बिहार चुनाव पर कैसी है मुलायम की बिसात

नीतीश कुमार और शरद यादव के साथ मुलायम सिंह
    • Author, नवीन जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

पुरानी जनता पार्टी के घटक दलों को एक करने की पहल करने वाले समाजवादी पार्टी ने बिहार में अलग चुनाव लड़ने का फ़ैसला कर लिया है.

मुलायम बिहार को लेकर मौन थे लेकिन वे बिहार के चुनावी दंगल पर क़रीबी निगाह रखे हुए थे. नरेंद्र मोदी की रैलियों, उनके भाषणों और अमित शाह की शतरंजी चालों का वे गहन विश्लेषण करते रहे हैं.

बिहार में उनकी कोई ख़ास दावेदारी नहीं. वे तो उत्तर प्रदेश में अपनी आगामी बड़ी लड़ाई के लिए वहां ज़रूरी सूत्र ढूंढ रहे हैं.

मुलायम बराबर यह नोट कर रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री भाजपाई उभार की काट कैसे कर रहे हैं.

मुस्लिम वोटरों पर नज़र

नीतीश कुमार और लालू यादव

लालू की तरह मुलायम को भी यादव-मुस्लिम वोटरों के बड़े तबके का समर्थन हासिल है. लेकिन बाकी लोगों का क्या होगा?

इसलिए अगर मुलायम यह सोच रहे हों कि वे उत्तर प्रदेश के कुछ बसपा नेताओं को अपने पाले में लाकर वे दलित वोटों पर अपनी पकड़ बढ़ा नहीं सकते हैं, तो आश्चर्य नहीं. भाजपा ने बिहार में ऐसा ही किया है.

बिहार के विधान सभा चुनाव में जद (यू), राजद, कांग्रेस और राकांपा मिलकर भाजपा का मुक़ाबला कर रहे हैं. मुलायम जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में ऐसा मुमकिन नहीं होगा. समाजवादी पार्टी को ही अपना आधार बढ़ाना होगा.

नीतीश कुमार के सामने आज जैसी भारी चुनौतियां हैं वैसी ही कड़ी चुनौती 2017 में मुलायम के सामने पेश होने वाली है. उत्तर प्रदेश में सरकार उनके बेटे अखिलेश यादव के नाम की है लेकिन उसे हाँकते तो मुलायम ही हैं.

सरकार के पेंच कसने की चाल

नीतीश कुमार

बिहार में नीतीश के ‘सुशासन’ की तुलना में उत्तर प्रदेश की सपा सरकार को औसत नंबर ही दिया जा सकता है. यहां भाजपा से मुक़ाबला करने की चुनौती भी मुलायम ही के रणनीति-कुशल कंधों पर है.

इसलिए एक तरफ उनकी निगाह बिहार के राजनैतिक अखाड़े के दांव-पेचों पर लगी हुई है, दूसरी तरफ उन्होंने बेटे अखिलेश की सरकार के पेंच कसने तेज़ कर दिए हैं.

बिहार से तुलना करें तो नीतीश कुमार ने हाल के दिनों में बिहार में पद यात्राएं और सम्मेलन किए. उनका जोर धार्मिक के साथ-साथ जातीय एकता और सद्भाव पर भी रहा.

मुलायम उत्तर प्रदेश में इसे बड़े पैमाने पर दोहरा कर मुस्लिम वोटों के साथ-साथ हिंदू वोटों पर भी पकड़ बनाना चाह्ते है.

बिहार नहीं है यूपी

सोनिया, नीतीश और लालू यादव

बात अगर जनता परिवार की करें तो मूलत: कांग्रेस-विरोध के विचार से जन्मे ये दल आज भाजपा को सबसे बड़े राजनीतिक शत्रु के रूप में देखते हैं. वे कांग्रेस का साथ लेने में कोई गुरेज नहीं कर रहे.

हालांकि बिहार और उत्तर प्रदेश में हालत एक से नहीं हैं.

बिहार में दो गठबंधनों के बीच सीधी टक्कर है. लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा कैसे मुमिकन है? यहां मायावती और मुलायम का गठबंधन लगभग नामुमिकन है.

मायावती होने का मतलब

मायावती, बसपा नेता

लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने वाली बहुजन समाज पार्टी को विधानसभा चुनाव में हलके में नहीं लिया जा सकता.

वह भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे का बड़ा कारण है और इसीलिए मुलायम का बड़ा सिरदर्द बनेगी.

बिहार के चुनावी संग्राम में अपने लिए ‘टिप्स’ तलाश रहे मुलायम के लिए अगले डेढ़-दो साल बेदह चुनौती भरे होने वाले हैं.

प्रधानमंत्री या कम से कम ‘किंग मेकर’ बनने का सपना लोकसभा चुनाव में टूट जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश का मोर्चा वे निश्चय ही बचाना चाहेंगे.

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