिस निजी घटना का ज़िक्र राजू भारतन ने किया, वो उस समय हुई जब आशा सिर्फ़ सोलह साल की थीं.
उन्होंने 31 साल में घर छोड़ दिया और गणपतराव भोसले के साथ अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली. परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उठाए इस कदम ने दोनों बहनों के रिश्तों में एक शुरुआती दरार डाली थी जो बरसों तक नहीं भरी.
लता मंगेशकर को लगता था कि यह रिश्ता उनकी छोटी बहन के लिए ठीक नहीं है.
अपने एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने स्वीकार किया था, "लता दीदी इस शादी के सख़्त ख़िलाफ़ थीं. एक दौर ऐसा भी था जब हमारे रिश्ते बहुत कड़वे हो गए थे और सालों तक हमारे बीच बातचीत तक बंद रही."
गणपतराव भोसले के साथ शादी उनकी निजी और पेशेवर ज़िंदगी के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी.
आशा भोसले ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा, "वह एक रूढ़िवादी परिवार था जिसे एक 'सिंगिंग स्टार' बहू मंज़ूर नहीं थी. मेरे पति बेहद बदमिज़ाज थे, शायद उन्हें दूसरों को दर्द देने में मज़ा आता था. पर बाहर किसी को इसकी कानों-कान ख़बर नहीं होती थी."
तनाव और उथल-पुथल भरे इन सालों में आशा का करियर भी कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ रहा था. जबकि लता इन सालों में क़ामयाबी के उस शिखर पर पहुंच चुकी थीं.
ओपी नैयर और एसडी बर्मन का साथ
आशा के करियर को शुरुआती मज़बूती बिमल रॉय की 'परिणीता' (1953) और राज कपूर की 'बूट पॉलिश' (1954) के गीतों से मिली.
लेकिन उनकी ज़िंदगी का बड़ा मोड़ आया जब उनकी मुलाकात हुई संगीतकार ओपी नैयर के साथ. नैयर का मानना था कि वे लता के बिना भी सुपरहिट संगीत दे सकते हैं.
लता भी उनके साथ काम नहीं करती थीं. नैयर की शुरुआती पसंद गीता दत्त थीं, लेकिन फ़िल्म 'सी.आई.डी.' के बाद उनके संगीत में आशा भोसले ने जगह बना ली.
उन्होंने आशा की आवाज़ के निचले सुरों की गहराई को पहचाना और 'नया दौर' (1957) के ज़रिए एक इतिहास रच दिया. 'उड़े जब-जब जुल्फें तेरी' और 'मांग के साथ तुम्हारा' जैसे गीतों ने आशा को पहली बार फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री की आवाज़ बनाया और उन्हें बीआर चोपड़ा जैसे बड़े कैंप का हिस्सा बना दिया.
उसी साल (1957), संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच हुए मनमुटाव ने आशा के लिए सफलता के नए दरवाज़े खोल दिए.
अगले पांच सालों तक जब एसडी बर्मन ने लता के साथ काम नहीं किया, तब आशा उनके कैंप की मुख्य गायिका बनकर उभरीं.
फ़िल्मी गलियारों और पत्रिकाओं में उन दिनों यह चर्चा गर्म थी कि इस बात को लेकर भी लता अपनी बहन काफी नाराज़ थीं. लेकिन इन पांच सालों में आशा ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया.
एसडी बर्मन, किशोर कुमार, आशा भोसले और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने रूमानी और चुलबुले गीतों का एक नया दौर शुरू किया.
'हाल कैसा है जनाब का' (चलती का नाम गाड़ी), 'आंखों में क्या जी', 'छोड़ दो आंचल' (पेइंग गेस्ट) और 'दीवाना मस्ताना हुआ दिल' (बंबई का बाबू) जैसे यादगार नगमे आज तक लोग याद करते हैं.
एसडी बर्मन ने आशा को केवल शोख़ी और चुलबुलेपन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनकी आवाज़ की गहराई को तराशा.
फ़िल्म काला पानी में आशा का 'अच्छा जी मैं हारी' जैसा शोख़ी वाला रोमांटिक गीत भी था और 'नज़र लगी राजा तोरे बंगले पर' (काला पानी) जैसा ठुमरी अंदाज़ वाला गीत भी.
वहीं 'सुजाता' और 'लाजवंती' जैसी फ़िल्मों में उनसे बेहद गंभीर और संजीदा गीत गवाकर यह साबित कर दिया कि आशा हर रंग में माहिर हैं.
नैयर, नज़दीकियां और नई पहचान
ओपी नैयर और एसडी बर्मन का यह दौर आशा के लिए सिर्फ़ काम का नहीं, बल्कि अपनी जुदा पहचान तराशने का सुनहरा समय था. लेकिन इसी चमक के पीछे एक निजी अंधेरा भी था.
साल 1960 में, तीन बच्चों के साथ आशा की शादी एक दुखद मोड़ पर टूटी. इस उथल-पुथल के बीच, संगीतकार ओपी नैयर के साथ उनकी बढ़ती नज़दीकियों ने फ़िल्मी गलियारों में हलचल पैदा कर दी.
चूंकि लता और नैयर के रास्ते जुदा थे, इसलिए आशा का नैयर के क़रीब जाना दोनों बहनों के बीच की कड़वाहट को और गहरा कर गया.
लेकिन आशा के करियर का ये बेहतरीन दौर साबित हुआ. इस जोड़ी ने हिंदी संगीत को 'आइए मेहरबान' (हावड़ा ब्रिज), 'आओ हुज़ूर तुमको', 'कजरा मोहब्बत वाला' (किस्मत) और 'ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा' (मेरे सनम) जैसे कालजयी गीत दिए.
आशा को लता की परछाई से निकाल कर, एक 'बोल्ड' और अलग अंदाज़ वाली गायिका के रूप में स्थापित करने का असली श्रेय ओपी नैयर को ही जाता है.
आशा भोसले ने ओपी नैयर के साथ अपनी साझेदारी के दौरान 60 फ़िल्मों में 324 गीत गाए, यानी हर फ़िल्म में औसतन पांच से अधिक गीत.
लेकिन क़ामयाब गीतों की लंबी फेहरिस्त के बावजूद, हिट गीतों के बावजूद संगीत की दुनिया का हर बड़ा रास्ता अब भी लता की आवाज़ से होकर ही गुज़रता था. आशा ने अपनी ज़मीन तो बना ली थी, लेकिन हिंदी प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया पर लता मंगेशकर का एकछत्र राज कायम था.
आशा भोसले की जीवनी में राजू भारतन ने लिखा है कि 1950 और 60 के दशक में, संगीत की दुनिया पर लता का दबदबा ऐसा था कि वे एक गाने के 500 रुपये लेती थीं, वहीं आशा को महज़ 100-150 रुपये में ही संतोष करना पड़ता था.
लता के पास यह चुनने की आज़ादी थी कि उन्हें क्या गाना है और किसके लिए, आशा के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था. यह भेदभाव उन्हें भीतर तक चुभता था. बड़ी बहन की बेरुखी और समर्थन की कमी ने भी दूरियों को बढ़ाया था.
आशा ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और ठान लिया कि वे अपने दम पर खुद को साबित करके दिखाएंगी.
बहनों के इसी आपसी टकराव और ईर्ष्या की गूंज सिनेमाई कैनवस तक भी पहुंची. माना जाता है कि निर्देशिका सई परांजपे ने अपनी फ़िल्म साज़ (1997) में संगीत की दुनिया में दो बहनों की इसी कहानी को परदे पर उतारा.
पंचम और आशा
एस. डी. बर्मन के साथ काम करते हुए ही आशा की मुलाकात उनके बेटे आरडी बर्मन (पंचम) से हुई.
उम्र में छोटे पंचम अपने पिता की विरासत के बीच अपनी खुद की ज़मीन तलाश रहे थे. किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले सालों में यह जोड़ी सुरों का एक नया इतिहास रचने वाली है.
1966 में नासिर हुसैन की फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' के साथ उनका पहला पेशेवर सहयोग शुरू हुआ. यहीं से उस रचनात्मक और रूमानी साझेदारी की नींव पड़ी, जिसने हिंदी फ़िल्मी संगीत की तासीर ही बदल दी.
एक तरफ़ 'ओ मेरे सोना रे' की रूमानी मिठास थी, तो दूसरी तरफ़ 'ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली' की वो तूफ़ानी लय जिसमें आशा ने अपनी सांसों को जिस जादुई नियंत्रण के साथ सुरों में बांधा, उसने सबको हैरान कर दिया.
आरडी बर्मन जब इंडस्ट्री में आए, तो उनके ज़हन में दुनिया भर का संगीत था. वे हिंदी सिनेमा में फंक, जैज़, कैबरे और रॉक-एन-रोल आज़माना चाहते थे. लेकिन इन जटिल धुनों को निभाने के लिए उन्हें एक ऐसी आवाज़ चाहिए थी, जो लचकदार हो और जिसमें जोखिम लेने का साहस हो.
आशा भोसले वह आवाज़ बनीं.
पंचम ने अपने संगीत में पाश्चात्य मिज़ाज को पिरोया, तो आशा की आवाज़ ने उस संगीत में एक बेबाक कशिश और आज़ाद ख़याली के नए रंग भर दिए.
लेकिन पंचम की नज़र सिर्फ़ शोर-शराबे तक सीमित नहीं थी; उन्होंने आशा की आवाज़ के उस विस्तार को भी पहचाना जिसे अब तक दुनिया ने अनसुना कर दिया था.
एक ओर 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां) और 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा) ने आशा को 'कैबरे क्वीन' या एक आधुनिक 'वेस्टर्न वाइब' वाली गायिका के रूप में स्थापित किया, वहीं फ़िल्म 'इजाज़त' (1987) में इस जोड़ी ने 'मेरा कुछ सामान' और 'खाली हाथ शाम आई है' जैसे गीतों से यह साबित किया कि वे कविता के दर्द को कितनी खामोशी से बयां कर सकते हैं.
विशेष रूप से 'मेरा कुछ सामान' में आशा ने बिना किसी तय लय के उस गद्य-नुमा कविता को जिस रूहानियत के साथ गाया, वह आज भी गायकी की एक पाठशाला माना जाता है.
पंचम की इस जुगलबंदी में आशा ने खुद को हर सांचे में ढाला चाहे वह कैबरे की शोख़ी हो, ग़ज़ल का ठहराव, या शास्त्रीय बंदिशों की जटिलता.
उन्होंने दिखा दिया कि आवाज़ के रंग बदलने की उनकी अद्भुत क्षमता का संगीत की दुनिया में कोई सानी नहीं है.
सुरों की नई लकीर…जब आशा बनी 'उमराव जान'
मगर नियति ने उनके लिए एक और चुनौती चुन रखी थी, आशा की आवाज़ का वह कायाकल्प जिसने उन्हें महज़ एक गायिका से एक लेजेंड बना दिया.
अब तक हिंदी फ़िल्म में ग़ज़ल का मतलब सिर्फ लता मंगेशकर माना जाता था. मुज़फ़्फ़र अली की 'उमराव जान' के लिए संगीतकार खय्याम के सामने फ़िल्म 'पाकीज़ा' जैसी महान विरासत के आगे एक नई लकीर खींचने की चुनौती थी.
खय्याम ने एक साहसी फैसला लिया और आशा भोसले को चुना, पर एक सख़्त शर्त के साथ, "हमें गानों में 'आशा' नहीं चाहिए." उनका इशारा था कि आशा को अपनी चिर-परिचित शोख़ी और चुलबुलापन छोड़कर, एक ठहराव भरी शास्त्रीय गायकी को अपनाना होगा.
खय्याम चाहते थे कि आशा अपनी आवाज़ को डेढ़ सुर (स्केल) नीचे ले जाकर गाएं. इतने नीचे सुर में गाना आशा के लिए बिल्कुल नया और डरावना था.
आठ दिनों के कठिन रियाज़ के बाद जब रिकॉर्डिंग शुरू हुई, तो एक पल ऐसा भी आया जब आशा की हिम्मत जवाब देने लगी. उन्हें लगा वे नहीं गा पाएंगी.
लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई और आशा ने खुद को सुना, तो वे दंग रह गईं. 'दिल चीज़ क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के' और 'ये क्या जगह है दोस्तों' जैसी कालजयी ग़ज़लों ने दुनिया को आशा की आवाज़ का वह मखमली और संजीदा पहलू दिखाया जिससे अब तक सब अनजान थे.
नतीजा इतिहास में दर्ज है. उमराव जान के लिए ख़य्याम और आशा भोसले दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
वक़्त का पहिया घूमता रहा, संगीत के साज़ बदलते रहे, लेकिन आशा की आवाज़ की ऊर्जा कभी कम नहीं हुई.
बाद के वर्षों में एआर रहमान के साथ 'रंगीला', 'लगान' और 'ताल' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने फिर साबित किया कि उनके सुरों पर उम्र का पहरा नहीं है.
जहां उनके दौर के कई गायक संगीत के बदलते स्वरूप और रीमिक्स को लेकर नाराज़ रहते थे, वहीं आशा ने खुले दिल से नए दौर को गले लगाया.
उन्होंने खुद अपने पुराने गानों की रीमिक्स एल्बम निकाली और नई पीढ़ी को उस जादुई संगीत से रूबरू कराया.
आशा भोसले का सफर कांटों भरा रहा, अपनी ही बहन के विशाल साये से बाहर निकलने की ज़द्दोजहद रही, पर अंततः उनकी ज़िद जीत गई.
उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि वे हर रंग में ढल जाने वाली एक मुकम्मल कलाकार हैं एक ऐसी आवाज़, जो कल भी जवान थी और जिसकी शोख़ी हर दौर की रूह को छूती रहेगी.
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