राहुल गांधी का न्यूनतम आमदनी का वादा कितना संभव?

न्यूनतम वेतन स्कीम
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में आयोजित एक जनसभा में दावा किया है कि कांग्रेस पार्टी आगामी चुनाव में जीत के बाद देश के हर ग़रीब को न्यूनतम आमदनी देगी.

राहुल गांधी ने ये घोषणा करते हुए कहा कि इस योजना के क्रियान्वन के बाद देश में कोई भी ग़रीब व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा.

राहुल गांधी के ऐलान के बाद कांग्रेस नेता और पूर्व विदेश मंत्री पी. चिदंबरम ने ट्विटर पर इस योजना को ऐतिहासिक बताते हुए इसके इतिहास पर रोशनी डाली है.

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चिदंबरम ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, "कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ की किसान रैली में एक ऐतिहासिक घोषणा की है और ये ग़रीबों की ज़िंदगी में एक बदलाव लेकर आएगी."

"यूनिवर्सल बेसिक इनकम के सिद्धांत पर बीते दो सालों से गहन विचार-विमर्श चल रहा है. और अब वह समय आ गया है जब हम इस सिद्धांत को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ढालकर ग़रीबों के लिए इसे अमल में लाएं."

"साल 2004 से 2014 के बीच 14 करोड़ लोगों को ग़रीबी के चंगुल से आज़ाद कराया गया. अब हमें भारत से ग़रीबी मिटाने का संकल्प करना होगा."

"भारत के ग़रीबों का देश के संसाधनों पर पहला हक़ है. कांग्रेस उन संसाधनों की तलाश करेगी जिनकी मदद से राहुल गांधी की योजना को अमल में लाया जा सके."

राहुल गाँधी

वहीं, महाराष्ट्र के वित्तमंत्री सुधीर मुनगांतिवर ने कहा है, "इंदिरा गांधी ने साल 1972 में ग़रीबी हटाओ का नारा दिया था. उस नारे का क्या हुआ? ये सभी घोषणाएं चुनाव को ध्यान में रखकर की जाती हैं और इन चीज़ों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए."

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

बिज़नेस जगत के वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा बताते हैं, "यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम का एक स्वरूप शुरु करने को लेकर सरकार के भीतर चर्चा चल रही है. हालांकि एक चिंता ये है कि तमाम सब्सिडी के साथ ऐसी किसी योजना पर अमल करना सरकारी ख़ज़ाने पर ख़ासा बोझ बढ़ाएगा और इस समय सब्सिडी से छेड़छाड़ राजनीतिक तौर पर काफ़ी नुक़सान पहुंचा सकती है. फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार बीच का कोई रास्ता निकालेगी. एक विकल्प ये भी है कि अंतरिम बजट में विज़न के तौर पर यूनिवर्सल बेसिक इनकम को लागू करने की मंशा ज़ाहिर कर समयबद्ध कार्यक्रम का ज़िक्र किया जाए."

राहुल गाँधी

वहीं, आइडीएफ़सी के फ़ेलो और वरिष्ठ विश्लेषक शंकर अय्यर कहते हैं, "मान लीजिए कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आने वाली सभी लोगों को न्यूनतम आमदनी योजना का लाभ मिलता है. ऐसे में देश के 97 करोड़ लोग इस स्कीम के लाभांवितों में शामिल होंगे. मान लीजिए कि किसी एक परिवार में पांच लोग हैं तो इस तरह ये संख्या बीस करोड़ परिवारों में बदल जाती है. इस तरह अगर एक परिवार को हर महीने 1000 रुपये दिया जाता है तो इस योजना का ख़र्च 240000 करोड़ रुपये होगा जोकि भारत सरकार के इस साल के ख़र्च का दस फीसदी होगा. और 167 लाख करोड़ की जीडीपी में ये आंकड़ा 1.5 फीसदी का होगा.

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कैसी होंगी क़ानूनी चुनौतियां?

आर्थिक और संवैधानिक मामलों के जानकार एडवोकेट विराग गुप्ता इसे लागू करने की चुनौतियों की तरफ़ इशारा करते हैं.

विराग गुप्ता कहते हैं, "इसमें तीन चुनौतियां हैं. जब आप बेसिक इनकम की बात करते हैं तो क्या आप लोगों को क़ानूनी अधिकार देते हैं. क्या इसके लिए क़ानून में कोई प्रावधान लाया जा रहा है. इस इनकम को देने के लिए क़ानूनी बाध्यता क्या रहेगी."

उनका कहना है, "इसलिए पहला सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह राजनीति है कि क़ानून है. अगर राजनीति है तो यह निर्भर करेगा कि मिलेगा या नहीं. लेकिन अगर क़ानून है तो यह सामाजिक सुरक्षा बन जाएगा."

विराग बताते हैं, "दूसरा सवाल आंकड़ों से जुड़ा है. ग़रीबी रेखा की परिभाषा तय नहीं है. आधार कार्ड सारे निवासियों को दे दिया गया है, यहां तक कि भारत में रह रहे बाहरी लोगों को भी आधार कार्ड दिया गया है. इनमें बांग्लादेशी लोग भी हैं. तो क्या जिनके पास आधार कार्ड है, उन सबके लिए बेसिक इनकम सुनिश्चित की जाएगी."

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गारंटी का पहलू

राहुल गांधी ने इस योजना की घोषणा करते हुए 'गारंटी' शब्द का प्रयोग किया.

उन्होंने कहा, "2019 चुनाव जीतने के तुरंत बाद, कांग्रेस पार्टी की सरकार गारंटी से न्यूनतम आमदनी देने जा रही है."

अगर यूपीए 1 और 2 के कार्यकाल पर नज़र डालें तो कांग्रेस सरकार यानी महात्मा गांधी नेशनल रोज़गार गारंटी योजना लेकर आई थी.

राजनीति पर नज़र रखने वाले 2009 के आमचुनाव में कांग्रेस की जीत का श्रेय भी मनरेगा को ही देते हैं.

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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये एक मनरेगा जैसी स्कीम ही है या ये कुछ अलग है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर मनोज पंत इसे मनरेगा जैसी स्कीम के रूप में ही देखते हैं.

मनोज पंत का कहना है, "एक तरह से ये मनरेगा जैसी स्कीम है. लेकिन मनरेगा कुछ दिनों की मज़दूरी की गारंटी है जबकि यूनिवर्सल बेसिक इनकम सालों भर दी जाने वाली चीज है."

वहीं, विराग गुप्ता इसके दूसरे पहलू की तरफ़ इशारा करते हैं, "मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है, लेकिन यह गारंटी तो देता है पर अधिकार नहीं. विदेशों में बेसिक इनकम के तहत लोगों का अधिकार होता है. सबसे पहला सवाल यही है कि आप इसे राजनीति मानते हैं या योजना मानते हैं या क़ानून."

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