माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई बताने वाले सिकदर का नाम खो गया

सिकदर की तस्वीर
    • Author, पारुल एबरॉल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

अगर भारत 1852 में एक आज़ाद देश होता और राधानाथ सिकदर ब्रितानी सरकार के लिए काम ना किए होते तो दुनिया माउंट एवरेस्ट को माउंट सिकदर के नाम से जानती.

माउंट एवरेस्ट का नाम भारत के सर्वे जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा गया है.

मेधावी गणितज्ञ सिकदर ने माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई कैलकुलेट की थी और दुनिया को बताया था कि यह दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है.

जिस शख़्स की शोहरत पूरी दुनिया में होनी चाहिए उसके बारे में शायद ही आज किसी को पता है.

ब्राह्मण परिवार में जन्मे राधानाथ सिकदर का जन्म कोलकाता के पड़ोस में स्थित जोरासांको में साल 1813 में हुआ था.

लेकिन सिकदर ने अपना ज़्यादातर वक्त चंदननगर जहां से उनका परिवार आता था, वहां गुज़ारा था.

कब्रिस्तान

कैथोलिक कब्रिस्तान

चंदननगर भारत में चंद फ्रेंच कॉलोनियों में से एक था. हुगली नदी के तट पर अवस्थित यह कस्बा कोलकाता से उत्तर में डेढ़ घंटे की दूरी पर है.

यहीं पर एक कैथोलिक कब्रिस्तान में उनकी कब्र मौजूद है. यह कब्रिस्तान 1696 में निर्मित हुआ थी.

एक ब्राह्मण का कब्र? वो भी रोमन कैथोलिक कब्रिस्तान में. यह कैसे संभव है. यही मैंने पूछा फादर ऑरसन वेल्स से जो स्थानीय चर्च में पादरी हैं.

उन्होंने बताया कि राधानाथ सिकदर अपने जवानी के दिनों में ही ईसाई बन गए थे. मुझे मालूम नहीं क्यों लेकिन किसी वजह से वो वापस हिंदू धर्म की ओर लौट गए थे.

फादर ऑरसन वेल्स ने यह बात बिल्कुल सही कही कि भारतीय अपने इतिहास, इतिहास के महत्वपूर्ण शख्सियतों की विरासत और धरोहर को सहजने को लेकर गंभीर नज़र नहीं आते हैं.

सिकदर की कब्र पर पत्थर

'कुष्ठ रोग'

कुछ ऐसा ही हुआ सिकदर के साथ भी. चूंकि उन्होंने कभी भी शादी नहीं की थी इसलिए उनके परिवार में उनकी कहानी सुनाने वाला कोई नहीं है. इसलिए उन्होंने क्यों ईसाई धर्म अपनाया और फिर क्यों हिंदू धर्म की ओर वापस लौट आए, इसे लेकर कोई पर्याप्त तथ्य मौजूद नहीं है.

उनकी कहानी में आज के भारत के मौजूदा राजनीतिक माहौल के लिए भी कई सबक थे.

उनके धर्मांतरण की कहानी हिंदू दक्षिणपंथियों की उस धारणा को तोड़ती है, जो यह कहते हैं कि भारत में सिर्फ़ दलित और निम्न जातियां ही धर्म परिवर्तन करती है.

हालांकि सिकदर की कहानी इससे कहीं ज़्यादा रहस्यमयी है. जब हिमालय से काम कर के बंगाल लौटे तो वो बुरी तरह से फ़्रॉस्ट बाइट्स (जिसमें बर्फ की वजह से अंग गलने लगता है) से ग्रसित थे. हिंदू समाज को लगा कि उन्हें कुष्ठ रोग की बीमारी हो गई है.

इसके साथ ही वो खुले तौर पर बीफ़ खाते थे जिससे कि हिंदू ब्राह्मण समुदाय ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था.

सिकदर की कब्र पर पत्थर

माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई

मैं इस निर्दयता पर भौचक्का रह गई थी लेकिन फादर वेल्स तसल्ली से बताते हैं, "वो एक अलग वक्त था. कुष्ठ रोग को लेकर उन दिनों हिंदुओं में कलंक की भावना थी."

फादर ने बताया कि बाद में सिकदर को ईसाइयों ने फिर अपनाया और उनके स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखा.

सिकदर ने बाद में बहुत सारे काम किए. फ्रेंच कब्रिस्तान के बीचोंबीच उनकी कब्र मौजूद है. यह जगह प्रार्थना हॉल के दाएं मौजूद है.

उनके सम्मान में प्रार्थना हॉल में उनकी एक तस्वीर लगी हुई है और उनकी कब्र पर एक विशेष पत्थर लगा हुआ जिसमें एक आदमी को पहाड़ पर चढ़ते हुए दिखाया गया है.

वहां सिकदर के नाम के साथ यह लिखा हुआ है कि उन्होंने ही माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नापी थी.

प्रार्थना सभा

अंतिम संस्कार

उनके दाईं ओर एक दूसरे हिंदू बंगाली पंचानंद टॉश की कब्र है. उन्होंने भी ईसाई धर्म अपना लिया था.

कब्रिस्तान में हिंदू धर्म से ईसाई बने इन दोनों शख़्सियतों का ही कब्र मौजूद है.

कब्रिस्तान की देखरेख करने वाले सपन बिस्वास बताते हैं कि पंचानंद के परिवार वालों ने बिना हिंदू धर्म की रीति से अंतिम संस्कार किए उनके शरीर को कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दिया था. सिर्फ़ उनकी राख़ ही कब्रिस्तान में दफनाने को दी गई थी.

उनके घर वाले अभी भी चंदननगर में रहते हैं.

सिकदर की कब्र

कब्रिस्तान की साफ-सफाई

एक दूसरे के प्रति अविश्वास और गलतफहमियां रहने के बावजूद इस शहर में लोग साथ रह रहे हैं.

फादर वेल्स बताते हैं कि कैसे जब उन्होंने पहली बार कब्रिस्तान की साफ-सफाई करने की शुरुआत की तो सबसे पहले हिंदू लोग ही मदद को आगे आए.

लंबे समय से बंद रहने की वजह से कब्रिस्तान में झाड़ियां उग आई थी.

कम से कम मौत के बाद ही सही लेकिन सिकदर को उस धर्म में जिसमें उन्होंने जन्म लिया और उस धर्म में जिसे उन्होंने चुना था, जगह तो मिली.

वीडियो कैप्शन, माउंट एवरेस्ट का पहला वीडियो

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