51 साल पहले की यादें जब भारत ने आख़िरी बार जीता था हॉकी वर्ल्ड कप

भारत ने आख़िरी बार 1975 में हॉकी विश्व कप जीता था और इसमें अशोक कुमार ने अहम भूमिका निभाई थी
इमेज कैप्शन, विश्वकप के साथ बाएं से चिमनी, असलम शेर ख़ां, कोच गुरचरण सिंह बोधी और राइट आउट फ़िलिप्स.
    • Author, हरप्रीत कौर लांबा
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

क्या भारतीय हॉकी का 51 साल पुराना इंतज़ार ख़त्म होगा. भारत ने 1975 में विश्व कप जीता था. उसके बाद से टीम फिर कभी विश्व कप कोई मेडल नहीं जीता है.

भारत ने 15 अगस्त से नीदरलैंड्स और बेल्जियम में अपना नया विश्व कप अभियान शुरू किया है.

ऐसे में 1975 की ऐतिहासिक जीत के दो बड़े नायक, अशोक कुमार और असलम शेर ख़ान, उस टूर्नामेंट को याद कर रहे हैं जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी.

एक ने फ़ाइनल में जीत दिलाने वाला गोल किया था. दूसरे ने सेमीफ़ाइनल में भारत को हार से बचाया था.

आज भारत बनाम पाकिस्तान

इंग्लैंड के डेविड गुडफील्ड (बाएं) और भारत के नीलकांत शर्मा (दाएं) 17 अगस्त, 2026 को पश्चिमी नीदरलैंड्स के एम्सटेलवीन स्थित वैगनर स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच 2026 FIH पुरुष हॉकी विश्व कप के ग्रुप स्टेज मैच के दौरान गेंद के लिए संघर्ष करते हुए.
इमेज कैप्शन, इंग्लैंड के डेविड गुडफील्ड (बाएं) और भारत के नीलकांत शर्मा (दाएं) 17 अगस्त, 2026 को पश्चिमी नीदरलैंड्स के एम्सटेलवीन स्थित वैगनर स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच 2026 पुरुष हॉकी विश्व कप के ग्रुप स्टेज मैच के दौरान गेंद के लिए संघर्ष करते हुए.

उस ऐतिहासिक जीत की बात थोड़ी देर में पर पहले बात इस वर्ल्ड कप की.

भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता बुधवार को एफ़आईएच पुरुष हॉकी विश्व कप के मंच पर लौटेगी. इस मुकाबले में सिर्फ प्रतिष्ठा ही दांव पर नहीं होगी.

भारत को दूसरे दौर में जगह पक्की करने के लिए कम से कम ड्रॉ की ज़रूरत है, जबकि पाकिस्तान को अपना अभियान जारी रखने के लिए एम्सटेलवीन के वैगनर स्टेडियम में पूल डी का मुकाबला जीतना होगा.

भारत ने दो मैचों में तीन अंक हासिल किए हैं. उसने अपने अभियान की शुरुआत वेल्स के खिलाफ 3-1 की जीत से की थी. दूसरे मैच में भारत को इंग्लैंड के हाथों 2-4 से हार का सामना करना पड़ा.

पाकिस्तान के खाते में एक अंक है. उसे इंग्लैंड के खिलाफ 1-4 से हार मिली थी, जबकि वेल्स के खिलाफ मुकाबला 3-3 से ड्रॉ रहा था. इंग्लैंड पहले ही क्वालीफाई कर चुका है.

51 साल पहले जीते ख़िताब की यादें

2025 में भारतीय हॉकी के 100 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रम में पूर्व हॉकी खिलाड़ी असमल शेर खान का सम्मान करते केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया और किरण रिजिजू
इमेज कैप्शन, 2025 में भारतीय हॉकी के 100 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रम में पूर्व हॉकी खिलाड़ी असमल शेर खान का सम्मान करते केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया और किरण रिजिजू
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अशोक कुमार कहते हैं, "1975 विश्व कप जीत की यादें आज भी मेरे ज़ेहन में ताज़ा हैं. ऐसा लगता है जैसे यह सब कल ही हुआ हो."

15 मार्च 1975 को खेले गए फ़ाइनल में भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से हराया था. मैच में भारत एक समय 0-1 से पीछे था, लेकिन शानदार वापसी करते हुए भारतीय टीम ने ख़िताब जीत लिया. आज भी यह भारत का एकमात्र पुरुष हॉकी विश्व कप ख़िताब है.

यह पूरी टीम की जीत थी. लेकिन दो पल सबसे ज़्यादा याद किए जाते हैं. पहला, मलेशिया के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में असलम शेर ख़ान का गोल.

दूसरा, फ़ाइनल में अशोक कुमार का विवादित लेकिन निर्णायक गोल.

फ़ाइनल को याद करते हुए अशोक कुमार कहते हैं, "मैच बहुत तेज़ रफ़्तार से चल रहा था. स्कोर 1-1 था और मैच ख़त्म होने में सिर्फ़ 12 मिनट बचे थे. तभी हमें पेनल्टी कॉर्नर मिला. मैंने सीधा शॉट लगाने का विकल्प नहीं चुना."

"मैं दाईं तरफ़ से सर्कल के ऊपर पहुंचा. दो डिफ़ेंडरों को छकाया और गेंद वीजे फ़िलिप्स को दे दी."

"फ़िलिप्स कई खिलाड़ियों को पार करते हुए आगे बढ़े और फिर गेंद मुझे लौटा दी. उस समय मैं गोलपोस्ट के ठीक सामने था. मैंने तुरंत शॉट मारा. गेंद पोस्ट के कोने से टकराकर बाहर आ गई."

"मलेशियाई रेफ़री गलासिंघम विजयनाथन कुछ पल के लिए उलझन में थे. उन्होंने थोड़ी देर इंतज़ार किया और फिर गोल दे दिया."

"इसके बाद क्या हुआ, मुझे याद नहीं. वह एक जुनून था. हमें यक़ीन हो गया था कि हम जीत सकते हैं. गोल को लेकर विवाद हुआ, लेकिन हमारे लिए उसकी अहमियत बहुत बड़ी थी."

2016 में पूर्व हॉकी खिलाड़ी अशोक कुमार ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हॉकी के जादूगर और अपने पिता ध्यानचंद को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग को लेकर आयोजित विरोध मार्च में समर्थकों संग भाग लिया
इमेज कैप्शन, 2016 में पूर्व हॉकी खिलाड़ी अशोक कुमार ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हॉकी के जादूगर और अपने पिता ध्यानचंद को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग को लेकर आयोजित मार्च में हिस्सा लिया

इसके बाद भारत को काफ़ी दबाव झेलना पड़ा. पाकिस्तान लगातार हमले कर रहा था.

अशोक कहते हैं, "आख़िरी 10 मिनट सबसे मुश्किल थे. पाकिस्तान के खिलाड़ी हम पर टूट पड़े थे. लेकिन हम उन्हें गोल नहीं करने देना चाहते थे. फिर अंतिम सीटी बजी और हम विश्व चैंपियन बन गए. पूरी दुनिया हमारे क़दमों में थी."

लेकिन अशोक मानते हैं कि यह जीत एक खिलाड़ी के बिना संभव नहीं थी.

वह कहते हैं, "अगर असलम शेर ख़ान ने सेमीफ़ाइनल में गोल नहीं किया होता, तो हम फ़ाइनल तक पहुंच ही नहीं पाते. उनका गोल पूरे टूर्नामेंट का टर्निंग प्वॉइंट था."

बेहतरीन डिफ़ेंडर और पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ असलम शेर ख़ान पूरे टूर्नामेंट में अपने मौक़े का इंतज़ार करते रहे. हैरानी की बात यह थी कि लीग चरण में उन्हें एक भी मैच खेलने का अवसर नहीं मिला.

असलम कहते हैं, "उस समय हालात बहुत अलग थे. कोई खुलकर नहीं कहता था, लेकिन साफ़ लगता था कि मुझे टीम में नहीं चाहा जा रहा है."

"कुआलालंपुर आए हुए 13 दिन हो चुके थे और मैं अब भी अपने पहले मैच का इंतज़ार कर रहा था. रात को रोता था और टीम में खेलने का सपना देखता था."

उनकी दुआ सेमीफ़ाइनल में क़ुबूल हुई.

अशोक कुमार को 1974 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया
इमेज कैप्शन, अशोक कुमार को 1974 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया

मलेशिया के ख़िलाफ़ भारत कई पेनल्टी कॉर्नर गंवा चुका था. टीम पर लगातार दबाव बढ़ रहा था. मैच में लगभग आठ मिनट बचे थे और भारत 1-2 से पीछे था.

स्टेडियम में क़रीब 50 हज़ार दर्शक मौजूद थे. भारत के हर चूकने पर वे ज़ोरदार शोर मचाते थे.

असलम याद करते हैं, "कोच अब भी मुझे खिलाने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन मैनेजर बलबीर सिंह सीनियर ने आख़िरकार साफ़ कह दिया कि अब असलम को ही खिलाया जाएगा."

फिर माइकल किंडो को बाहर बुलाया गया और असलम मैदान में उतरे.

यह फ़ैसला तुरंत सही साबित हुआ. दो मिनट बाद भारत को पेनल्टी कॉर्नर मिल गया.

असलम कहते हैं, "मुझे लगा यही मेरा पल है. मैंने अपना ताबीज़ चूमा और शॉट लगाया. गेंद गोलकीपर को पार करती हुई जाल में जा पहुंची. स्कोर 2-2 हो गया."

"पूरी टीम ने राहत की सांस ली. मैच अतिरिक्त समय में गया. वहां हरचरण सिंह ने विजयी गोल करके हमें फ़ाइनल में पहुंचा दिया."

"मेरी ज़िंदगी का वह सबसे शानदार पल था."

भारत में कभी हॉकी बहुत लोकप्रिय हुआ करता था
इमेज कैप्शन, भारत में कभी हॉकी बहुत लोकप्रिय हुआ करता था (फ़ाइल फोटो)

फ़ाइनल से एक दिन पहले एक और घटना हुई, जिसे असलम आज भी नहीं भूल पाए हैं.

असलम बताते हैं, "बलबीर सिंह सीनियर मुझे अपने साथ मस्जिद ले गए. वह भारत की जीत के लिए दुआ करना चाहते थे."

"भारतीय और पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए एक ही बस हुआ करती थी. जब बलबीर मस्जिद गए तो पाकिस्तानी खिलाड़ी हैरान रह गए. कुछ ने मुझसे पूछा, एक सिख मस्जिद में दुआ कैसे कर सकता है?"

असलम कहते हैं, "वह बहुत भावुक पल था."

"वापसी में मेरे बगल में बैठे एक पाकिस्तानी खिलाड़ी ने कहा, आज कुछ ख़ास हुआ है. माना जाता है कि अल्लाह पहली बार उसके दर पर आने वाले इंसान को ख़ाली हाथ नहीं लौटाता. अब वह तुम्हें जीत से भी महरूम नहीं करेगा."

असलम मुस्कुराते हुए कहते हैं, "इसके बाद फ़ाइनल में क्या हुआ, यह पूरी दुनिया जानती है."

2026 का विश्व कप 15 अगस्त से शुरू हुआ है
इमेज कैप्शन, 2026 का विश्व कप 15 अगस्त से शुरू हुआ है

उस दौर में भारत की हॉकी की जीतें लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हुआ करती थीं. 1979 की फ़िल्म गोल माल में भी इसका ज़िक्र मिलता है.

फ़िल्म में अमोल पालेकर का किरदार हॉकी मैच देखने के लिए बीमार होने का बहाना बनाता है और कहता है, "यार, आज गोविंदा और अशोक कुमार भी होते तो मज़ा आ जाता."

वह अलग समय था. तब हॉकी खिलाड़ी घर-घर में पहचाने जाते थे. विश्व कप फ़ाइनल सुनने के लिए लाखों लोग रेडियो से चिपक जाते थे.

अब 51 साल बाद भारत फिर विश्व कप के मैदान में है. एक नई पीढ़ी अपने लिए वैसी ही यादें बनाना चाहती है.

इस बार भारत को ग्रुप डी में इंग्लैंड, पाकिस्तान और वेल्स के साथ है.

लेकिन अशोक कुमार और असलम शेर ख़ान के लिए 1975 की यादें आज भी उतनी ही ताज़ा हैं.

वे जानते हैं कि विश्व कप जीतने का एहसास कैसा होता है.

अब भारत उम्मीद कर रहा है कि नई पीढ़ी भी उस एहसास को फिर से जी सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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