नज़रिया: रामनाथ कोविंद से भाजपा को कितना फायदा?

रामनाथ कोविंद
    • Author, शरत प्रधान
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
  • प्रकाशित

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर रामनाथ कोविंद का नाम जैसे ही सामने आया, सबको बड़ा अचम्भा हुआ. उनका नाम इससे पहले कभी भी किसी ख़ास बात को लेकर नहीं सुना गया था.

पहली बार जब उनका नाम सामने आया तो लोगों ने खोजना शुरू किया, जैसे उत्तर प्रदेश के हैं तो किस जगह से हैं. चुनाव लड़ने के लिए वे जनता के बीच कभी गए नहीं. हां, वे राज्यसभा के दो बार सदस्य जरूर रहे. इसके अलावा दलित राजनीति में भी इनकी कभी कोई ख़ास भूमिका नहीं रही है.

एक तरह से रामनाथ कोविंद बहुत लो-प्रोफाइल के नेता रहे हैं. शायद यही वजह रही हो कि बीजेपी को एक ऐसा आदमी चाहिए था जो एक लो-प्रोफाइल दलित चेहरा हो.

रामनाथ कोविंद

दलित लीडर

दलित चेहरे का एक राजनीतिक मकसद होता है. लो-प्रोफाइल के और भी लाभ हैं, जैसे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि उनके चारों तरफ 'यस मैन' किस्म के लोग रहें.

उनको लगता है कि इस तरीके का लो-प्रोफाइल आदमी उनको ज्यादा सूट करेगा. उनके चयन की यही वजह हो सकती है कि वे एक दलित हैं और बीजेपी को राष्ट्रपति पद के लिए एक दलित लीडर की खोज थी.

कोविंद इसलिए भी ज्यादा सूट कर रहे थे कि वे हाई प्रोफाइल दलित नहीं हैं, जाने-पहचाने दलित नहीं हैं.

सामान्य तौर पर उनके जैसी प्रोफाइल वाले लोगों की उम्मीद नहीं की जाती है.

लेकिन जब कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल जैसी बेहद लो-प्रोफाइल महिला को राष्ट्रपति बना दिया तो इसका स्तर तभी से इतना गिर गया कि अब कोई हैरत नहीं होती.

रामनाथ कोविंद

कोविंद भाजपा के लिए कैसे फायदेमंद

रामनाथ कोविंद की अपनी कोई शख्सियत नहीं है. इस वजह से उन्हें अपने हिसाब से चलाना आसान है. नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री के लिए ऐसा आदमी बहुत सूट करता है.

प्रतिभा पाटिल से जिस तरह के रबर स्टांप राष्ट्रपति की प्रथा चल निकली, कोविंद के समय भी वही परंपरा कायम रहेगी.

कोविंद से पहले राष्ट्रपति बने केआर नारायणन भी दलित थे लेकिन उनकी एक अलग छवि थी. वे भारतीय विदेश सेवा के डिप्लोमैट थे.

वे एक हाई प्रोफाइल डिप्लोमैट थे, चीन जैसे देश में वे राजदूत रहे. उनके कार्यकाल में ऐसे मौके आए जब उन्होंने सरकार की फाइलों को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया.

केआर रामायणन, कलाम
इमेज कैप्शन, नारायणन का कार्यकाल राष्ट्रपति के तौर पर सक्रिय था और कलाम पीपल्स प्रेसिडेंट के तौर पर मशहूर हुए

नारायणन का दौर

नारायणन का एक अलग व्यक्तित्व था और कोविंद की उनसे कोई तुलना नहीं हो सकती है. कोविंद की एक ही अच्छाई है कि वे कभी विवादों में नहीं रहे हैं.

लेकिन ये सोचना कि राष्ट्रपति पद के लायक कोई आदमी हो जिसने कोई बड़ा-भारी काम किया हो, रामनाथ कोविंद पर लागू नहीं होता.

जब आदमी कोई बड़ा काम नहीं करता है तो वैसे भी कभी विवादों में नहीं पड़ता. इस लिहाज से कोविंद बीजेपी को बहुत सही लगे होंगे.

बीजेपी को कोई ऐसी शख्सियत सूट नहीं करती जिसकी खुद की कोई प्रोफाइल हो और जो अपनी मर्जी से काम करे.

ज्ञानी जैल सिंह, इंदिरा गांधी
इमेज कैप्शन, ज्ञानी जैल सिंह को भी इंदिरा गांधी का रबर स्टांप राष्ट्रपति करार दिया गया लेकिन ऐसे मौके भी आए जब उन्होंने सरकार से मुख्तलिफ राय रखी

अपवाद साबित होने की संभावना

मुझे इसकी उम्मीद नहीं लगती. बतौर वकील भी उन्होंने बड़े मुकदमे नहीं लड़े हैं.

हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में भी इनकी कोई ऐसी पृष्ठभूमि नहीं रही जहां उन्होंने खुद को साबित किया हो.

ऐसा कोई काम ही उन्होंने कभी नहीं किया है जिससे कोई उम्मीद बनती हो.

ये बात सही है कि ज्ञानी जैल सिंह भी रबर स्टांप कहे जाते थे. वे इंदिरा गांधी के यस मैन हुआ करते थे.

लेकिन ऐसे मौके आए जब उन्होंने काम किया, इसकी वजह शायद ये रही होगी कि आजादी के आंदोलन से जुड़े लोगों के मूल्य कुछ अलग होते थे.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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