मुफ़लिसी में जीने को मजबूर सितारे

पुराने फ़िल्मी कलाकार
    • Author, संजय मिश्रा
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

साठ और सत्तर के दशक की मशहूर गायिका मुबारक़ बेग़म को भले ही महाराष्ट्र के शिक्षा और संस्कृति मंत्री विनोद तावड़े ने मदद का आश्वासन दिया, लेकिन वो मदद उन तक पहुँची नहीं.

मुबारक़ बेग़म से किए गए कई अधूरे वादों में एक और वादे का इजाफ़ा हो गया, लेकिन इससे भी बड़ी मुश्क़िल यह हुई कि मुफ़लिसी के इस दौर में पहले से जो मदद मिल रही थी, वो भी इस सरकारी आश्वासन की भेंट चढ़ गई.

जब बीबीसी की टीम मुबारक़ बेग़म से मिलने उनके घर पहुँची, तो पाया कि वो बमुश्क़िल उठ-बैठ पा रही हैं. उनके सुरीले गले से आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी.

मुबारक़ बेग़म

बड़ी कोशिश करने के बाद उन्होंने अपना मशहूर गाना, ‘ऐ मेरे हमराही मुझको गले लगा ले’ सुनाया. इस गाने के बाद बजी तालियों के जवाब में ‘शुक्रिया’ में हाथ उठाया और धीमे से कहा कि मैं बात नहीं कर पाउंगी.

तब मुबारक़ बेग़म की बहू ज़रीना शेख ने बताया, ‘‘छह महीने पहले बेग़म की बेटी का निधन हुआ, तब से ये गहरे सदमे में हैं. दिनभर बिस्तर में पड़े रहने से शरीर में घाव हो गए हैं.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘अस्पताल में मंत्री विनोद तावड़े आए थे और उन्होंने सरकारी मदद का ऐलान भी किया था, लेकिन वो वादा भर बनकर रह गया.’’

ज़रीना ने बताया कि सरकारी मदद की बात सुनने के बाद जो अन्य मदद आ रहे थे, वो भी बंद हो गए.

ज़रीना कहती हैं, ‘‘पहले लता मंगेशकर के ऑफ़िस से भी पैसा आता था, जिससे इनका ख़र्चा चलता था. लेकिन विनोद तावड़े के ऐलान के बाद से कोई पैसा नहीं आया. अब सिर्फ़ सलमान ख़ान की ओर से हर महीने दवाई मिल जाती है.’’

इंडस्ट्री के रवैये के बारे में बात करते हुए ज़रीना ने कहा, ‘‘इनकी बेटी के ख़त्म होने के बाद सिर्फ़ लता मंगेशकर का फ़ोन आया था, बाक़ी किसी ने कोई पूछताछ नहीं की.’’

मुबारक़ बेग़म

वहीं बीबीसी से संस्कृति मंत्री विनोद तावड़े के मीडिया सलाहकार गोविन्द येतेकर ने कहा, ‘‘मुबारक़ बेग़म की बीमारी और ऑपरेशन से जुड़े ख़र्च को वहन करने का जिम्मा सरकार ने लिया था.''

वे आगे कहते हैं, ''उनके रोज़मर्रा के ख़र्च को वहन करने की कोई बात नहीं हुई थी. हमने बेग़म के परिवार को सलाह दी थी कि जब तक वो पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाती, उन्हें अस्पताल में रहने दें, लेकिन उनका परिवार उन्हें घर ले गया.''

सतीश कौल

मुबारक़ बेग़म की ही तरह अभिनेता सतीश कौल भी मुफ़लिसी में जीने को मजबूर हैं. सतीश हिंदी और पंजाबी फ़िल्मों में जाना नाम हुआ करते थे.

लेकिन अब हालत यह है कि बीते दिनों आमिर खान की फ़िल्म ‘दंगल’ के लिए ऑडिशन दिया था. उस ऑडिशन का नतीजा अभी तक नहीं निकला है.

सतीश कौल

देव आनंद, दिलीप कुमार, शाहरुख़ खान, धर्मेंद्र जैसे कई कलाकारों के साथ 300 से ज़्यादा फ़िल्में करने वाले सतीश कौल कहते हैं, ‘‘बढ़ती उम्र और बीमारियों से खस्ताहाल हूँ. आर्थिक तंगी से गुज़र रहा हूँ.''

लोगों से ख़ुद की मदद की अपील भी करते हुए कहते हैं, ‘‘पटियाला यूनिवर्सिटी और एसपी अग्रवाल से हर महीने मदद मिलती थी, लेकिन कुछ महीनों से वो मदद भी बंद है. अब जो लोग मिलने आते हैं, उनके दिए पैसे से गुज़ारा कर रहा हूँ.''

सतीश ने कहते हैं कि मैंने एक्टिंग स्कूल खोला था, लेकिन स्कूल नहीं चला और मेरे 22 लाख़ रुपए डूब गए.

इन बदहाल कलाकारों में अगला नाम पुष्पा पगधारे का है.

पुष्पा

साल 1986 में आई फ़िल्म ‘अंकुश’ का मशहूर गाना ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गाने वाली पुष्पा को सरकारी मदद के नाम पर महज 2100 रुपए की पेंशन मिलती है.

मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, मुकेश, उषा मंगेशकर, ओपी नैय्यर सरीखे लोगों के साथ काम करने वाली पुष्पा कहती हैं कि मिलने वाली सरकारी पेंशन से पूरी दवाएँ भी नहीं आ पाती हैं.

पुष्पा ने बीबीसी से कहा, ‘‘मेरे पति के निधन के बाद मैं बिलकुल अकेली हो गई हूँ. कुछ मुँह बोले रिश्तेदार हैं, जो मेरी देखभाल करते हैं.’’

वो कहती हैं, ‘‘अपने गुज़र-बसर के लिए मैं कुछ कार्यक्रमों में गा लेती हूँ. मैं आज भी रियाज़ करती हूँ, लेकिन कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती.’’

एके हंगल, भगवान दादा ने भी जीवन के अंतिम पड़ाव में मुफ़लिसी भरे दिन गुज़ारे थे.

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