ऑनलाइन अतीत को मिटाने की मुहिम

    • Author, वैलेरिया पेरासो
    • पदनाम, डब्लूएस सोशल अफेयर्स रिपोर्टर
  • प्रकाशित

एक नई पहल 'राइट टू रिमूव' के तहत ब्रिटेन चाहता है कि 18 साल से कम उम्र के इंटरनेट यूज़र्स को पुराने पोस्ट हटाने का अधिकार मिले.

यूरोप में पांच साल से लोग 'राइट टू फ़ॉरगोटेन' का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी का विस्तार 'राइट टू रिमूव' है.

लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर विवाद भी शुरू हो गया है.

आप इंटरनेट पर एक ऐसे बटन के बारे में कल्पना करें जो आपकी पिछली ऑनलाइन गतिविधियों को हमेशा के लिए हटा दे.

ब्रिटेन में इसे लेकर एक अभियान हाल ही में शुरू किया गया है.

अभियान

'आई राइट्स' की यह शुरुआत इस विचार पर आधारित है कि युवाओं के पास ख़ुद के बनाए गए इंटरनेट कंटेट को आसानी से संपादित या मिटाने का अधिकार होना चाहिए.

इस मुहिम को ब्रिटेन के इंटरनेट सुरक्षा मामलों के मंत्री का समर्थन हासिल है. इसका मक़सद आज की डिजिटल पीढ़ी को सशक्त करना है.

इस मुहिम को शुरू करने वाले बारोनेट बीबन कीडरॉन ने बीबीसी से कहा, "नाबालिग और नौजवान सामाजिक और विकास संबंधी बदलावों से गुजरते ये पाते हैं कि 14-15 साल की उम्र में किए गए उनके काम सही नहीं थे."

इंटरनेट पर लंबे वक्त तक मौजूद रहने वाले ये ग़लत फ़ैसले और परेशान करने वाले सबूत असहज कर देते हैं और कभी-कभी तो फंसा भी देते हैं.

इनसे पीछा छुड़ाने का 'आसान और सीधा' तरीका होना चाहिए.

बारोनेट बीबन कीडरॉन का मानना है कि इंटरनेट पर बचपन के निशान स्थायी नहीं होने चाहिए.

उनका कहना है, "व्यक्तिगत प्रयोग बचपन का एक जरूरी हिस्सा होता है. इंटरनेट से यह ना कभी हटता है और ना ही इंटरनेट इसे कभी सही करता है."

बदलाव

'राइट टू रिमूव' समाज में होने वाले गहरे बदलावों को दर्शाता है.

ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर विक्टर मेयर स्कोनबर्गर का कहना है, "यह डिजिटल युग में होने वाला एक बड़ा बदलाव है."

प्रोफेसर विक्टर मेयर स्कोनबर्गर 'डिलीट: द वर्चू ऑफ़ फ़ॉरगेटिंग इन द डिजिटल एज' किताब के लेखक हैं.

इंटरनेट की स्थायी रूप से एक मेमोरी तैयार हो जाती है जिसे कभी भी देखा जा सकता है.

ट्विटर और फ़ेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट से हटाए गए पोस्ट को फिर से ऑनलाइन सर्च में आ सकते हैं.

ये पोस्ट असहज कर देने वाले तस्वीरों के अलावा आपराधिक दोष और क़ानूनी विवाद के शक्ल में हो सकते हैं.

यौन हिंसा, धौंस या दूसरी तरह के उत्पीड़नों के शिकार पीड़ितों के लिए ख़ासतौर पर यह स्थिति तनावपूर्ण होती है.

बहस

आई राइट्स के मुहिम के अंदर मिलने वाला 'डिलीट ऑप्शन' नाबालिगों को निजता के अधिकार के मामले में एक विशेषाधिकार है.

इस फ़ैसले ने इस बहस को जन्म दिया है कि अतीत को मिटाना कितना कामयाब हो सकता है.

कंप्यूटर एंड कम्युनिकेशन एसोसिएशन से जुड़े फ़ेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के सदस्यों का कहना है कि यह मामला यूरोप में 'निजी सेंसरशिप को बड़े स्तर' पर बढ़ावा देगा.

'डिलीट बटन' के साथ ही भूल जाने का अधिकार और अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता के बीच बहस छिड़ गई है.

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