जस्टिस संजय अग्रवाल के शपथ लेने के बाद क्या राजस्थान हाई कोर्ट में चल रहा विवाद ख़त्म हो पाएगा?

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- Author, विनीत भल्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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- पढ़ने का समय: 8 मिनट
जस्टिस संजय अग्रवाल ने सोमवार को राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली. इसके साथ ही राज्य में पिछले कुछ दिनों से चल रहा न्यायिक और प्रशासनिक संकट सुलझता हुआ दिख रहा है.
दरअसल हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (एक्टिंग चीफ़ जस्टिस) संजीव प्रकाश शर्मा के कामकाज के तरीक़ों का पिछले कई महीनों से विरोध कर रहे वकीलों ने छह सितंबर तक हड़ताल का एलान किया था. वकीलों ने ये एलान 31 अगस्त को किया था. हालांकि, अब नए चीफ़ जस्टिस के शपथ लेने के बाद ये हड़ताल ख़त्म हो गई.
ये विवाद यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज ने भी भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को पत्र लिखकर जस्टिस शर्मा पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लगाए थे.
हालांकि, जस्टिस शर्मा ने अपने ऊपर सभी आरोपों को 'निराधार, झूठा और तथ्यहीन' करार दिया है.
दरअसल, हाई कोर्ट में चल रहे गतिरोध और टकराव को शांत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 31 अगस्त की शाम छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का नया मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी.
कॉलेजियम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ जजों का वह समूह होता है जो जजों की नियुक्ति और तबादले तय करता है.
इसके साथ ही कॉलेजियम ने एक और प्रस्ताव पारित कर जस्टिस अग्रवाल का तत्काल प्रभाव से राजस्थान हाईकोर्ट में तबादला भी कर दिया था.
वकीलों का गुस्सा और हड़ताल

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यह पूरा घटनाक्रम तब चरम पर पहुंच गया जब जोधपुर के वकीलों ने छह सितंबर 2026 तक न्यायिक कार्यों के बहिष्कार की घोषणा कर दी. वकीलों की नाराज़गी और उनकी मांगें तीन डॉक्यूमेंट्स में दर्ज थीं.
इनमें दो अलग-अलग पत्र जो सीजेआई को दिसंबर 2025 और अप्रैल 2026 में लिखे गए थे, इसके अलावा 31 अगस्त की संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति शामिल हैं.
इन तीनों में ही तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली को लेकर अलग-अलग आरोप लगाए गए थे.
हालांकि, छह सितंबर को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में वकीलों के दोनों संगठनों ने इस बात पर भी रोशनी दी कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने "जस्टिस शर्मा की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक आचरण के संबंध में गंभीर आपत्तियों को लेकर अभी भी कोई निर्णय नहीं लिया है."
सीजेआई को लिखे गए पहले पत्र में राजस्थान हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन, जोधपुर ने आरोप लगाया कि स्थापित न्यायिक परंपराओं से हटकर, वकीलों के संघ से बिना किसी परामर्श के एकतरफ़ा फ़ैसले लिए जा रहे हैं.
पत्र में इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई गई कि जिस दिन वकील विरोध स्वरूप न्यायिक कार्य में हिस्सा नहीं ले रहे थे, उस दिन भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मुक़दमों की सूची जारी की और वकीलों की अनुपस्थिति में उनके ख़िलाफ़ आदेश पारित किए.
इस पत्र में 'कार्यवाहक शक्तियों के अतिक्रमण (ओवररीच ऑफ़ एक्टिंग पावर्स) का ज़िक्र करते हुए जल्द से जल्द एक स्थायी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की अपील की गई थी.
वहीं, सीजेआई को भेजे गए दूसरे पत्र में राजस्थान हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन, जोधपुर ने बार और बेंच के बीच संवाद की कमी और बिगड़ते संबंधों का मुद्दा उठाया.
इस पत्र में आरोप लगाया गया था कि वकीलों को बैठने के लिए 10x10 फीट के टीन शेड जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध कराने में अदालत की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है.
इस पत्र के जरिए वकीलों ने मांग की कि सौहार्दपूर्ण वातावरण फिर से स्थापित करने के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शर्मा का तबादला राजस्थान से बाहर किसी दूसरे राज्य में कर दिया जाए.
वहीं, 26 अगस्त को यह बात सामने आई कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता ने भी जस्टिस शर्मा के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक जस्टिस मेहता ने सीजेआई सूर्यकांत को अगस्त महीने में तीन अलग-अलग पत्र लिखे थे. जस्टिस मेहता खुद राजस्थान हाई कोर्ट से पदोन्नत होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं.
इन पत्रों में जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा पर 'प्रशासनिक कुप्रबंधन', 'भाई-भतीजावाद' और 'भ्रष्टाचार' के आरोप लगाए.
जस्टिस मेहता ने इसमें लिखा कि जस्टिस शर्मा 'मास्टर ऑफ रोस्टर', वह विशेषाधिकार जिससे तय होता है कि कौन सा केस किस जज के पास जाएगा, की अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं और अमीर वादियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए चुनिंदा मामलों को अपनी बेंच में ट्रांसफर कर रहे हैं.

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इसके बाद 'राजस्थान हाई कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन' और 'एडवोकेट्स एसोसिएशन' ने आपसी बातचीत के बाद निर्णय लिया कि सारे वकील 6 सितंबर 2026 तक सभी अदालतों में व्यक्तिगत या वर्चुअल रूप से हड़ताल करेंगे.
31 अगस्त को दोनों ने एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी की, जिसमें जस्टिस मेहता द्वारा लगाए गए प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग, पक्षपात और मुकदमों की लिस्टिंग में हस्तक्षेप के आरोपों का हवाला दिया गया.
इस प्रेस नोट में वकीलों ने 'टारगेटेड फाइल सिस्टम' का विशेष रूप से कड़ा विरोध किया. वकीलों का आरोप था कि केवल पुराने मुकदमों को निपटाने के नाम पर जिस लक्षित तरीके से मामलों की सुनवाई की जा रही है, उससे वकीलों के पेशेवर जीवन पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है और उनका 'वर्क-लाइफ बैलेंस' पूरी तरह बिगड़ गया है.
'टारगेटेड फाइल सिस्टम' एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें केवल लंबे समय से लंबित होने के आधार पर पुराने मुक़दमों को चुनकर उनके जल्दी निपटारे के लिए सूचित किया जाता है.
वकीलों ने 6 सितंबर 2026 तक सभी अदालतों में व्यक्तिगत या वर्चुअल रूप से उपस्थित न होकर न्यायिक कार्यों से पूरी तरह अलग रहने का फैसला किया.
इस भारी दबाव के बीच, एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शर्मा ने खुद को न्यायिक कार्यों से अलग कर लिया.
उन्होंने एक नया रोस्टर जारी किया, जिसमें 1 सितंबर से 5 सितंबर तक उनकी अपनी अदालत (कोर्ट नंबर 2) को 'नॉन-सिटिंग' यानी अवकाश घोषित कर दिया गया और उनके पास वाले मुकदमों को अन्य जजों को सौंप दिया गया.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को 'राजस्थान हाई कोर्ट एडवोकेट्स लॉयर्स एसोसिएशन' के प्रमुख रंजीत जोशी और 'राजस्थान हाई कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन' के प्रमुख दिलीप सिंह उदावत ने बताया था कि वो तब तक हड़ताल जारी रखेंगे, जब तक औपचारिक तौर पर जस्टिस अग्रवाल का उनके उच्च न्यायालय में तबादला नहीं होता.
जस्टिस शर्मा ने क्या कहा?
जस्टिस शर्मा ने एक बयान जारी कर कहा कि वो अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन करते हैं.
उन्होंने कहा, "मैंने अपना पक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत जी के समक्ष रख दिया है. "
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उन्हें भारतीय न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा है और सही समय और सीजेआई से स्वीकृति मिलने के बाद वो ख़ुद मीडिया के सामने आकर अपना पक्ष रखेंगे.
तबादले और नियुक्ति के 'डबल' प्रस्ताव की वजह

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किसी भी हाई कोर्ट में स्थायी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति एक लंबी प्रक्रिया होती है. कॉलेजियम की सिफ़ारिश के बाद फाइल केंद्र सरकार के पास जाती है, जहां कई स्तरों पर विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से नियुक्ति का नोटिफ़िकेशन जारी किया जाता है. इस प्रक्रिया में कई हफ़्ते या महीने लग सकते हैं.
दूसरी ओर, किसी मौजूदा जज का एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में तबादला अपेक्षाकृत तेज़ प्रक्रिया है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अग्रवाल का तबादला इसलिए किया है ताकि वह बिना किसी देरी के राजस्थान हाई कोर्ट पहुँच सकें.
राजस्थान हाई कोर्ट पहुँचते ही, अपनी वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस अग्रवाल ख़ुद-ब-ख़ुद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का पदभार संभाल लेंगे. इसका मतलब यह है कि स्थायी मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी औपचारिक नियुक्ति का इंतज़ार किए बिना ही, वर्तमान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शर्मा को प्रशासनिक और न्यायिक नेतृत्व से तुरंत हटाया जा सकेगा.
जस्टिस शर्मा 2016 में राजस्थान हाई कोर्ट में जज बने. 2022 में उनका तबादला पटना हाई कोर्ट कर दिया गया था. इसके बाद उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए वापस राजस्थान भेजे जाने की अपील की तो तत्कालीन सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ के कॉलेजियम ने इसे ठुकराते हुए उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट भेज दिया था.
हालांकि, बाद में एक अन्य कॉलेजियम ने उन्हें राजस्थान वापस भेज दिया, जहां वरिष्ठता के कारण वे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बन गए. वह इसी महीने 26 सितंबर को रिटायर होने वाले हैं.
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