याक चुरपी: 'दुनिया का सबसे बेहतरीन चीज़' भारत में कहाँ और कैसे बनाया जाता है?

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- Author, अमृता दुर्वे
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
जब आप चीज़ के बारे में सोचते हैं तो आपके दिमाग़ में सबसे पहले क्या आता है?... क्यूब्स, स्लाइस, या पिज़्ज़ा पर पिघला हुआ चीज़ ...
आमतौर पर हम इन्हीं के बारे में सोचते हैं.
लेकिन इन सबसे इतर एक ख़ास क्षेत्र में वहां का स्थानीय चीज़ खानपान का अहम हिस्सा रहा है.
हम बात कर रहे हैं लद्दाख के याक चुरपी की. इस चीज़ ने कुछ महीने पहले ब्राज़ील में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता था.
लद्दाख की यात्रा के दौरान हमने इस ख़ास चीज़ के बारे में और इसे बनाने की प्रक्रिया के बारे में पता लगाया.
लद्दाख के याक चुरपी चीज़ ने ब्राज़ील में आयोजित मुंडियाल डो क्वेजो डो ब्राज़ील 2026 कॉम्पिटीशन में गोल्ड मेडल जीता. इसके बाद से यह चीज़ चर्चा का विषय बन गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल सोशल मीडिया पर इसकी तारीफ़ की, बल्कि 'मन की बात' में भी इसका ज़िक्र किया.
इस चीज़ को सबसे पहले थिनले नुरबू ने बनाया था. लद्दाख के एक घुमंतू (ख़ानाबदोश) परिवार में जन्मे थिनले याक पालते हैं.
लद्दाख का चुरपी चीज़

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लद्दाख के घुमंतू समुदायों के घरों में पीढ़ियों से चुरपी या छुरा नामक चीज़ बनाया जाता रहा है. लेकिन अब तक इस चीज़ के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी. इसकी वजह है कि इस चीज़ का निर्यात अब तक लद्दाख से बाहर नहीं हुआ है.
यह चीज़ आपको लेह के बाज़ारों में भी आसानी से नहीं मिलेगा. इसीलिए हमने इसके बारे में पता लगाने के लिए अपनी यात्रा शुरू की.
जैसे ही हम चांग-ला को पार करके पहाड़ी रास्ते से नीचे उतरना शुरू करते हैं, हमें सड़क के दोनों ओर पहाड़ दिखाई देते हैं.
चांगथांग क्षेत्र के सोलटाक में थिनले नुरबू का एक 'घुमंतू फ़ार्म' है. थिनले यहां अपने माता-पिता, रिश्तेदारों और लगभग 100 याकों के साथ रहते हैं.
यहां की ऊंचाई समुद्र तल से 16,500 फ़ुट है. यहां कोई बस्ती नहीं है. बस बीच में एक घर या सड़क के किनारे एक छोटा सा होटल है.
थिनले के बाड़े के आसपास और कुछ नहीं है. सड़क के किनारे एक छोटा-सा होटल है और उसके पीछे एक घर और बाड़ा है.
यहाँ दिन का पहला काम याक का दूध दुहना है. लद्दाखी भाषा में मादा याक को दिमो कहते हैं. एक दिमो लगभग 1 लीटर दूध देती है.
थिनले के पिता हमें बताते हैं, "सुबह दूध दुहने के बाद मैं उस दिन दोबारा दूध नहीं दुहता. वो बच्चों के लिए होता है."
दूध निकालने के बाद सभी याकों को सामने वाली घाटी में चरने के लिए छोड़ दिया जाता है.

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चीज़ बनाने के लिए याक के ताज़ा दूध को गर्म किया जाता है और उसमें थोड़ा दही मिलाकर रख दिया जाता है. फिर, अगले दिन जमे हुए दही से चीज़ बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है.
जब इस दही को मथने वाली मशीन में डाला जाता है, तो इससे मक्खन और छाछ बनता है. इस मक्खन को 'बटर' के रूप में बेचा जाता है या इससे घी बनाया जाता है.
मक्खन निकालने के बाद बचे हुए छाछ को उबाला जाता है. कुछ घंटों तक उबालने के बाद रिकोटा चीज़ जैसा दिखने वाला एक पदार्थ ऊपर तैरने लगता है.
रिकोटा इतालवी शब्द है और इसका मतलब है- दोबारा पकाया हुआ. लद्दाखी भाषा में इसे लाबू कहते हैं.
लाबू से पानी निकालने के लिए इसे एक कपड़े में लटकाया जाता है. दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ भी पदार्थ बर्बाद नहीं होता.
पनीर निकालने के बाद जो पानी बचता है उसमें मट्ठा प्रोटीन होता है. इस पौष्टिक पानी को फिर से याक को पीने के लिए दिया जाता है.

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थिनले की मां फिर इस लाबू को छोटे-छोटे टुकड़ों में सुखाती हैं. तेज गर्मी में यह चीज़ 2-3 दिनों में सूखकर तैयार हो जाता है. लद्दाखी व्यंजनों में इस चीज़ का इस्तेमाल सूप और स्टू बनाने में किया जाता है.
याक का दूध, छाछ, मक्खन और पनीर का स्वाद गाय के दूध और उससे बने उत्पादों से बहुत अलग होता है.
याक पालन से चीज़ प्रोड्यूसर तक - थिनले नुरबू का सफ़र

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याक पालन और चीज़ बनाना काफ़ी मेहनत का काम है. जब युवा पीढ़ी के ज़्यादातर लोग अपने पारंपरिक व्यवसायों से दूर जा रहे हैं, तब थिनले ने इस पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे व्यवसाय को क्यों चुना?
थिनले कहते हैं, "मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था. मैं दसवीं में फेल हो गया था. यहाँ लद्दाख में सोनम वांगचुक मेरे जैसे असफल बच्चों के लिए एक स्कूल चलाते हैं. उनका नाम सेकमोल है. मेरा भाई मुझे वहाँ ले गया था."
"वहीं से मैंने सीखा, हमारा पारंपरिक पेशा क्यों महत्वपूर्ण है. असल जीवन में आत्मनिर्भर होने का क्या मतलब है. सोनम सर की वजह से ही मैं आज इस मुकाम पर हूं, जहां चार लोग मुझे जानते हैं. वे मेरे काम की तारीफ़ करते हैं."
थिनले कहते हैं, "उन्होंने मुझे अपने माता-पिता के साथ यहीं रहने और काम करने, नई चीज़ें करने के लिए प्रेरित किया. नहीं तो मैं पर्यटन क्षेत्र में काम कर रहा होता या ड्राइविंग कर रहा होता."
थिनले ने रेसिपी में थोड़ा बदलाव करके और चीनी मिलाकर पारंपरिक चुरपी चीज़ का एक नया वर्ज़न तैयार किया है.
अब उनका ध्यान इस पर फ़ोकस्ड है कि इस चीज़ को और बेहतर कैसे बनाया जाए और इसका उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए.

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ब्राज़ील में कॉम्पिटीशन
मुंडियाल डो क्वेजो डो ब्राज़ील 2026 प्रतियोगिता का आयोजन ब्राज़ील में किया गया. इसमें दुनियाभर के चीज़ उत्पादकों ने हिस्सा लिया. इस प्रतियोगिता के लिए लद्दाख से याक चुरपी चीज़ भेजने का फ़ैसला लिया गया.
थिनले ने प्रतियोगिता के मानदंडों को पूरा करते हुए चीज़ बनाया. लेकिन समय पर येलो फ़ीवर का टीका न लगवा पाने की वजह से वह ब्राज़ील की यात्रा नहीं कर सके.
इसके बाद उन्होंने अपने चीज़ की एंट्री राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड के अधिकारियों के पास भेजी और फिर इस प्रतियोगिता में 'विश्व का सर्वश्रेष्ठ चीज़' के रूप में उनके चीज़ ने गोल्ड मेडल जीता.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर थिनले की तारीफ़ की. उन्होंने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में भी उनका और उनकी सफलता का ज़िक्र किया.
थिनले का कहना है कि तब से कई लोगों को इस चीज़ के बारे में पता चला है. उन्होंने तो अपने छोटे से होटल के बाहर गर्व से इसके बारे में एक बोर्ड भी लगा दिया है.

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लेकिन अंतरराष्ट्रीय ख्याति और पहचान मिलने के बावजूद थिनले अपने पहाड़ों और याकों को छोड़ना नहीं चाहते. वह यहीं रहना और काम करना चाहते हैं. वह दूसरों को इस व्यवसाय में आने में मदद करना चाहते हैं.
उनका कहना है, "अरुणाचल प्रदेश समेत पूर्वी राज्यों में भी याक चुरपी बनाया जाता है. लेकिन यह बहुत अलग होता है. भारत में लद्दाख में सबसे अधिक याक पाए जाते हैं. इसलिए लद्दाख प्रशासन और केंद्र सरकार को इसके लिए फंड देना चाहिए."
थिनले कहते हैं, "याक को लेकर बहुत कुछ किया जाना बाकी है. याक के दूध से न केवल अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थ बनते हैं, बल्कि याक के बालों से भी कई उत्पाद तैयार किए जाते हैं. यह ऊन बहुत गर्म होता है."
"इसके अलावा, याक की ऊन 'वाटरप्रूफ़' होती है. इससे तंबू बनाने का कपड़ा भी बनाया जाता है. याक का मांस भी खाया जाता है."
याक चुरपी का लद्दाख से बाहर प्रचार-प्रसार

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लद्दाख के ख़ानाबदोश समुदायों के घरों में बनाया जाने वाला यह चीज़ उनके रोज़ाना खानपान का हिस्सा है. यह चीज़ लद्दाख के बाहर उपलब्ध नहीं है.
यह लेह के बाज़ारों में भी आसानी से नहीं मिलता. लेकिन थिनले नुरबू के चीज़ को पुरस्कार मिलने के बाद अब इस पर विचार किया जा रहा है.
लेह के पशुपालन विभाग के प्रमुख डॉ. स्टैनज़िन राबग्यास कहते हैं, "हमने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ साझेदारी की है. हम चुरपी चीज़ के उत्पादन के लिए एक विशेष प्रक्रिया बनाएंगे और इसकी ब्रांडिंग करके इसे एक विशेष उत्पाद के रूप में कैसे बाज़ार में उतारा जाए, इन सबको लेकर स्टडी कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "इस चीज़ को एक विशेष उत्पाद के रूप में बेचा जा सकता है. निर्यात का स्टेज अभी बहुत दूर है. क्योंकि इसके लिए दूध के पाश्चुराइज़िंग से लेकर कई तरह की प्रक्रियाओं से गुज़रना होगा. उत्पाद के कई सारे टेस्ट और निरीक्षण भी करने होंगे."
"उसके बाद लाइसेंसिंग की जा सकती है. लेकिन हमारे देश का बाज़ार इतना बड़ा है कि अगर हम पहले इस उत्पाद को अपने ही देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा सकें, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी."
हालांकि, याक चुरपी चीज़ के मामले में अरुणाचल प्रदेश ने बाजी मार ली है. उन्हें इस चीज़ के लिए जीआई टैग हासिल हो गया है.
नेपाल में बनने वाला चुरपी चीज़ विदेशों में मशहूर है.
क्लाइमेट चेंज का असर
लद्दाख दो बड़े माउंटेन रेंज के बीच स्थित है. एक तरफ़ काराकोरम और दूसरी तरफ़ हिमालय की ज़ांस्कर रेंज.
दक्षिण भारत से आने वाले मॉनसून को हिमालय रेंज रोक देती है, इसलिए यहां बहुत कम बारिश होती है.
पर्माफ़्रॉस्ट और ग्लेशियर पर लद्दाख अपने पानी के लिए निर्भर रहता है. पर्माफ़्रॉस्ट ऐसी बर्फ़ है जो लंबे समय तक जमी रहती है.
दरअसल, थिनले जो चीज़ बनाते हैं वो पूरी तरह से नेचुरल है. इसमें किसी भी तरह की मिलावट नहीं है.
ये याक पहाड़ों में, घास के मैदानों में, खुले आसमान के नीचे चरते हैं. चीज़ बनाने की प्रक्रिया भी याक के दूध से ही की जाती है. इसमें कुछ भी मिलाया नहीं जाता.
लेकिन जिससे याक, दूध और चीज़ का उत्पादन प्रभावित होता है, वो है क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन.
जलवायु परिवर्तन का असर लद्दाख घाटी में भी महसूस किया जा रहा है. हमने जुलाई के मध्य में इस क्षेत्र का दौरा किया था. चांग-ला दर्रे पर काफ़ी ठंड थी.
पर्वत की चोटियों और पहाड़ियों पर बर्फ़ थी. लेकिन जैसे ही हमने दर्रा पार किया और थिनले के खेत की ओर बढ़े, किनारे पर बर्फ़ कम होती गई.

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थिनले के पिता याद करते हुए कहते हैं, "पहले हमारे सामने पहाड़ पर पूरी तरह बर्फ़ जमी रहती थी. पहाड़ी की चोटी पर भी इतनी बर्फ़ होती थी कि आती हुई गाड़ी दिखाई नहीं देती थी. अब वैसी बर्फ़ नहीं दिखती. सब कुछ गायब हो गया है."
"गर्मी बहुत बढ़ गई है. पहले बहुत गर्मी होती थी. हरियाली भी इतनी नहीं थी. पहले दो महीने तक हरियाली रहती थी, फिर बर्फ़ जमने लगती थी. अब तो हर दो फ़ीट पर भी बर्फ़ नहीं जमती. तुरंत पिघल जाती है. मौसम पूरी तरह बदल गया है."
डॉ. राबग्यास का भी यह कहना है कि जलवायु परिवर्तन का असर महसूस किया जा रहा है.
उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन से चारागाहों और पशुओं के जीवन पर असर पड़ रहा है और समस्याएं पैदा हो रही हैं. उन्होंने कहा कि इससे पशुओं के प्रजनन पर भी प्रभाव पड़ रहा है और उनकी संख्या घट रही है.
थिनले का भी यह कहना है कि पहाड़ों पर अब पहले की तुलना में कम बर्फ़ है.
वह कहते हैं, "जून-जुलाई में भी सभी पहाड़ बर्फ़ से ढके रहते थे. अब तो दिसंबर में भी उतनी बर्फ़ नहीं दिखती. इसलिए इस बर्फ़ से होने वाली पानी की आपूर्ति भी कम हो रही है."
उन्होंने बताया, "इस साल पहाड़ों पर कुछ बर्फ़ गिरी है, वरना बहुत सूखा रहता है. ये ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव हैं. अब ऐसी जगहों पर भी चीज़ें उग रही हैं जहां हरियाली नहीं होनी चाहिए, जहां पेड़ नहीं उगने चाहिए."
वह बताते हैं, "अगर आप यहां से नीचे जाएं तो 14-15 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर पेड़ नहीं उगते थे. अब वहां पेड़ हैं. यह जलवायु परिवर्तन है."
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