जब औरतों के कपड़ों में निकले मर्द

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

मुंबई की सड़कों पर रात के समय 15 आदमी जब औरतों के लिबास में निकले तो कइयों की नींद उड़ गई. ऑटो में सुस्ता रहे ड्राइवर तक उठ बैठे.

नज़ारा अजीब था. कोई साड़ी पहने था, कोई सलवार-सूट तो कोई स्कर्ट. कुछ ने तो कंधे दिखानेवाली ड्रेस पहनी थीं.

ये समलैंगिक या हिजड़ा समुदाय के नहीं थे. पुरुष थे फिर भी औरतों के कपड़े पहने निकले थे.

इनके मुताबिक ये एक संदेश देना चाहते थे कि, औरत हो या मर्द सबको अपने पसंद के कपड़े पहनने की आज़ादी होनी चाहिए.

'क्यों तफ़री करें'

इस सब पुरुषों को साथ लेकर आया <link type="page"><caption> 'वाय लॉएटर'</caption><url href="http://whyloiter.blogspot.in/" platform="highweb"/></link> ('क्यों तफ़री करें') नाम का संगठन.

संगठन की शुरुआत करनेवाली नेहा सिंह (अगली तस्वीर में हरी ड्रेस में) के मुताबिक उनका मक़सद है आम सार्वजनिक जगहों पर पुरुषों की ही तरह महिलाओं को घूमने-फिरने की आज़ादी की मांग करना.

महिलाओं के कपड़ों में पुरुषों की ये सैर भी ऐसी आज़ादी का संदेश देने के लिए थी.

नेहा कहती हैं, "कोई कुछ भी पहने उससे उसके जेंडर या व्यक्तित्व पर फ़ैसला नहीं करना चाहिए. ना ही इस वजह से उन्हें हिंसा का निशाना बनाना चाहिए."

तुर्की से प्रेरणा

नेहा के मुताबिक समाज में आम धारणा है कि कई बार लड़की का पहनावा ऐसा होता है जिसकी वजह से उसका बलात्कार किया जाता है, लेकिन शोध बताते हैं कि ये सरासर ग़लत है.

उनकी ताज़ा पहल की प्रेरणा थी हाल में ही तुर्की में कुछ मर्दों का लड़कियों के कपड़े पहनकर किया गया प्रदर्शन.

ये प्रदर्शन 20 साल की लड़की ओज़गेसान असलान के मामले की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए किया गया था.

तुर्की की रहनेवाली छात्रा असलान ने जब अपने बलात्कारियों को रोकने की कोशिश की थी तब उन्हें मार दिया गया था.

मिला लड़की होने का अनुभव

मुंबई की सड़कों पर पुरुषों का महिलाओं के लिबास में निकलना अजूबा तो लगना ही था. नीला दुपट्टा और लाल स्कर्ट पहने तरुण महिलानी को भी लोगों ने अजीब तरीके से घूरा.

उन्होंने बताया, "एक पल तो लगा कि उफफ! कितना ख़राब है ये, फिर सोचा कि लड़कियों को भी जब अजनबी ऐसे देखते होंगे तो उन्हें कितना बुरा लगता होगा."

पर तरुण के मन में ये साफ़ था कि वो इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे ताकि, "दूसरी ओर की कहानी और अनुभव समझ आएं."

साथ ही उन्हें ये एक महत्वपूर्ण मुद्दे को शांतिप्रिय तरीके से सामने लाने का सही तरीका भी लगा.

अब दफ़्तर भी ऐसे!

लाल और नीले सलवार कुर्ते में तैयार हुए अजितेश गुप्ता ने कहा कि ऐसा अनोखा मौका वो किसी हाल में नहीं छोड़ते.

वो बोले, "पता नहीं क्यों लड़कों और लड़कियों के कपड़े अलग हैं, मैं तो ऐसे कपड़ों में अब अपने दफ़्तर जाना चाहूंगा."

उनके मुताबिक महिलाओं के लिबास बेहद ख़ूबसूरत और 'ग्रेसफ़ुल' होते हैं और उन्हें सलवार-कुर्ता पहनकर लगा जैसे ये उनके लिए ही बना है.

लोगों में रुचि

पीली स्कर्ट और नीली टी-शर्ट पहने अर्जुन राधाकृष्णनन ने कहा कि पहले पहल एक शर्म और झिझक का अहसास हुआ, पर सब के साथ निकले तो वो जाती रही.

अर्जुन के मुताबिक, "लोग तस्वीरें खींच रहे थे, जुहू बीच पर खड़े कई परिवार भी हमें देखकर समझने की कोशिश कर रहे थे कि हो क्या रहा है, कई ने तो हमसे आकर बात भी की."

यहां तक कि लड़कों के एक झुंड ने उनसे स्कर्ट मांगकर कपड़े बदले औऱ उनके साथ ही चल निकले.

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