मोदी के सेनापति का सबसे बड़ा इम्तिहान

नरेंद्र मोदी और अमित शाह
    • Author, नवीन जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

अमित शाह भाजपा अध्यक्ष चुन लिए गए हैं. इस बार वह पूरे तीन साल के लिए पार्टी अध्यक्ष हैं.

उन्होंने 9 जुलाई, 2014 को जब पहली बार भाजपा अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाली थी, वह राजनाथ सिंह की खड़ाऊं पहनने जैसा था. राजनाथ सिंह ने मोदी सरकार में शामिल होने के बाद अध्यक्ष पद छोड़ दिया था.

लोकसभा चुनाव में यूपी के प्रभारी रहे अमित शाह को 80 में से 73 सीटें जिताने के लिए बड़ा इनाम दिया गया था.

इस बार कुछ किंतु-परंतु भी अमित शाह के अध्यक्ष बनने के आड़े आ गए थे. उन्हें दूर करने के लिए ख़ुद प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख को हस्तक्षेप करना पड़ा था.

अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार

जुलाई 2014 से जनवरी 2016 आते-आते नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चमक फीकी पड़ गई है.

अजेय समझी जाने वाली इस जोड़ी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के हाथों बड़ी हार के बाद बिहार में शर्मनाक शिकस्त का सामना करना पड़ा.

बिहार चुनाव में भाजपा के सेनापति और रणनीतिकार नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही थे.

हाशिए पर धकेल दिए गए लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने बिहार की हार पर मोदी और शाह के ख़िलाफ़ बग़ावती तेवर अपनाए. शाह की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे.

इसी दौरान देश में बढ़ती असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरे और बहुलतावादी परंपरा नष्ट करने की साज़िशों के आरोपों से मोदी सरकार की प्रतिष्ठा और भाजपा की स्वीकार्यता पर चोट लगी.

मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण अडवाणी

इसलिए भाजपा और संघ के भीतर यह सवाल भी उठा कि क्या किसी और नेता को पार्टी की बागडोर दी जाए?

इसके बावजूद अमित शाह का पलड़ा कई कारणों से भारी रहा.

शाह को संघ के बड़े नेताओं का पूरा समर्थन हासिल है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में शाह ने संघ के कार्यकर्ताओं का बख़ूबी इस्तेमाल किया था. पार्टी और संघ के ज़मीनी कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संपर्क है.

आरएसएस के नेता

शाह बहुत ऊर्जावान और मेहनती नेता माने जाते हैं. जिन राज्यों में भाजपा कमज़ोर है, वहां पार्टी का जनाधार बनाने के लिए उन्होंने रणनीति बना रखी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वे पुराने सहयोगी और विश्वासपात्र हैं. दोनों में अच्छी समझदारी है और मोदी फ़िलहाल और किसी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में नहीं देखना चाहते.

शाह के पक्ष में एक तुरुप चाल यह भी रही कि अगर अमित शाह के बजाय किसी और नाम पर विचार भी किया जाता तो इसका अर्थ आडवाणी और जोशी की बग़ावत को महत्व देना होता. इस तरह शाह के नाम पर अंतिम मुहर लग गई.

अमित शाह के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं.

भाजपा समर्थक

इसी साल अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में पैर रखने का मौक़ा मिला था, उसे इस बार वहां पैर पसारना है.

असम में बोडो पीपल्स फ्रंट से गठबंधन के बाद बढ़ी उम्मीदों को परवान चढ़ाना है.

अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं.

अमित शाह को सबसे बड़ी चुनौती का सामना उत्तर प्रदेश में करना होगा, जहां मज़बूत वोट आधार वाली सपा और बसपा मुक़ाबिल हैं. लोकसभा चुनाव में मिली कामयाबी का कीर्तिमान विधानसभा चुनाव में मदद नहीं करने वाला.

इसलिए उत्तर प्रदेश में शाह और संघ कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं.

आंबेडकर की प्रतिमा पर फूल चढ़ाते मोदी

बसपा के दलित आधार में सेंध लगाने के लिए आंबेडकर के महिमामंडन का अभियान पहले से चल रहा है. 22 जनवरी को ख़ुद प्रधानमंत्री ने लखनऊ में डा भीमराव आंबेडकर महासभा के दफ़्तर जाकर बाबा साहेब के अस्थिकलश पर फूल चढ़ाए.

कुछ दलित नेताओं को भाजपा में लाने की रणनीति के तहत बसपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य जुगल किशोर को ऐन मायावती के जन्मदिन पर पार्टी में शामिल किया गया.

चंद रोज़ पहले संघ के अवध प्रांत की समन्वय बैठक में सह-सरकार्यवाह ने स्वयंसेवकों से अपील की कि वे दलितों के लिए ‘सेवा कार्य’ करें.

कल्याण सिंह मुख्यमंत्री पद के उमीदवार नहीं ही होंगे, लेकिन इसका शिगूफ़ा छोड़कर लोधों को ख़ुश करने की कोशिश हुई है.

राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम ज़ोरों पर

अयोध्या में राममंदिर बनाने की हवा पहले ही बनाई जा चुकी है.

पत्थरों की नई खेप मंगवाने और तराशने का काम तेज़ करवाने से साफ़ है कि यूपी के समर के लिए नरेंद्र मोदी सरकार के विकास के वादे के ही भरोसे अमित शाह नहीं होंगे.

बिहार में विकास का यह नारा नाकाम हो गया. बीच चुनाव में भाजपा को जातीय और सांप्रदायिक पत्ते खोलने पड़े थे.

नीतीश की तरह उत्तर प्रदेश में अखिलेश विकास-पुरुष के रूप में नहीं जाने जाते.

अखिेलेश, मोदी, मुलायम

लेकिन लखनऊ मेट्रो, समाजवादी पेंशन स्कीम, आईटी सिटी और लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में तेज़ी लाकर इधर वह विकास के मुद्दे को चर्चा में लाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं.

इसलिए शाह की रणनीति है कि मोदी सरकार की 'नामामि गंगे', 'स्वच्छ भारत अभियान' और 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाओं के प्रचार के साथ-साथ जातीय और धार्मिक मुद्दों को उभारा जाए.

इसके लिए अमित शाह संघ की टीम का पूरा उपयोग कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में उनके विश्वस्त सहयोगी पार्टी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल हैं, जो संघ के ही भेजे हुए हैं.

यूपी भाजपा में शाह का कोई विरोध बाहर से नहीं दिखता है, लेकिन नाराज़गी तो है ही.

अमित शाह

मनमाने तरीक़े से काम करने की शैली के अलावा उनकी आलोचना इसके लिए भी होती है कि पार्टी के लोग उनसे आसानी से नहीं मिल पाते.

अमित शाह पार्टी पदाधिकारियों से अलग अपने विश्वस्त लोगों की टीम से काम कराने के लिए भी जाने जाते हैं.

बहरहाल, भाजपा ने उत्तर प्रदेश फ़तह कर लिया तो अमित एक बार फिर ‘शाह’ होंगे.

ऐसा नहीं हुआ, तो पार्टी में शांत पड़े विरोधी ज़ोर-शोर से सिर उठाएंगे और शाह का तख़्त डोलेगा.

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