ज़रा हटकर हैं ये विरोध प्रदर्शन

हार्दिक पटेल
    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

हार्दिक पटेल देश में विरोध प्रदर्शनों के नए पोस्टर ब्वॉय बन गए हैं. उन्होंने पटेलों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर गुजरात में 10 दिन के मार्च की घोषणा की है.

अपने हज़ारों समर्थकों के साथ वो तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने विशाल प्रदर्शन की अगुवाई कर अहमदाबाद का जनजीवन लगभग ठप कर दिया था.

अब वो महात्मा गांधी की दांडी यात्रा की तर्ज़ पर मार्च निकालने जा रहे हैं, हालांकि उनका मार्च उल्टी दिशा में होगा यानी समुद्र तट दांडी से शुरू होकर अहमदाबाद में गांधी आश्रम पर समाप्त होगा.

नोबल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपॉल का चर्चित वाक्य है, “भारत लाखों बगावतों की भूमि है.”

सो, हार्दिक पटेल अकेले आंदोलनकारी नहीं हैं जिनकी ओर सबका ध्यान गया है.

आइए भारत के कुछ अनोखे प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों पर नज़र डालें-

सारे प्रदर्शनों का ‘पितामह’

महात्मा गांधी

राष्ट्रपति महात्मा गांधी भारत के सबसे चर्चित प्रदर्शनकारी रहे हैं.

हालांकि उनके तरीक़े काफ़ी अनोखे हुआ करते थे. वो असहयोग, अहिंसा और भूख हड़ताल में विश्वास करते थे.

उन्होंने शांतिपूर्वक विरोध करने की सीख दी और भारतीयों को ब्रिटिश सामानों और सेवाओं का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया.

जब ब्रिटिश सरकार ने नमक क़ानून लागू किया तो गांधी ने बहुचर्चित दांडी यात्रा की और खुशी खुशी जेल गए.

ऊंची नैतिकता का पलन करते हुए विरोधी को शर्मिंदा करने का विरोध का उनका तरीका पूरी दुनिया में सराहा गया और दुनिया भर के नेताओं द्वारा याद किया जाता रहा.

मौत के दशकों बाद भी उनका फलसफ़ा प्रासंगिक बना हुआ है. नस्लवाद का विरोध करने के लिए दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला ने इसे अपनाया और अभी हाल ही में भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने भी इसी को अपनाया था.

चिपको आंदोलन

चिपको आंदोलन

1970 के दशक में भारत के कई हिस्सों में पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन हुआ था. इसकी शुरुआत उत्तर भारत के पहाड़ी इलाक़ों में शुरू हुई, जहां लोग अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर थे.

ठेकेदारों से पेड़ों को बचाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण, औरतें, बच्चे पेड़ों के चारों ओर घेरा बना लेते थे.

गांधीवादी कार्यकर्ता चांडी प्रसाद और सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चले इस आंदोलन को 1980 में तब सफलता मिली जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमालयी क्षेत्रों में अगले 15 सालों तक पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी.

चिपको आंदोलन 18वीं शताब्दी की शुरुआत में राजस्थान में बिश्नोई समुदाय के विरोध से प्रेरित था, जिसने जंगलों को बचाने के लिए आंदोलन चलाया था.

जंगलों को बचाने का यह अनोखा आंदोलन बाद के दिनों में दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अपनाया गया. पिछले साल नेपाल में 2001 स्कूली छात्रों ने विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए पेड़ों को गले लगाया.

‘पिंक अंडरवियर’

पिंक चड्ढी अभियान

हिंदू कट्टरपंथियों की नैतिक पहरेदारी (मॉरल पुलिसिंग) से परेशान कुछ जागरूक महिलाओं ने साल 2009 में पिंक चड्ढी कैंपेन चलाया था.

हिंदू संगठन के लोग वैलेंटाइन्स डे के मौके पर एक साथ मिलने वाले लड़के लड़कियों पर हमला बोलते थे.

महिलाओं के समूह ने दक्षिणपंथी हिंदू संगठन श्रीराम सेने के मुखिया प्रमोद मुताल्लिक को शर्मसार करने के लिए वैलेंटाइन्स डे पर पिंक अंडरवियर भेजने के लिए इसे इकट्ठा करना शुरू किया.

उन दिनों मैंगलुरु के एक पब पर हमला करने और महिलाओं को पीटने के लिए श्रीराम सेने सुर्खियों में था.

इस अभियान में हज़ारों लोग शामिल हुए और क़रीब 2000 पिंक अंडरवियर मुताल्लिक के मैंगलुरु ऑफ़िस कुरियर से भेजे गए.

पिछले साल केरल के एक कैफ़े में युवा जोड़ों की चुंबन लेती तस्वीरें सामने आने के बाद हिंदू कट्टरपंथियों ने यहां तोड़ फोड़ की थी.

इसके विरोध में केरल में सार्वजनिक रूप से चुंबन का आयोजन किया गया.

भारत में सार्वजनिक रूप से प्रेम जताना बुरा माना जाता है लेकिन इस आयोजन में हज़ारों लोग शामिल हुए और कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया.

विरोध का यह तरीक़ा जल्द ही कोलकाता तक पहुंच गया जहां विश्वविद्यालय के क़रीब 100 छात्र छात्राओं ने ‘प्यार करने का अधिकार’ की मांग को लेकर मार्च किया और दिल्ली में भी इसी तरह का आयोजन हुआ.

सपेरे का प्रदर्शन

सांप

एक सपेरे को गुस्सा दिलाना कभी भी बहुत अच्छा आइडिया नहीं होता.

लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारियों ने ऐसा कर एक अजीब मुसीबत मोल ले ली.

सपेरा हक्कुल अपने सांपों को रखने के लिए एक प्लॉट की अपील लेकर सरकारी अधिकारियों से मिला और इस पर सुनवाई न होता देख उसने सरकारी कार्यालय में कई सांप छोड़ दिए.

इनमें कुछ ख़तरनाक़ कोबरा सांप भी थे. कार्यालय में क़रीब 100 कर्मचारी मौजूद थे. कई तो उस कमरे से निकलने में सफल रहे लेकिन कई अधिकारी डर के मारे मेजों और कुर्सियों पर चढ़ गए.

शौच प्रदर्शन

सामूहिक शौच प्रदर्शन

सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल से नाराज़ झारखंड के आदिवासियों ने सार्वजनिक रूप से शौच के लिए बैठकर प्रदर्शन किया.

नेशनल कैंपेन ऑन आदिवासी राइट्स के सदस्यों ने लैंड बिल की प्रतियां छपवाईं.

प्रदर्शनकारी इन काग़जों पर पर शौच करने के लिए सड़क के किनारे बैठ गए.

मगरमच्छ और अनाकोंडा

बेंगलुरु

टूटी सड़कों की मरम्मत न किए जाने से हताश एक कलाकार ने बैंगलुरु में शहर की मुख्य सड़क पर पाने से भरे गड्ढे में 20 किलो का एक असली लगने वाला मगरमच्छ बनाया.

कलाकार बादल नंजुनदास्वामी की इस कलाकृति ने लोगों को ध्यान खींचा, लेकिन इससे सुस्त नौकरशाही हरक़त में आई और एक दिन बाद ही सड़क की मरम्मत करने वाले कर्मचारी भी आ गए.

विरोध जताने के इस तरीक़े से प्रेरित होकर पिछले महीने एनजीओ नम्मा बैंगलुरु फ़ाउंडेशन ने सड़क पर एक बड़े गड्ढे में एक विशाल अनाकोंडा बना दिया था.

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