मोदी कैबिनेट न मैक्सिमम है, न मिनिमम

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने से पहले देश से 'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' यानी छोटा मंत्रिमंडल लेकिन प्रभावशाली शासन लाने के वादा किया था.

मंगलवार के मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद ऐसा लगता है कि वो अपने वादे पर खरे नहीं उतरे हैं.

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ज़रा इस पर ग़ौर करें. कृषि और परिवार कल्याण और सामाजिक न्याय मंत्रालयों में विस्तार से पहले दो-दो राज्य मंत्री हुआ करे थे. अब दोनों मंत्रालयों में तीन-तीन राज्य मंत्री नियुक्त किए गए हैं. मोदी के नए कैबिनेट में, दलित नेता रामदास आठवले, कृष्ण पाल और विजय सांपला तीन राज्य मंत्री होंगे जो कैबिनेट मंत्री थावरचंद गहलोत के साथ-साथ सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय चलाएंगे.

विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि नरेंद्र मोदी को बड़ा बहुमत मिला है, उन्हें इतना बड़ा मंत्रिमंडल बनाने की ज़रूरत नहीं थी.

वो कहते हैं, "एक पार्टी की सरकार जब होती है, तो वो बड़े मंत्रियों की संख्या पर अंकुश लगा सकती है. लेकिन जब गठबंधन सरकारें होती हैं, तो उन पर दबाव ज़्यादा होता है. अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और पीवी नरसिम्हा राव की सरकारें गठबंधन सरकारें थी. जो दल समर्थन करते हैं, उनकी मांगें भी माननी पड़ती थी. लेकिन मोदी अच्छा ख़ासा बहुमत लेकर आए हैं. उम्मीद थी कि मोदी सरकार छोटी होगी और बेहतर प्रदर्शन करेगी, लेकिन ये अभी तक देखने को नहीं मिला है."

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इसी तरह वित्त, रेलवे, विदेश मंत्रालय और सड़क परिवहन, राजमार्ग और शिपिंग जैसे मंत्रालयों में पहले एक राज्य मंत्री होते थे अब दो हैं.

पुरषोत्तम रूपाला, एसएस अहलूवालिया और सुदर्शन भगत कैबिनेट मंत्री राधा मोहन सिंह के साथ कृषि और परिवार कल्याण मंत्रालय चलाएंगे.

यहाँ तक कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की तरह अपेक्षाकृत छोटे मंत्रालयों में (जैसे जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय) भी अब एक के बजाए दो राज्य मंत्री नियुक्त किए गए हैं.

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तो क्या मोदी सरकार मनमोहन सिंह सरकार के कदम पर चल रही है? रशीद किदवई कहते हैं, "जब तक प्रशासनिक सुधार नहीं होते, तब तक राज्य मंत्रियों की संख्या और इस तरह की बहस जारी ही रहेगी. मैंने कई बार देखा है कि मंत्रालय के गठन की घोषणा के बाद भी तारीख बदल जाती थी. क्योंकि गठबंधन के नेता नाराज हो जाते थे. कई बार मंत्रिपद को लेकर तो कई बार संख्या को लेकर. मनमोहन सिंह की सरकार में तो रेल बजट पेश करने के बाद भी दिनेश त्रिवेदी को पद छोड़ना पड़ा था."

जहां ये ताज़ा विस्तार प्रधानमंत्री के वादे को पूरा होते नहीं दिखाता है वहीं ये उनकी मजबूरी भी दिखाती है. ये विस्तार उनकी कृषि और पिछड़ी जातियों के कल्याण जैसे मुद्दों पर उनकी प्राथमिकता दर्शाता है. ऐसा लगता है कि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव को देखते हुए ये नए चेहरे लाए गए हैं.

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विस्तार के बाद प्रधानमंत्री समेत मंत्रियों की संख्या 78 तक पहुंच गई है जिन में कैबिनेट रैंक के 27 मंत्री और 50 राज्य मंत्री शामिल हैं. इसकी अब यूपीए सरकार के मंत्रिमंडल से तुलना की जा सकती है.

अगर 2014 वाली एनडीए सरकार पर एक नज़र डालें तो पता चलेगा कि उस समय मंत्रियों की संख्या केवल 45 थी. बाद में नवंबर में मंत्रिमंडल के पहले विस्तार के बाद मंत्रिमंडल की संख्या बढ़ कर 65 हो गई थी

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