सऊदी झेल रहा है हमले, फिर पाकिस्तान और तुर्की क्यों नहीं लागू कर रहे मक्का समझौता

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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा कि सऊदी अरब पर किसी भी हमले की स्थिति में मक्का डिफेंस अलायंस सक्रिय हो सकता है.
उन्होंने चेतावनी दी कि किसी एक सदस्य के ख़िलाफ़ आक्रामकता को मक्का समझौते में शामिल तीनों देशों पर हमले के रूप में लिया जाएगा.
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब सऊदी अरब ने अपने दक्षिणी हिस्से में कई एनर्जी सेंटर को बंद कर दिया. यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर नए हमले करने का दावा किया है.
हूती विद्रोहियों के ये हमले ऐसे समय में हुए हैं, जब ईरान ने अमेरिका के प्रति और आक्रामक रुख़ अपनाने की चेतावनी दी है.
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने जियो न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "हम इस समझौते की शर्तों और नियमों से बंधे हैं और, इंशाअल्लाह, अगर आक्रामकता होती है तो हम इस समझौते का सम्मान करेंगे. इस बारे में कोई अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए." उन्होंने कहा कि हूतियों को यह समझना चाहिए कि उनके क़दम "इस समझौते को सक्रिय कर सकते हैं."
तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर पिछले महीने मक्का में हस्ताक्षर हुए थे.
आसिफ़ ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान से संपर्क किया है या नहीं, लेकिन उन्होंने दोहराया कि "समझौते के मुताबिक़ मदद करना या प्रतिक्रिया देना हमारी ज़िम्मेदारी है."
आसिफ़ ने कहा कि यह समझौता आक्रामक नहीं बल्कि रक्षात्मक है और इसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में सभी सदस्य सामूहिक रूप से जवाब दे सकते हैं. उन्होंने हूती विद्रोहियों से सऊदी अरब को यमन के संघर्ष में और ज़्यादा खींचने से बचने की अपील की और कहा कि ऐसा करने की किसी भी कोशिश से यह समझौता सक्रिय हो सकता है.
उन्होंने कहा, "हम उम्मीद कर रहे हैं कि स्थिति शांत हो जाएगी."

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तुर्की और सऊदी अरब ने क्या कहा?
हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अपने बयान में इस हमले की केवल निंदा की है और कहा कि पाकिस्तान सऊदी के साथ खड़ा है. शरीफ़ ने मक्का समझौते का ज़िक्र नहीं किया. दूसरी तरफ़ तुर्की ने भी इस हमले की निंदा की है लेकिन मक्का समझौते को सक्रिय करने की चेतावनी नहीं दी है.
तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा, ''हम सऊदी अरब के ख़िलाफ़ हूती विद्रोहियों के हाल में किए गए हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. इन हमलों में आम नागरिकों की सुरक्षा की अनदेखी की गई है और इससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ा है. हम सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपना समर्थन दोहराते हैं."
"ये हमले यमन में संघर्ष को स्थायी राजनीतिक समाधान के ज़रिए ख़त्म करने के लिए किए जा रहे कूटनीतिक प्रयासों को भी कमज़ोर करते हैं. हम हूती विद्रोहियों से अपनी आक्रामक कार्रवाइयां तत्काल बंद करने का आह्वान करते हैं.''
तुर्की ने मक्का समझौते को लागू करने की बात नहीं कही है. इस समझौते में शामिल तीनों देशों में तुर्की को सैन्य शक्ति मामले में सबसे ज़्यादा आधुनिक माना जाता है.
वहीं सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान अल सऊद ने कहा, ''हूती विद्रोहियों ने अपने लिए ऐसी स्थिति पैदा कर ली है, जिसे वे झेल नहीं पाएंगे. इसलिए, मैं यह नहीं कहूंगा कि कूटनीति का दरवाज़ा बंद हो रहा है. सऊदी अरब हमेशा शांति और कूटनीतिक समाधान का समर्थन करेगा.''
''लेकिन सऊदी अरब अपनी रक्षा करने में ज़रा भी हिचकिचाएगा नहीं. वह अपने हितों की रक्षा करने में भी पीछे नहीं हटेगा और ऐसे क़दमों का समर्थन करने में भी संकोच नहीं करेगा, जो उसके हितों के साथ-साथ भाईचारे वाले देश यमन की सुरक्षा और स्थिरता के लिए भी ज़रूरी हों."

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क्यों नहीं लागू हो रहा मक्का समझौता
अब लोग सवाल पूछ रहे हैं कि मक्का समझौता आख़िर किन दिनों के लिए है?
पाकिस्तान की विदेश नीति पर गहरी नज़र रखने वाले हबीबउल्लाह ख़ान मानते हैं कि किसी हमले को हमेशा एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर देखा जाता है.
ख़ान ने एक्स पर लिखा है, ''मिसाल के तौर पर सीरिया में तुर्की पर हुए हमले को मक्का समझौते के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाएगा. इसी तरह फॉकलैंड द्वीप समूह में ब्रिटेन पर हुआ हमला नेटो के दायरे में नहीं आएगा. हालांकि अभी हमला सऊदी अरब के भीतर हुआ है, इसलिए कम से कम इस शर्त को पूरा करता है.''
''बहुपक्षीय गठबंधन देशों के ख़िलाफ़ होते हैं, उनके प्रॉक्सी समूहों के ख़िलाफ़ नहीं. इसकी वजह यह है कि इन सभी देशों के अपने-अपने प्रॉक्सी हैं और वे जानते हैं कि यह एक जटिल और अस्थिर संबंध है, जिसमें उनका प्रभाव होता है, लेकिन वह सीमित होता है. ज़्यादातर प्रॉक्सी समूह विचारधारा के मुक़ाबले पैसे से संचालित होते हैं.''
थिंक टैंक अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी ने 19 अगस्त को प्रकाशित हुए एक आर्टिकल में लिखा है कि मक्का समझौते से वास्तविक सैन्य प्रतिक्रिया होने की संभावना कम है.
इस आर्टिकल के मुताबिक़ बेशक, मक्का समझौता सऊदी अरब के लिए अमेरिका की सुरक्षा गारंटी की जगह नहीं लेता. सऊदी जिन देशों को अपने साथ लेकर आया है, वे पहले से ही अमेरिका के सहयोगी हैं. यही वजह है कि अमेरिका ने इस समझौते को लेकर कोई चिंता नहीं जताई है.

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सऊदी अरब की सुरक्षा कौन करेगा?
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फ़िदान ने स्पष्ट रूप से कहा था कि इस समझौते में किसी साझा दुश्मन की पहचान नहीं की गई है और यह ईरान के ख़िलाफ़ नहीं है.
उन्होंने यह भी कहा था कि इसकी तैयारियां दो साल से भी ज़्यादा समय से चल रही थीं. इसका मक़सद इस समझौते को मौजूदा युद्ध से अलग दिखाना था. तुर्की और ईरान में सहयोग भी रहता है और प्रतिद्वंद्विता भी.
पाकिस्तान की ईरान के साथ क़रीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा है. देश में बड़ी शिया आबादी है, जिसकी मौजूदगी सेना के अधिकारी वर्ग तक भी है. फ़रवरी 2026 में ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद पाकिस्तान में ईरान के समर्थन में लोग सड़कों पर उतरे थे.
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई है. पाकिस्तान की इस भूमिका को किसी सैन्य टकराव में शामिल होने के अनुकूल नहीं देखा जा रहा है. सऊदी-पाकिस्तान संबंधों को लेन-देन पर आधारित बताया जाता है.
अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''अक्तूबर 2025 से अफ़ग़ानिस्तान के साथ अपने टकराव में पाकिस्तान को समर्थन देने में सऊदी ने बहुत कम दिलचस्पी दिखाई थी. इसके बदले पाकिस्तान की भी सऊदी अरब के संघर्षों का बोझ उठाने में बहुत कम दिलचस्पी है. पाकिस्तान सऊदी क्षेत्र की रक्षा के लिए सैनिक उपलब्ध करा सकता है, लेकिन ईरान या हूतियों के ख़िलाफ़ किसी आक्रामक कार्रवाई में शामिल नहीं होगा.''
विश्लेषकों का मानना है कि मक्का समझौते को चिंता के संकेत के तौर पर देखना सबसे उचित होगा. इसके पीछे यह सोच है कि किसी एक सुरक्षा गारंटर पर निर्भर रहना अब समझदारी नहीं है. ख़ास करके सऊदी का अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है.
तुर्की नेटो की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है. पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुस्लिम बहुल परमाणु शक्ति संपन्न देश है. सऊदी अरब एक प्रमुख तेल निर्यातक है, जिसके पास बड़ी वित्तीय ताक़त और आधुनिक पश्चिमी हथियार हैं. इन तीनों शक्तियों के एकसाथ आने को अहम माना जा रहा है.
निक्केई एशिया से अटलांटिक काउंसिल के नॉन-रेज़िडेंट सीनियर फेलो डैनी सिट्रिनोविच ने कहा कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि नया गठबंधन किसी हमले के जवाब में किस तरह की कार्रवाई कर पाएगा. उन्होंने कहा, "हमने हाल के हूती हमले के ख़िलाफ़ पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की कोई संयुक्त जवाबी कार्रवाई नहीं देखी."

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पिछले महीने सीएनएन तुर्क के साथ एक इंटरव्यू में तुर्की के उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ से पूछा गया कि क्या यह समझौता सऊदी अरब और ईरान या भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष की स्थिति में तुर्की को कार्रवाई करने के लिए बाध्य कर सकता है.
उन्होंने जवाब में कहा, "एकजुटता के कई रूप होते हैं. ऐसे समझौतों में देशों के बीच एकजुटता दिखाने के लिए किसी प्रक्रिया में तुरंत या स्वतः शामिल होना ज़रूरी नहीं होता."
इसका संकेत यह था कि गठबंधन के सदस्य देश अन्य दो सदस्यों से जुड़े सशस्त्र संघर्षों में तत्काल और सीधे तौर पर शामिल होने से बच सकते हैं.
अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी भी यही मानते हैं कि अगर इस सैन्य गठजोड़ में शामिल देशों का कोई साझा दुश्मन नहीं है तो डिफ़ेंस पैक्ट हो सकता है लेकिन जॉइंट डिफ़ेंस पैक्ट नहीं है.
हुसैन हक़्क़ानी ने एक्स पर लिखा है, ''जॉइंट डिफ़ेंस आम तौर पर किसी साझा दुश्मन के ख़िलाफ़ होता है. अगर कोई साझा दुश्मन नहीं है, तो डिफ़ेंस कोऑपरेशन हो सकता है, लेकिन जॉइंट डिफ़ेंस पैक्ट नहीं. पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के दुश्मन अलग-अलग हैं. इसलिए इस समझौते के बाद संसाधनों के इस्तेमाल और रक्षा उपकरणों के निर्माण में सहयोग बढ़ सकता है, लेकिन मुस्लिम नेटो नहीं बनेगा.''
हक़्क़ानी कहते हैं, ''सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान डिफ़ेंस पैक्ट प्रतीकात्मक ज़्यादा है. किसी साझा दुश्मन का होना आपसी रक्षा समझौते का पहला आधार होता है और यहां वह मौजूद नहीं है.''
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