एशियन गेम्स: किसी ने ज़मीन बेची, किसी ने क़र्ज़ लिया, मुश्किलों से लड़कर पदक जीतीं भारतीय खिलाड़ी

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- Author, नौरिस प्रीतम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
साल 2000 में सिडनी ओलंपिक खेलों में कर्णम मल्लेश्वरी ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. मल्लेश्वरी ने वेटलिफ़्टिंग में कांस्य पदक जीतकर यह गौरव हासिल किया था.
पदक तो दूर की बात, आंध्र प्रदेश की इस युवा के लिए ओलंपिक तक पहुंचना एवरेस्ट को फ़तह करने से कम नहीं था.
सामाजिक और आर्थिक परेशानियों तथा सुविधाओं की कमी से जूझते हुए उन्होंने अपना पैतृक शहर श्रीकाकुलम छोड़ा और अपनी बहन के साथ दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का रुख़ किया, ताकि वे ट्रेनिंग कर सकें.
उनके साथ उनकी मां भी आईं. सिर्फ़ इसलिए कि वे अपनी बेटियों को खाना बनाकर खिला सकें, क्योंकि होटल का ख़र्च उनकी हैसियत से बाहर था.
'नए भारत' में भी हालात ज़्यादा नहीं बदले
आज 26 साल बाद भी सोशल मीडिया की चमक-दमक, कॉरपोरेट जगत की चकाचौंध और 'नए भारत' के सरकारी नारों के बीच भारतीय खिलाड़ियों के हालात में, कम से कम शुरुआती दिनों में, कोई फ़र्क़ नहीं आया है.
आज भी किसी खिलाड़ी के घरवाले गाय-बैल बेच रहे हैं, कोई अपनी पुश्तैनी ज़मीन बेच रहा है, तो कोई पैसे उधार ले रहा है, ताकि उनके बच्चे खेलों में बने रहें.
महिला खिलाड़ियों के लिए खेलों की डगर और भी कठिन है, क्योंकि उन्हें मैदान में ख़ुद को साबित करने के साथ-साथ सामाजिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है.
बीबीसी ने ऐसी ही कुछ भारतीय महिला खिलाड़ियों पर नज़र डाली, जिन्होंने इन सभी परेशानियों के बावजूद जापान के शहर नागोया में देश का प्रतिनिधित्व किया और पदक भी जीते. आइए नज़र डालते हैं इन खिलाड़ियों की चुनौतियों पर -
मीराबाई चानू

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इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू का ही होना चाहिए.
यह ठीक है कि आज मीराबाई बहुत बड़ी स्टार खिलाड़ी हैं, लेकिन शुरुआती दौर में उनके लिए भी खेल में बने रहना बड़ी चुनौती थी.
नागोया में मीराबाई ने वह पदक भी हासिल किया, जिसकी कमी उन्हें बहुत अखरती थी. 28 साल बाद भारत को वेटलिफ़्टिंग में एशियाई खेलों का पदक दिलाना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है.
भले ही वे गोल्ड जीतने से चूक गईं, लेकिन रजत पदक भी बहुत अहम है.
मीराबाई मणिपुर से आती हैं, जिसे भारत का एक दूरदराज़ का इलाक़ा माना जाता है. नोंगपोक काकचिंग गांव में उनका घर राजधानी इंफ़ाल से क़रीब 20 किलोमीटर दूर है.
अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटी मीराबाई का परिवार साधारण था. उनके पिता साइखोम करीति एक सरकारी विभाग में मज़दूर थे. घर का ख़र्च चलाने में हाथ बंटाने के लिए उनकी मां तोम्बी देवी चाय की दुकान चलाती थीं.
बॉक्सर मैरी कॉम की तरह मीराबाई भी अपनी मां की मदद करने के लिए जंगल से लकड़ियां बटोरती थीं, ताकि उन्हें चूल्हे में जलाकर तेल के कुछ पैसे बचाए जा सकें.
शायद लकड़ियां बटोरना ही उनके खेल में आने का ज़रिया बना.
जब वे महज़ 12 साल की थीं, तब एक दिन अपने भाई के साथ लकड़ियां बटोरने गईं. जब लकड़ियों का गट्ठर उठाने की बारी आई, तो उनके भाई को उसे उठाने में परेशानी हो रही थी.
उसी गट्ठर को मीराबाई ने आसानी से उठा लिया और पहाड़ी रास्ते से क़रीब दो किलोमीटर चलकर घर पहुंचीं. यहीं से शायद उनके वेटलिफ़्टिंग करियर का आग़ाज़ हुआ.
बाद में पूर्व वेटलिफ़्टर अनीता चानू से ट्रेनिंग लेने के लिए वे बस से और कभी ट्रक में लिफ़्ट लेकर भी गईं.
आज मीराबाई स्टार ज़रूर हैं, लेकिन शुरुआती दौर उनके लिए बहुत कठिन था.
निकिता कुमारी

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कबड्डी में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में निकिता की बहुत बड़ी भूमिका रही.
17 साल की निकिता ने फ़ाइनल में जहां एक मज़बूत रक्षक की भूमिका निभाई, वहीं रेडर के तौर पर उन्होंने अपनी टीम के लिए पांच अंक भी हासिल किए.
लेकिन इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए निकिता और उनके परिवार को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.
हरियाणा के हिसार ज़िले के हसनगढ़ गांव की रहने वाली निकिता के पिता अनिल नयन एक साधारण किसान हैं और उनकी मां विनोद कुमारी घर संभालती हैं.
सात भाई-बहनों में चौथे नंबर की निकिता को अपने खेल के सपनों को साकार करने के लिए सहारे की ज़रूरत थी. आर्थिक तंगी के बावजूद उनके माता-पिता ने उन्हें यह सहारा दिया.
अपनी एक कज़िन को खेलते देखकर आठ साल की निकिता ने भी कबड्डी में रुचि दिखाई और जल्दी ही खेल में अपनी जगह बना ली.
छोटी उम्र में हरियाणा राज्य के लिए खेलते हुए निकिता ने 17 अंक हासिल किए. उन्होंने हरियाणा को नेशनल चैंपियन बनवाया और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.
मनप्रीत कौर

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अब बात मनप्रीत कौर की, जिन्होंने 36 साल की उम्र में शॉट पुट जैसे इवेंट में कांस्य पदक जीतकर सबको हैरान कर दिया.
दिलचस्प बात यह है कि उनके पति और 14 साल की बेटी जापान के स्टेडियम में यह चमत्कार देख रहे थे.
पंजाब के सहौली गांव के किसान परिवार से आने वाली मनप्रीत ने 12 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था.
बाद में उनकी मां को लकवा हो गया. आज 20 साल बाद भी उन्हें तकलीफ़ है.
साल 2006 में मनप्रीत ने अपना पहला जूनियर नेशनल ख़िताब जीता था. इतनी परेशानियों के बीच भी वे आज खेल में बनी हुई हैं. उनके जज़्बे को सलाम.
रोशिबिना देवी

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मीराबाई चानू की तरह नाओरेम रोशिबिना देवी भी मणिपुर से आती हैं. उनका घर बिष्णुपुर ज़िले में है.
रोशिबिना भी किसी अमीर परिवार से संबंध नहीं रखतीं. उनके पिता दामू सिंह एक साधारण किसान हैं.
अपनी बेटी की प्रतिभा को समझते हुए उन्होंने, कहना चाहिए कि, एक बहुत साहसिक क़दम उठाया. वुशु में महारत रखने वाली अपनी बेटी की ट्रेनिंग और आने-जाने का ख़र्च पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी ज़मीन तक बेच डाली.
बदले में रोशिबिना ने उन्हें जापान में अपना तीसरा पदक दिया. इससे पहले उन्होंने 2018 में जकार्ता में कांस्य और 2022 में हांगझोउ में रजत पदक जीता था.
जिस वक़्त हांगझोउ में खेल होने वाले थे, उस समय मणिपुर के राजनीतिक हालात ठीक नहीं थे. इंटरनेट बंद था और रोशिबिना के मुताबिक़, दंगों की वजह से उनके पिता अपने खेत में भी नहीं जा सकते थे.
घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी, लेकिन उनके माता-पिता ने उनका हौसला नहीं टूटने दिया.
पटियाला के कैंप में जाने के लिए 40 हज़ार रुपये ख़र्च करके वे वहां पहुंची थीं.
सीमा कुमारी

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10 हज़ार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली सीमा कुमारी की कहानी किसी बॉलीवुड फ़िल्म से कम नहीं है.
हिमाचल प्रदेश के चंबा में अगर आठ-दस साल की कोई लड़की अपने पिता को खो दे, तो मानो उसका संसार उजड़ जाता है. लेकिन सीमा किसी अलग मिट्टी की बनी थीं.
उनकी मां के मुताबिक़, सीमा कुछ हद तक ज़िद्दी और हिम्मत वाली थीं. उन्हें बचपन से ही खेलों का शौक़ था.
सात भाई-बहनों वाले परिवार में पिता के बिना घर चलाना कठिन हो जाता है. ऊपर से अगर कोई बच्चा खेल जारी रखने की बात करे, तो यह थोड़ा अटपटा लगता है.
लेकिन सीमा कुमारी ने इन सभी बातों को परे रखकर खेल जारी रखा.
चंबा के रेता गांव की सीमा महज़ 11 साल की उम्र में घर से दूर धर्मशाला में स्पोर्ट्स अथॉरिटी के हॉस्टल में रहकर एथलेटिक्स की ट्रेनिंग करने लगी थीं.
जापान में सीमा, प्रीजा श्रीधरन और कविता राउत के बाद एशियाई खेलों की 10 हज़ार मीटर दौड़ में पदक जीतने वाली तीसरी भारतीय महिला बनीं.
जापान में दौड़ के दौरान उनके स्पाइक्स के तलवे में भी कुछ दिक़्क़त आ गई थी, लेकिन ज़िंदादिल सीमा ने हिम्मत नहीं हारी.
दिलचस्प बात यह है कि सीमा ने अपनी बुज़ुर्ग मां को बताया ही नहीं था कि वे एशियाई खेलों के लिए जापान जा रही हैं.
सीमा को लगा था कि दिल की मरीज़ उनकी मां परेशान हो जाएंगी और उनकी बीमारी बढ़ सकती है. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी मां ने टीवी पर अपनी बेटी की दौड़ देखी थी.
बाद में पत्रकारों से बात करते हुए उनकी भावुक मां ने कहा कि अगर सीमा के पिता होते, तो वे बहुत ख़ुश होते.
इन साहसी महिलाओं की कहानियां काफ़ी छप चुकी हैं और जैसे ही खेल ख़त्म होंगे, इनके बारे में और भी लिखा जाएगा.
जश्न और शोर-शराबे के बीच समाज के कुछ जाने-माने लोग और नेता खिलाड़ियों के साथ तस्वीरें भी खिंचवाएंगे.
लेकिन बाद में यही कहानी फिर किसी बड़े खेल मेले के समय दोहराई जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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