'भविष्य में बुज़ुर्गों को गोली मार देंगे युवा'

हे फ़ेस्टिवल
    • Author, रेबेका लॉरेंस और फ़ियोना मैक्डोनाल्ड
    • पदनाम, बीबीसी कल्चर
  • प्रकाशित

ब्रिटेन में साहित्य और कला का एक मशहूर मेला लगता है. इसका नाम है, हे फ़ेस्टिवल. ब्रिटेन के वेल्स सूबे में 'हे ऑन वाय' नाम का एक क़स्बा है. ये क़स्बा पिछली सदी से ही अपनी ढेर सारी क़िताबों के लिए मशहूर रहा है. यहीं पर होता है हे फ़ेस्टिवल.

1988 में नॉर्मन और पीटर फ्लोरेंस ने मिलकर हे फ़ेस्टिवल की शुरुआत की थी. आज ये पूरी दुनिया में मशहूर है. मई-जून में दस दिन के लिए कला और साहित्य के दिग्गज यहाँ पर जमा होते हैं. किताब की पढ़ने वालों की, लोगों की दिलचस्पी की बातें करते हैं.

हे फ़ेस्टिवल

इस बार हे फ़ेस्टिवल में सबसे ज़्यादा चर्चा हुई लेखिका लायोनेल श्राइवर की. लायोनेल यहाँ अपनी नई किताब 'द मैंडीबेल्स' की चर्चा करने आई थीं. वो दुनिया की वित्तीय व्यवस्था पर लिखती हैं. किताबों में लायोनेल ने ये समझाने की कोशिश की है कि अगर अमरीका की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी तो क्या होगा?

वो ये समझने और समझाने की कोशिश कर रही हैं कि आख़िर सभ्यता कैसे तबाह होती है. लायोनेल की किताब 'द मैंडीबेल्स' भविष्य की डरावनी तस्वीर दिखाती है. वो कहती हैं कि आज की चमक-दमक भरी दुनिया बेहद कमज़ोर बुनियाद पर खड़ी है. पूरी अर्थव्यवस्था नक़ली पैसे की है. आज दुनिया कर्ज़ में डूबी हुई है.

लायोनेल श्राइवर ने द मैंडीबेल्स में ये बताया है कि तब क्या होगा जब युवाओं को बुजुर्गों का बोझ उठाना होगा. वो कहती हैं कि 2047 के आते-आते स्कूलों में शूटआउट नहीं होंगे. बल्कि बुजुर्गों के लिए बने ठिकानों पर गोलीबारी होगी. बुजुर्गों का ख़र्च उठाने से युवा इतने बेज़ार हो जाएंगे कि वो ज़ईफ़ों को गोली मार देना बेहतर समझेंगे.

लायोनेल कहती हैं कि उनका दिमाग़ बेहद शैतानी है. वो घटिया, ग़लत बातें सोचता है. झगड़ालू है. ख़ुद का मज़ाक़ बनाते वक़्त उनकी आँखों में ख़ास चमक दिखती है.

हे फ़ेस्टिवल में आए एक और लेखक मार्लोन जेम्स ख़ुद को यूनानी पौराणिक कहानियों का मुरीद बताते हैं. वो कहते हैं कि कोई नई कहानी या किताब लिखने से पहले वो पुरानी ग्रीक कहानियाँ ख़ूब पढ़ते हैं.

जमैका के रहने वाले मार्लोन जेम्स ने पिछले साल ही अपनी क़िताब, 'ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ सेवेन किलिंग्स' के लिए मैन बुकर प्राइज़ जीता था. जेम्स अपनी कहानियों के किरदार बेहद घटिया दर्जे के इंसानों के तौर पर गढ़ते हैं. जेम्स कहते हैं कि उन्हें ग्रीक ट्रैजेडी बहुत पसंद है.

हे फ़ेस्टिवल

जमैका की राजधानी किंग्सटन के गिरोहों के बारे में उनकी कहानी ख़ूब चर्चित हुई. वो कहते हैं कि समाज की ख़राब चीज़ों से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता. जेम्स के मुताबिक़, क़िताबें पढ़ने वाले अक्सर सच्चाई से मुँह मोड़ने के लिए ऐसा करते हैं. वो कहते हैं कि इसी मोड़ पर वो क़िताबों के पढ़ने वालों को पकड़कर सच्चाई से रूबरू कराते हैं.

हे फ़ेस्टिवल में अंग्रेज़ लेखिका शार्लोट ब्रॉन्ट की दो सौवीं सालगिरह भी मनायी गई. इसमें लेखिका ट्रेसी शेवालियर ने ब्रॉन्ट के उपन्यास जेन आयर की एक लाइन पर नए लेखकों से कहानियाँ लिखने को कहा. 21 महिला लेखिकाओं ने इस बारे में कहानियाँ लिखीं. बाद में कुछ लेखिकाओं ने स्टेज पर इनमें से कुछ कहानियाँ पढ़ीं.

फ़ेस्टिवल में आए इटली के पत्रकार और लेखक रॉबर्टो सैवियानो ने कहा कि वो मुसीबतें मोल लेने के उस्ताद हैं. वो कहते हैं कि उन्हें किसी किताब से मुश्किल नहीं हुई. वो जिस तरह अपने पढ़ने वालों तक पहुँचे, उससे उन पर मुसीबत आई. रॉबर्टो इस फ़ेस्टिवल में भी तगड़ी सुरक्षा के बीच शामिल हुए. 2006 में उनकी किताब गोमोरा के छपने के बाद से ही वो माफ़िया के निशाने पर हैं.

इस किताब में उन्होंने इटली के शहर नेपल्स के माफ़िया का कच्चा चिट्ठा खोला था. रॉबर्टो कहते हैं कि अगर किसी लेखक का लिखा, पढ़ा और समझा जाता है और लोग उसका बचाव करते हैं, तो वो लेखक सुरक्षित है.

रॉबर्टो के निशाने पर अब है ब्रिटेन. वो कहते हैं कि यूरोप की वित्तीय राजधानी, लंदन, दुनिया की सबसे भ्रष्ट जगह है. रॉबर्टो के मुताबिक़ अपराध की अर्थव्यवस्था, असली अर्थव्यवस्था से ज़्यादा बड़ी है. अगर ये अंडरवर्ल्ड इकॉनमी ध्वस्त हो जाए तो पूंजीवादी दुनिया डूब जाएगी.

रॉबर्टो का कहना है कि हमें हर उस बात पर यक़ीन नहीं करना चाहिए, जो बताई जाए. वो कहते हैं कि चीज़ों को पर्दा हटाकर देखना चाहिए, तभी सच्चाई सामने आएगी.

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बांग्लादेश की लेखिका तहमीमा अनम ने भी हे फ़ेस्टिवल में शिरकत की. उन्होंने बांग्लादेश की जंगे आज़ादी पर तीन क़िताबों की सीरीज़ लिखी. वो कहती हैं कि ये क़िताबें लिखकर उन्होंने ख़ुद को अपने देश के इतिहास में साझीदार बना लिया है. तहमीमा अपने पिता के साथ घूम-घूमकर कई देशों में रहीं, इसीलिए उन्हें अपने देश से जुड़ाव नहीं हो सका.

वो कहती हैं कि यही बात उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ूबी है. तहमीमा ने कहा कि लेखक होने की सबसे अच्छी बात ये है कि आपको जो भी ऊटपटांग चीज़ें पसंद हैं, वो सब बातें उठाकर आप अपनी किताब में, अपनी कहानी में डाल सकते हैं.

हे फ़ेस्टिवल में आए ऑस्ट्रेलियाई लेखक पीटर कैरे ने कहा कि उन्हें लोगों के ख़्याल में अपने किरदार देखकर ख़ुशी होती है. 1988 में उनके उपन्यास 'ऑस्कर एंड लूसिंडा' ने बुकर पुरस्कार जीता था. वो 26 साल से न्यूयॉर्क में रह रहे हैं. वो लौटकर ऑस्ट्रेलिया नहीं जाना चाहते. लेकिन उनके क़िस्सों में बचपन के ऑस्ट्रेलिया की झलक मिलती है. वो कहते हैं कि लेखक अपनी कहानियों से सिर्फ़ जानकारी नहीं साझा करते. हम लोगों के ख़यालों को आकार देते हैं.

जर्मन लेखकों जे इवांस और नील मैक्ग्रेगर ने जर्मनी के हालात पर चर्चा की. दोनों ने जर्मनी के इतिहास पर क़िताबें लिखी हैं. वो कहते हैं कि लोगों की यादों और इतिहास में बड़ा फ़र्क़ होता है. दोनों ने कहा कि हिटलर का नाज़ी शासन, जर्मनी के ज़ेहन पर आज भी हावी है. उस दौर की इमारतें, उस दौर की याद दिलाती हैं. लोग अक्सर उन इमारतों के पास से गुज़रते हुए उस दौर की बातें करने लगते हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहाँ क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160601-writers-quotes-im-good-at-getting-into-trouble" platform="highweb"/></link> करें, जो<link type="page"><caption> बीबीसी कल्चर </caption><url href="http://www.bbc.com/culture/" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)

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