सऊदी अरब में '52 को होगी मौत की सज़ा'?

अली
प्रकाशित

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सऊदी अरब के एक ही दिन में कई लोगों को मौत की सज़ा देने से जुड़ी ख़बरों पर चिंता जताई है.

समाचार पत्र ओकाज़ के मुताबिक 'चरमपंथ से जुड़े अपराधों' के लिए 55 लोग मौत की सज़ा के इंतज़ार में हैं.

वहीं अल रियाद ने एक रिपोर्ट में बताया था कि 52 लोगों को जल्दी ही मौत की सज़ा दी जाएगी. हालांकि, ये रिपोर्ट अब हटा ली गई है.

माना जा रहा है कि इनमें शिया समुदाय के वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि इस साल मौत की सज़ा में हुए इजाफे को देखते हुए उनके पास इन ख़बरों को गंभीरता से लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है कि इस साल सऊदी अरब में अब तक 151 लोगों को मृत्युदंड दिया जा चुका है. साल 1995 के बाद से ये सबसे बड़ी संख्या है.

साल 2014 में 90 लोगों को मौत की सज़ा दिए जाने की जानकारी मिली थी.

सऊदी अरब

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दिनों में जिन्हें मौत की सज़ा दी जानी हैं उनमें 'अल कायदा के चरमपंथी' और अवामिया इलाके के लोग शामिल हैं.

अवामिया क़तीफ क्षेत्र का एक शहर है. साल 2011 से ये सऊदी अरब के शिया अल्पसंख्यकों के विरोध का केंद्र रहा है.

एमनेस्टी के मुताबिक जिन लोगों को जल्दी ही मौत की सज़ा दी जानी है, उनमें अवामिया के छह शिया कार्यकर्ता शामिल हैं.

संगठन का मानना है कि इन्हें साफ तौर पर अनुचित सुनवाई के दौरान दोषी ठहराया गया.

एमनेस्टी के मिडिल इस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के डिप्टी डायरेक्टर जेम्स लेंच ने कहा, " ये स्पष्ट है कि सऊदी अरब के अधिकारी चरमपंथ के मुक़ाबले के बहाने राजनीतिक हिसाब चुकता कर रहे हैं. "

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उन्होंने कहा, " मौत की सज़ा पाने वाले छह में से तीन कार्यकर्ताओं को बचपन में किए गए अपराधों के लिए सज़ा सुनाई गई. उनका कहना है कि जुर्म कबूल करने के लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया."

ये तीन हैं अली अल-निम्र, अब्दुल्लाह अल-ज़हर और हुसैन अल-महरुन. इस साल अली के मामले को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा छिड़ गई थी.

छह में पांच की माओं ने मंगलवार को शाह सलमान को पत्र लिखा और अपने बेटों के लिए क्षमदान की मांग की.

लेंच ने कहा, "मौत की सज़ा पर अमल नहीं होना चाहिए और सऊदी अरब को मौत की सज़ा से जुड़े मामलों को लेकर बरती जाने वाले गोपनीयता पर से पर्दा हटाना चाहिए."

सऊदी अरब दलील देता रहा है कि मौत की सज़ा शरिया के मुताबिक दी जाती रही है और सुनवाई निष्पक्ष मानदंडों के मुताबिक होती है.

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