ईरान जंग ने कैसे गुजरात में लाखों मज़दूरों के रोज़गार को संकट में डाल दिया है?

    • Author, गोपाल कातेशिया
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मोरबी से
    • Author, राजेश अंबालिया
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

गुजरात के मोरबी शहर के पूर्वी हिस्से में स्थित घुंटू रोड, हलवद रोड, जांबुड़िया रोड, लाल परी रोड, नेशनल हाईवे नंबर 27 आदि इलाकों में चौबीसों घंटे धुआं और धूल उड़ती रहती है, और यहां हज़ारों ट्रकों का राज़ रहता है.

इस इलाके में सिरेमिक उद्योग से जुड़े सैकड़ों कारखाने बाहर से बेहद चमकदार नज़र आते हैं और दिन के चौबीसों घंटे तथा साल के 365 दिन लगातार धड़ाधड़ चलते रहते हैं.

इन कारख़ानों की किल्न यानी भट्टियों और स्प्रे‑ड्रायर से निकलने वाला सफ़ेद और काला धुआं दूर-दूर तक लोगों को लगातार चल रही गतिविधियों की ख़बर देता रहता है.

इन कारख़ानों में ट्रकों के ज़रिए राजस्थान और कच्छ से लाई गई मिट्टी में कुछ केमिकल मिलाकर उसे किल्न में 1200 डिग्री तापमान पर पकाया जाता है और उसे चिकनी व चमकदार सिरेमिक टाइलों में बदला जाता है. बाद में इन टाइलों को ट्रकों और कंटेनरों में भरकर भारत के कोने‑कोने में और दुनिया के कई देशों तक पहुंचाया जाता है.

लेकिन इन दिनों मोरबी की सिरेमिक फ़ैक्ट्रियों की काली चिमनियां तो दिखाई देती हैं, मगर उनमें से धुआं नहीं निकल रहा है. सड़कों पर लगभग सन्नाटा पसरा है, क्योंकि ट्रक या तो सड़क किनारे खड़े कर दिए गए हैं या फिर मोरबी छोड़कर अन्य जगहों पर माल ढुलाई के लिए चले गए हैं.

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जब फ़ैक्ट्रियां चालू रहती थीं, तब उनके बड़े‑बड़े शेडों में धूल के गुबार और गर्म हवा उड़ती रहती थी, लेकिन इन दिनों धूल के कण फर्श पर या मशीनों के ऊपर जम गए हैं और शेडों की हवा साफ़ लग रही है.

इन बड़े‑बड़े शेडों में काम करते समय लू न लगे, इसलिए बार‑बार गिलास भरकर नींबू शरबत पीने वाले मज़दूरों का दिन‑रात शोर‑शराबा रहता था, लेकिन इन दिनों ज़्यादातर फ़ैक्ट्रियों के शेड लगभग सूने पड़े हैं और मज़दूरों के क्वार्टरों में कौए उड़ते दिख रहे हैं.

फ़ैक्ट्री मालिकों का कहना है कि 28 फरवरी को इसराइल और अमेरिका के ईरान पर हवाई हमले किए जाने के बाद इन तीन देशों के बीच जो युद्ध छिड़ा, उसने मोरबी की 670 फ़ैक्ट्रियों और उन पर निर्भर लाखों लोगों को 'ठंडा' कर दिया है.

खाड़ी देशों से आयात की जाने वाली प्रोपेन गैस और लिक्विफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) इन फ़ैक्ट्रियों की जीवनरेखा है, लेकिन युद्ध के कारण ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में एक तरह की नाकाबंदी कर दी.

इसके चलते मार्च महीने की शुरुआत से गैस लेकर समुद्री रास्ते से कच्छ के कांडला बंदरगाह तक पहुंचने वाले जहाज़ों ने उस संकरे जलमार्ग से गुज़रना बंद कर दिया. इसके चार‑पांच दिन बाद ही मोरबी की सिरेमिक फ़ैक्ट्रियों की भट्टियाँ भी ठंडी पड़ने लगीं. इसका नतीजा यह हुआ कि लाखों मज़दूर मोरबी छोड़कर चले गए हैं, जबकि कुछ नए काम‑धंधे की तलाश में जुटे हुए हैं.

मज़दूर अब और कौन से काम कर रहे हैं?

घुंटू रोड पर स्थित एक फ़ैक्ट्री सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन सिरेमिक टाइलों के 12,000 बॉक्स का उत्पादन करती है. अगर इन 12,000 बॉक्स में पैक टाइलों को ज़मीन पर बिछाया जाए, तो उनसे 1.86 लाख वर्ग मीटर यानी करीब 20 लाख वर्ग फुट क्षेत्र को ढका जा सकता है.

ऐसा फ़ैक्ट्री के डायरेक्टर हरेशभाई भाडजा बताते हैं कि आकार में मध्यम मानी जाने वाली इस फ़ैक्ट्री में लगभग 125 लोग काम करते हैं. लेकिन 4 मार्च को फ़ैक्ट्री की किल्न में गर्मी पैदा करने के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्यूटेन गैस खत्म हो जाने की वजह से उन्हें फ़ैक्ट्री बंद करनी पड़ी.

26 मार्च को जब बीबीसी ने इस फ़ैक्ट्री का दौरा किया, तब वहां सिर्फ पांच सात लोग ही काम कर रहे थे. उनमें से एक थीं लक्ष्मी पंडित.

उत्तर प्रदेश की रहने वाली लक्ष्मी पंडित बीते करीब पांच वर्षों से मोरबी में काम कर रही हैं. आम दिनों में उनका काम कच्ची टाइल की गुणवत्ता की जांच करना होता है. लक्ष्मी पंडित की जांच के बाद ही टाइल को पकाने के लिए किल्न में भेजा जाता है.

हालांकि बीबीसी के दौरे के दौरान लक्ष्मी पंडित कुछ अन्य मज़दूरों के साथ बंद पड़ी किल्न की सर्विसिंग के काम में पुष्कर कुमार मिश्रा की मदद कर रही थीं.

बीबीसी से बातचीत में लक्ष्मी पंडित ने कहा, "जब से फ़ैक्ट्री बंद हुई है, तब से जो भी काम मिल जाए, वही कर लेते हैं. फ़ैक्ट्री बंद होने से थोड़ी बहुत चिंता तो रहती ही है. अभी तो समय पर वेतन मिल रहा है, लेकिन चिंता इस बात की है कि फ़ैक्ट्री कब चालू होगी? इसे लेकर कोई पक्का भरोसा नहीं है."

पुष्कर कुमार मिश्रा किल्न के इंचार्ज हैं और उन्होंने इस फ़ैक्ट्री में पांच महीने पहले ही काम शुरू किया था. उन्हें भी चिंता सता रही है.

वह कहते हैं, "युद्ध की वजह से गैस की सप्लाई बंद हो गई, इसलिए हमें 4 मार्च को फ़ैक्ट्री में शटडाउन करना पड़ा, क्योंकि हमारी किल्न में रोज़ाना करीब 15 टन (एक टन = 1000 किलो) गैस की खपत होती है और इतनी गैस उपलब्ध नहीं हो पाई. फिलहाल हम मेंटेनेंस का काम कर रहे हैं, लेकिन अगर गैस का कोई समाधान नहीं निकला तो हमें छुट्टी पर बैठना पड़ेगा. मेंटेनेंस का काम भी हम कितने दिन करेंगे? वह भी अब लगभग ख़त्म होने वाला है."

स्थिति को समझाते हुए हरेशभाई कहते हैं, "जब प्लांट बंद हुआ, तब जो लोग अपनी मर्ज़ी से घर जाना चाहते थे, वे चले गए. छुट्टियों का माहौल है, इसलिए कोई घर गया है, कोई घूमने चला गया है. मेरे 60 से 70 प्रतिशत मज़दूर अभी यहीं हैं. कुछ को हमने दिन की शिफ्ट में मेंटेनेंस के काम पर रखा है. 15 से 20 लोगों को मैंने नाइट शिफ्ट में रखा है, ताकि चोरी-चकारी जैसी घटनाओं की चिंता न रहे. वे रात में पूरी निगरानी रखते हैं. इस समय जो मज़दूर यहां मौजूद हैं, उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी हमने उठाई हुई है."

मोरबी के स्थानीय मज़दूर क्या करेंगे?

जांबुड़िया रोड पर स्थित एक और फ़ैक्ट्री गैस आपूर्ति खत्म हो जाने के कारण 24 मार्च को बंद हो गई. जब बीबीसी ने इस फ़ैक्ट्री का दौरा किया, तब वहां काम करने वाले कुछ कारीगर और मज़दूर अपना काम समेट रहे थे.

जामनगर ज़िले के पार्थ भौतिक कुमार उनमें से एक थे. वो इस फ़ैक्ट्री में बनने वाली टाइलों के क्वालिटी इंस्पेक्टर हैं और इस बात पर नज़र रखते हैं कि तैयार टाइलें तय गुणवत्ता मानकों के अनुसार हैं या नहीं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने चिंता जताई कि शायद उन्हें अपने गांव लौटकर खेती के काम में लगना पड़े.

उन्होंने कहा, "24 तारीख को फ़ैक्ट्री बंद हुई. पहली तारीख तक स्टाफ को रखा जाएगा. उसके बाद स्टाफ़ को छुट्टी देने की बात है. फ़ैक्ट्री बंद होती है तो हमें गांव जाना पड़ेगा और खेती‑बाड़ी या छोटे‑मोटे काम ढूंढने पड़ेंगे."

मोरबी तालुका के पानेली गांव के विनोद चावड़ा इसी फ़ैक्ट्री में ड्रायर ऑपरेटर हैं. उनके भाई भी सिरेमिक उद्योग में काम करते हैं, लेकिन उनकी फ़ैक्ट्री पहले ही बंद हो जाने के कारण वह बेरोज़गार हो चुके हैं.

विनोद भाई को भी चिंता है कि 1 अप्रैल के बाद उन्हें फ़ैक्ट्री में काम मिलेगा या नहीं.

वह कहते हैं, "पहली तारीख तक मेंटेनेंस का काम चलेगा. उसके बाद देखेंगे कि छुट्टी दे देते हैं या क्या होता है. अगर फ़ैक्ट्री लंबे समय तक बंद रही तो दूसरा कोई काम ढूंढना पड़ेगा, क्योंकि अभी तो हम पूरी तरह बेरोज़गार हो चुके हैं. ऊपर से दूसरा कोई काम मिलने की संभावना भी नहीं दिखती. ऐसे में खेती ही करनी पड़ेगी."

ईरान युद्ध से कितने लाख मज़दूर प्रभावित हुए?

मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन में विट्रिफाइड टाइल्स डिविजन के अध्यक्ष मनोज एरवाड़िया बताते हैं कि मोरबी में सिरेमिक टाइल्स और सैनेट्रीवेयर (बाथरूम की वस्तुएं) बनाने वाली करीब 670 फ़ैक्ट्री हैं, जिनमें लगभग चार लाख मज़दूर और कारीगर काम करते हैं.

मनोज भाई ने कहा, "इनमें से लगभग एक लाख मज़दूर गुजरात के बाहर के राज्यों से हैं. गैस सप्लाई बंद होने के कारण सैनेट्रीवेयर की करीब 60 फ़ैक्ट्रियों को छोड़कर ज़्यादातर फ़ैक्ट्रियां बंद हो रही हैं. लेबर कॉन्ट्रैक्टरों के ज़रिए आए मज़दूरों को संबंधित कॉन्ट्रैक्टर अपने तौर पर संभाल रहे हैं और जहां फ़ैक्ट्रियाँ चालू हैं, वहां उन्हें शिफ्ट किया जा रहा है."

"हमें जो जानकारी मिल रही है, उसके अनुसार मज़दूरों को वेकेशन दिया गया है. उन्हें अपने परिवार के पास जाने का समय मिला है, इसलिए कुछ मज़दूर अपनी मर्ज़ी से अपने घर चले गए हैं. फ़ैक्ट्री बंद होने पर मशीनरी की मेंटेनेंस का जो काम होता है, उसमें जितने मज़दूर काम कर सकते हैं, उन्हें उसी काम में लगा दिया गया है."

उन्होंने आगे कहा, "जो मज़दूर अपने घर नहीं गए हैं, वे फ़ैक्ट्री परिसर के अंदर ही रहते हैं और आम तौर पर, अगर मैं अपनी फ़ैक्ट्री की ही बात करूं, तो उनके खाने पीने और रहने की पूरी व्यवस्था हम करते हैं. छोटा-मोटा खर्च या कोई ज़रूरत हो, तो उसे भी हम पूरा कर देते हैं. जो लोग कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं और छुट्टी पर गए हैं, उन्हें इस दौरान वेतन नहीं मिलता लेकिन जैसे ही वे लौटेंगे, उनका वेतन फिर से शुरू हो जाएगा."

60 हज़ार करोड़ रुपये का उद्योग कैसे ठप पड़ गया?

मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और इस उद्योग के अग्रणी खीमजी भाई कुंडारिया बताते हैं कि मोरबी के सिरेमिक उद्योग का सालाना टर्नओवर करीब 60,000 करोड़ रुपये है. इसमें से लगभग 20,000 करोड़ रुपये की टाइल्स और सैनेट्रीवेयर उत्पादों का निर्यात किया जाता है.

सिरेमिक टाइल्स और सैनेट्रीवेयर उद्योग एक एनर्जी इंटेंसिव उद्योग है, यानी इसमें बहुत अधिक ऊर्जा की खपत होती है. उद्योगपतियों का कहना है कि उत्पादन लागत का क़रीब 40 प्रतिशत खर्च केवल गैस, कोयला और बिजली पर होता है.

मोरबी की फ़ैक्ट्रियां टाइल पकाने के लिए ज़्यादातर प्रोपेन गैस और राज्य सरकार द्वारा संचालित गुजरात गैस कंपनी से मिलने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी), यानी पाइप के ज़रिए पहुंचने वाली प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करती हैं.

घरेलू रसोई गैस के सिलेंडरों में भरी गैस प्रोपेन, ब्यूटेन और मरकैप्टन गैस का मिश्रण होती है. इसी तरह एलएनजी को तरल अवस्था से गैस में बदलकर पीएनजी के रूप में फ़ैक्ट्रियों तक पहुंचाया जाता है.

हरेशभाई बताते हैं कि फ़ैक्ट्री चलाने के लिए उन्हें रोज़ाना 14,000 क्यूबिक मीटर प्रोपेन गैस की ज़रूरत पड़ती थी, जिसकी लागत करीब 13 से 14 लाख रुपये आती थी.

वह कहते हैं, "मैं एक दिन छोड़कर एक टैंकर गैस मंगवाता था. पैसे जमा कराते ही एजेंट कांडला से टैंकर भेज देता था. लेकिन अमेरिका ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद खाड़ी देशों से गैस से भरे जहाज़ों का कांडला आना बंद हो गया. इसके बाद स्थानीय एजेंटों ने हमें साफ़ बता दिया कि गैस उपलब्ध नहीं है. गुजरात गैस कंपनी ने भी पहले कटौती की और बाद में आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी. इसी वजह से मुझे 4 मार्च को फ़ैक्ट्री बंद करनी पड़ी."

मनोजभाई बताते हैं कि 26 मार्च की स्थिति में मोरबी में कुल 670 में से सिर्फ़ करीब 60 फ़ैक्ट्रियां ही चालू थीं.

उन्होंने बीबीसी गुजराती से कहा, "मोरबी की सिरेमिक फ़ैक्ट्रियों में से 55 से 60 प्रतिशत फ़ैक्ट्रियाँ प्रोपेन गैस का इस्तेमाल करती हैं और बाकी पीएनजी पर चलती हैं. मोरबी में रोज़ाना करीब 70 लाख क्यूबिक मीटर (यानी लगभग 7,000 मैट्रिक टन) गैस की खपत होती है."

"युद्ध का माहौल बनने के कारण गैस सप्लाई को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई. इसी को देखते हुए हम उद्योगपतियों ने सामूहिक रूप से फ़ैसला लिया कि जब तक गैस की सप्लाई नियमित नहीं हो जाती, तब तक वेकेशन लिया जाए और सामूहिक रूप से फ़ैक्ट्रियां बंद रखी जाएं."

मनोजभाई आगे बताते हैं, "इस फैसले के तहत मोरबी में इस समय टाइल बनाने वाली 430 फ़ैक्ट्रियां बंद हैं, जो प्रोपेन गैस पर आधारित थीं. गुजरात गैस की पीएनजी पर चलने वाली फ़ैक्ट्रियों में से भी करीब 50 प्रतिशत यूनिट बंद हो गई हैं, क्योंकि गुजरात गैस ने भी जिन फ़ैक्ट्रियों से गैस सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट किया था, उसमें 20 प्रतिशत की कटौती कर दी थी."

"इसके बाद जिन फ़ैक्ट्रियों का गुजरात गैस का कोटा पूरा हो गया, उन्होंने भी अपनी फ़ैक्ट्रियां बंद कर दीं. हालांकि, सैनेट्रीवेयर की फ़ैक्ट्रियां कच्चे माल पर आधारित कुछ काम जारी रख सकती हैं. इसी वजह से 670 में से करीब 60 फ़ैक्ट्रियां ही चल रही हैं."

क्या मोरबी के लिए गैस का कोई विकल्प है?

खीमजीभाई बताते हैं कि 2019 तक मोरबी में करीब 600 फ़ैक्ट्रियाँ ईंधन के रूप में कोयले का इस्तेमाल करती थीं. भारत में कोयले का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है और दुनिया के कई देशों से इसका आयात भी किया जाता है. कोल गैसीफायर प्लांट के ज़रिये कोयले का अपूर्ण दहन किया जाता है, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन गैस निकलती है. इससे बनने वाली गैस को सिंथेटिक गैस या कोल गैस कहा जाता है. इसी सिंथेटिक गैस का इस्तेमाल किल्न को गर्म करने के लिए किया जाता था.

लेकिन कोल गैसीफायर से हवा, पानी और ज़मीन के प्रदूषण की शिकायतों के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 11 सितंबर 2019 को मोरबी के सिरेमिक उद्योग में कोल गैसीफ़ायर प्लांट्स पर प्रतिबंध लगा दिया.

खीमजीभाई बताते हैं कि इसके बाद से सिरेमिक फ़ैक्ट्रियां पीएनजी और प्रोपेन गैस पर निर्भर हो गईं.

हरेशभाई का कहना है कि वे गैस की जगह डीज़ल का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते, क्योंकि युद्ध के कारण डीज़ल के लिए ज़रूरी कच्चे खनिज तेल यानी क्रूड ऑयल की खाड़ी देशों से आपूर्ति में भी बाधाएं आ गई हैं.

वह कहते हैं, "अगर हमें प्रोपेन या पीएनजी मिल जाए तो हमें कोल गैस का इस्तेमाल नहीं करना पड़े, लेकिन मौजूदा हालात में तो एकमात्र विकल्प कोल गैस ही नज़र आ रहा है."

खीमजीभाई बताते हैं कि कुछ और प्रयोग भी किए जा रहे हैं.

वह कहते हैं, "आज भी हमारे देश की कई दूसरी इंडस्ट्री में सैकड़ों कोल गैसीफायर सक्रिय हैं, लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की ओर से मोरबी में इस पर प्रतिबंध होने के कारण यह विकल्प फ़िलहाल उपलब्ध नहीं है. ऐसे में अब कुछ लोग किल्न में ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल के प्रयोग कर रहे हैं. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो भविष्य में हमें गैस जैसे ईंधन के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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