मोदी के 'एक्ट ईस्ट नीति' की सफलता

ट्रांस एशियन रेलवे
    • Author, सुबीर भौमिक
    • पदनाम, इम्फाल से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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भारत के नीतिकार दिल्ली-हनोई रेल लिंक की बात कुछ इस तरह करते हैं जैसे इसके हक़ीक़त बनने में बस अब कुछ वक़्त ही बाक़ी है.

लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. अभी तो भारत-म्यांमार रेल सिस्टम को जोड़ने का प्लान तक नहीं बना है.

एशिया में ट्रांस एशियन संचालन में 30 साल का अनुभव रखने वाले अतिन सेन कहते हैं कि भारत-म्यांमार रेल सिस्टम को जोड़ा और समकालिक ही नहीं किया गया है, तो दिल्ली से हनोई के बीच ट्रांस एशियन रेलवे का सपना कैसे पूरा होगा?.

भारत पहले ही असम-मणिपुर रेल लिंक को शुरू करने में तय समय से तीन साल पीछे चल रहा है. इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य मणिपुर की राजधानी इंफल को देश के रेलवे मैप पर लाना था.

ट्रांस एशियन रेलवे

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के महाप्रबंधक (निर्माण) एसके जग्गी कहते हैं, "कई वजहों से यह प्रोजेक्ट लेट हो रहा था, लेकिन अब इसने रफ़्तार पकड़ ली है. भारत सरकार ने प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया है."

जग्गी के मुताबिक़ दुर्गम इलाक़े, निर्माण सामग्री ले जाने के लिए ख़राब सड़कें और जबरन वसूली में शामिल कई भूमिगत चरमपंथी समूहों की वजह से जिरिबम-तुपुल इंफल रेल मार्ग में देरी हुई है.

जग्गी कहते हैं, "निर्माण में शामिल कुछ कर्मचारियों और मैनेजरों को विद्रोहियों ने बंधक भी बना लिया था. इसकी वजह से काम को रोकना भी पड़ा."

ट्रांस एशियन रेलवे

उनका कहना है कि अब मणिपुर की सरकार इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है.

लेकिन जबरन वसूली की समस्या अभी भी जारी है. कई कंपनियाँ जिनके प्रबंधकों से संपर्क साधा गया, कहते हैं कि उन्हें मणिपुर में मौजूद कई सक्रिय भूमिगत गुटों को पैसे देने पड़ते हैं.

प्रोजेक्ट में शामिल एक शीर्ष भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहते हैं, "समस्या यह है कि कई गुट मौजूद हैं. लगता है कि उनकी रंगदारी की मांग प्रतिस्पर्धा के तहत है. अगर एक गुट 50 लाख़ मांगता है तो दूसरा 70 लाख़ मांगेगा."

ट्रांस एशियन रेलवे

वो कहते हैं, "हमारे कर्मचारी और मैनेजर हमेशा डर के साए में काम करते हैं."

इंफल को देश के रेलवे मैप पर लाने के प्रोजेक्ट के तीन साल देरी से चलने के साथ ही भारत सरकार अब तक मणिपुर-म्यांमार सीमा पर मौज़ूद पहाड़ी क्षेत्र मोरेह तक 110 किलोमीटर रेल ट्रैक को ले जाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा पाई है.

लॉजिस्टिक एक्सपर्ट अतिन सेन कहते हैं, "जब तक मोरेह को रेल से जोड़ा नहीं जाएगा, म्यांमार का रेलवे सिस्टम से जुड़ने की बात संभव ही नहीं है. उसके बगैर हम दिल्ली- हनोई रेल लिंक के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं."

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के जग्गी का कहना है कि फिलहाल रेलवे को इंफल के आगे ले जाने का कोई प्लान नहीं है. मणिपुर-म्यांमार सीमा पर मोरेह तक तो कतई नहीं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "इंफल-मोरेह रूट का सर्वे किया गया है. अब तक केवल इतना ही हुआ है, लेकिन फिलहाल रेलवे नेटवर्क को इंफल से आगे ले जाने का कोई प्लान नहीं है."

ट्रांस एशियन रेलवे

मणिपुर के व्यापार अर्थशास्त्री अमर युमनम कहते हैं कि अब जिरिबम-तुपुल-इंफल रूट पर काम आगे बढ़ा है और भारत सरकार को मोरेह तक रेलवे के विस्तार की योजना बनानी चाहिए थी.

युमनम ने बीबीसी को बताया, "अगर आप मोरेह तक विस्तार की योजना अभी नहीं बनाते और पहले इंफल तक प्रोजेक्ट को पूरा होने देते हैं, हम कई साल बर्बाद कर देंगे. क्या हम चीन की तरह प्लान नहीं कर सकते, ब्लॉक दर ब्लॉक. सभी को पूरे प्रोजेक्ट के हिस्से की तरह और एक बड़ी तस्वीर को बिना भूले."

उनके मुताबिक़ भारत की 'लुक ईस्ट' नीति या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन्नयन नीति 'एक्ट ईस्ट' को सफल बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है दिल्ली-हनोई रेल लिंक और ट्रांस एशियन हाईवे, जो मोरेह को थाईलैंड के मे-सॉट से जोड़ेगा.

ट्रांस एशिया रेल लिंक

भारत पहले ही अगरतला-अखौरा पट्टी पर बांग्लादेश के साथ अपने रेलवे सिस्टम को लिंक कर रहा है, जिससे भारत के किसी भी इलाक़े से ट्रेनें पूर्वोत्तर के त्रिपुरा तक पहुँच सकती हैं.

युमनम कहते हैं, "अब अगर ऐसा ही लिंक म्यांमार रेलवे के साथ मोरेह-तामू खंड पर किया जाता है, तो ट्रांस एशियन रेलवे एक हक़ीक़त बन जाएगा."

मणिपुर के पास अभी केवल जिरिबम में रेल हेड है, जो असम में 1.5 किलोमीटर लुमडिंग-सिलचर मीटर गेज खंड का ही विस्तार है.

परियोजना के पहले चरण में जिरिबम-तुपुल के 84 किलोमीटर इलाक़े को शामिल किया गया है.

जग्गी के मुताबिक़ जिरिबम-तुपुल खंड में 112 छोटे ब्रिज, छह बड़े ब्रिज, सड़क के ऊपर तीन ओवर ब्रिज और सड़क पर दो अंडर ब्रिज बनेंगे.

सुरंगें

पहले चरण में कुल 34 सुरंगें होंगी जो 39 हज़ार चार सौ एक मीटर लंबे क्षेत्रफल में फैली होंगी.

जिरिबम-तुपुल खंड में सबसे लंबा सुरंग 4.9 किलोमीटर का होगा, जबकि तुपुल-इंफल खंड में 10.75 किलोमीटर का सबसे लंबा सुरंग बनेगा.

जिरिबम को धोलाखाल से जोड़ने वाले 12.5 किलोमीटर लंबे ट्रैक और 1.20 किलोमीटर लूप लाइन को पूरा कर लिया गया है. लेकिन जिरिबम-तुपुल परियोजना का बाक़ी हिस्सा, जिसे मर्च 2016 तक पूरा होना था, समय से काफ़ी पीछे चल रहा है.

ट्रांस एशियन रेलवे

रेलवे ने बताया था कि 27 किलोमीटर तुपुल-इंफल खंड पर, अंतिम स्थान सर्वेक्षण के साथ मार्च 2019 तक काम पूरा किया जाना था.

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