बुलेट ट्रेन योजना सफ़ेद हाथी साबित होगी?

भारतीय रेल
    • Author, राजेंद्र बी अकलेकर
    • पदनाम, पत्रकार और लेखक
  • प्रकाशित

भारतीय रेलवे रोज़ 19,000 ट्रेनें चलाती है. इनमें से 12,000 ट्रेनें 2.3 करोड़ यात्रियों को यात्रा कराती हैं जो देश भर में करीब 8,000 स्टेशनों से चढ़ते-उतरते हैं.

इनमें सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन मुंबई-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस और भोपाल-दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस हैं, जिनकी औसत रफ़्तार 90-100 किमी/घंटा है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या हमें हाई-स्पीड ट्रेन परियोजना की ज़रूरत है भी?

भारतीय रेलवे की वर्तमान हालत में बहुत सुधार की गुंजाइश है. इसकी सेवा ख़राब है, ट्रेनें लेट होती हैं और भी कई दिक्कते हैं. तो क्यों न मौजूदा ढांचे को ही सुधारा जाए और ट्रेनों को तेज़ चलाया जाए?

भारतीय रेल पटरी

रेलवे अधिकारी कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में भारी यातायात, भीड़ और पटरियों के ढांचे के रहते राजधानी या शताब्दी से तेज़ ट्रेन चलाना संभव नहीं है.

दिल्ली और आगरा के बीच 160 किमी/घंटा की रफ़्तार से ट्रेन चलाने का गतिमान एक्सप्रेस नाम का प्रयोग किया जा चुका है लेकिन रेलवे सुरक्षा आयुक्त से सुरक्षा अनुमति मिलने के लिए प्रतीक्षारत है. लेकिन मौजूदा पटरियों पर इससे तेज़ ट्रेन नहीं चल सकतीं.

सचमुच तेज़, 200 किमी/घंटा से ऊपर, रफ़्तार से चलने वाली ट्रेनें चलाने के लिए हमें ट्रेनों के अबाध चलने के लिए चारदीवारी से घिरीं, उपयुक्त पटरियां बनानी होंगी. मुंबई और अहमदाबाद के बीच इस रेलवे परियोजना में यही दिखाने की कोशिश है.

भारतीय रेल की पटरी

भारत की योजना सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (एचएसआर) बनाने की है, जिसकी शुरुआत यह होगी.

इसके अलावा भारतीय रेलवे को कई तरह की सेवाओं की एक थाली तैयार करनी होगी जिसमें सभी स्टेशनों पर रुकने वाले ग़रीब यात्री ट्रेनों से लेकर हवाई जहाज़ से मुक़ाबला करने वाली और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली तेज ट्रेनें शामिल हों.

इन तेज़ कॉरिडोर के लिए, हमें एचएसआर बनाने शुरू करने होंगे और निर्माण में लगने वाले समय और इसके ठीक से जमने में लगने वाले समय को देखते हुए इसकी शुरुआत का समय यही है.

हालांकि रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन विवेक सहाय थोड़े संशकित नज़र आते हैं. उनका कहना है कि भारत को बुलेट ट्रेन परियोजना पर सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.

बुलेट ट्रेन ग्राफ़िक्स

वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह सफ़ेद हाथी साबित होगी क्योंकि अगर आप व्यावहारिक ढंग से सोचें तो इसे रोज़ अच्छी-ख़ासी संख्या में यात्री चाहिए होंगे ताकि ऋण चुकाया जा सके. मुझे आशंका है कि भारत एक महत्वाकांक्षी परियोजना के चक्कर में बड़े ऋण के जाल में फंस जाएगा."

सहाय कहते हैं, "एक कार में चार आदमी आराम से मुंबई और अहमदाबाद के बीच 500 किलोमीटर की यात्रा कर सकते हैं वह भी इसके आधे दाम में और इसी तरह हवाई जहाज़ में भी. हम लोग 300 किमी/घंटा की रफ़्तार की बात कर रहे हैं, लेकिन अगर आप मोड़, ठहराव, ढाल पर वास्तव में ट्रेन चलाएंगे तो औसत रफ़्तार 200-220 किमी/घंटा से अधिक नहीं होगी."

"आज राजधानी 130 की अधिकतम रफ़्तार से चलती है. मेरा सुझाव है कि हम इसमें चरणबद्ध तरीके से सुधार करें- पहले पटरियों को 200-250 की रफ़्तार के लिए तैयार करें और फिर 300-350 की गाड़ियों पर कूदें. मुझे यकीन है कि हम यह कर सकते हैं."

भारतीय रेल

एक तर्क यह भी है कि मुंबई-अहमदाबाद के कॉरिडोर के बीच पहले ही यात्रियों की आसान आवाजाही के लिए हाईवे और हवाई यात्रा जैसे विकल्प हैं. ये दो शहर भारतीय अर्थव्यवस्था के शक्तिकेंद्र हैं.

सवाल यह भी है कि हाईस्पीड ट्रेन यात्रियों को 2800 रुपये में 2 घंटे में पहुंचा रही है तो क्या. यह काम हवाई जहाज़ पहले ही 70 मिनट में 2000 रुपए से कम में कर रहा है.

इस सवाल पर हाई स्पीड रेलवे कॉरपोरेशन के अधिकारी कहते हैं कि रेलवे यात्रियों को हवाई अड्डे के मुकाबले आसान पहुंच और तेज़ संपर्क सुविधा देगा.

"हवाई अड्डे की अपनी प्रक्रियाएं होती हैं जो कई बार बहुत थकाऊ और समय खाने वाली होती हैं. इसके अलावा एयरलाइन उद्योग में परिवर्तन होते रहते हैं और यह हमेशा मांग पूरी करने की स्थिति में नहीं रहता."

बुलेट ट्रेन ग्राफ़िक्स

"हमें नहीं पता कि जब 2025 में एचएसआर काम करना शुरू करेगी तब क्या स्थिति होगी. इसके अलावा एचएसआर न सिर्फ़ एक स्तरीय बल्कि एक ज़ोरदार विकल्प उपलब्ध करवाएगा."

इसके अलावा वह एक और बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाते हैं, "ज़रा आप देखिए कि दिल्ली में क्या हो रहा है. प्रदूषण शहर को मार रहा है और हमें वैकल्पिक नंबर प्लेट के साथ सीमित संख्या में गाड़ियां चलानी पड़ रही हैं. जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर ख़तरा आज हमारे सर पर मंडरा रहे हैं. हवाई यात्रा में जितने ईंधन की ख़पत होती है और जो प्रदूषण होता है वह भी एक चुनौती है."

"एचएसआर पर्यावरण के प्रति दोस्ताना, बिजली चालित ट्रेनें उपलब्ध करवाएगा जो पर्यावरण को कम से कम नुक़सान पहुंचाएंगी. वस्तुतः एचएसआर कार्बन क्रेडिट्स के लिए भी आवेदन करेगा क्योंकि यह हवाई यात्रा में ख़र्च होने वाले ईंधन के आधे की ही खपत करेगा. इसलिए यही भविष्य होगा."

भारतीय रेल

वह बताते हैं कि इस छोटे कॉरिडोर को इसलिए चुना गया है ताकि इसे सफल बनाया जाए और यह पूरे देश में अन्य नियोजित कॉरिडोर के लिए यह एक उदाहरण बन सके.

रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य इंजीनियर सुबोध जैन इस परियोजना को लेकर बहुत उत्साहित हैं. वे कहते हैं कि भारत को अब इस मौके को चूकना नहीं चाहिए.

"अगर भारत को तरक्की करनी है तो उसे कहीं न कहीं शुरुआत तो करनी पड़ेगी. अधिकतर विकसित देशों ने इसकी कोशिश की है और हमें इस महत्वाकांक्षी परियोजना को तुरंत शुरू करना चाहिए. अगर हम अभी शुरुआत नहीं करते तो 2025 आने तक हम बहुत पीछे छूट जाएंगे."

इसके भारी ऋण और भुगतान के बारे में पूछे जाने पर जैन कहते हैं कि यह ग़लत धारणा है कि यह सफ़ेद हाथी बन जाएगा.

चीनी बुलेट ट्रेन

वह कहते हैं, "अन्य देशों को देखो. हाई-स्पीड ट्रेनों और हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे ने उन देशों की तरक्की को रफ़्तार ही दी है. एक बार यह परियोजना ठीक से जम जाए तो यह हाई-स्पीड ट्रैक हमारे देश के लिए आवश्यक संपत्ति खुद जुटाएंगे."

वह कहते हैं, "मेरी अपनी हिचक लागत को लेकर है. चीनी एचएसआर परियोजना जापान के मुकाबले सस्ती पड़ी होती लेकिन फिर भी हमें हमेशा विकल्पों को परखने की ज़रूरत होती है. लेकिन सबसे अच्छा तो यह होता कि चीन और जापान जैसे दूसरे देशों के पास जाने के बजाय हम अपना खुद का मॉडल विकसित करते जिसकी नकल कल दुनिया करती. हममें यह क्षमता है."

स्काई बस और भिड़ंत-विरोधी उपकरण ईजाद करने वाले कोंकण रेलवे के पूर्व प्रबंध निदेशक बी राजाराम ने साल 2003 में कोंकण रेलवे के लिए एक हाई-स्पीड ट्रेन का परीक्षण किया था. उनका मानना है कि अगर गंभीरतापूर्वक प्रयास करें तो हम इसे भारत में ही बना सकते हैं.

बुलेट ट्रेन

वह कहते हैं, "मैंने मौजूदा ढांचे की समझ और स्वदेशी जानकारी की मदद से कम लागत पर तेज़ रफ़्तार लाकर दिखाई थी. उस प्रयोग में हमारी ट्रेन मडगांव (गोवा) और रोहा (मुंबई के नज़दीक) के बीच 400 किलोमीटर की दूरी में लगातार 150 किमी/घंटा की औसत रफ़्तार से दौड़ी थी."

वह कहते हैं कि सरकार को ऐसी हाई-प्रोफ़ाइल परियोजना को 'बनाओ, चलाओ और स्वामित्व रखो' के आधार पर विकसित करना चाहिए.

"सबसे अच्छा तरीका कई देशों को छांटा जाए, उनसे आशय-पत्र मांगे जाएं और भारत ऐसी किसी भी एचएसआर कंपनी को इसके लिए अधिकृत कर दे, जिसे भारत में पंजीकृत निजी पक्ष के साथ साझीदारी में बनाया गया हो."

बुलेट ट्रेन ग्राफ़िक्स

"कंपनी सरकार के हस्तक्षेप के बिना ज़मीन का अधिग्रहण करे या उसे लीज़ पर ले. रेलवे लाइन बनाए और उसे रेलवे सुरक्षा आयुक्त के सामने प्रस्तुत करे. अगर इस तरह से चला जाए तो यह परियोजना चार साल में पूरी हो सकती है वह भी बिना सरकारी भागीदारी के."

(लेखक पत्रकार और भारत की पहली रेलवे लाइन के इतिहास पर सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताब 'हॉल्ट स्टेशन इंडिया' के लेखक हैं.)

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