ईरान की जंग के कारण भारत में बोतलबंद पानी और बीयर क्यों हो सकते हैं महंगे?

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इमेज कैप्शन, भारत में पीने लायक पानी की उपलब्धता अब भी एक चुनौती है और बहुत से लोगों के लिए बोतल बंद पानी एक विकल्प है (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, शर्लिन मोलन
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत में गर्मी बढ़ने लगी है और देश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार जाने की संभावना जताई जा रही है.

इसी बीच ईरान के साथ जारी युद्ध ने भारत के क़रीब 6 अरब अमेरिकी डॉलर के बोतलबंद पानी उद्योग पर दबाव बढ़ा दिया है. इसके पीछे का कारण कच्चा माल हासिल करने में हो रही मुश्किलें हैं.

पिछले महीने बाज़ार की अग्रणी कंपनी बिसलेरी ने अपनी कीमतों में 11% की बढ़ोतरी की जिससे एक-लीटर पानी के 12 बोतलों का पैक 24 रुपये महंगा हो गया.

समाचार एजेंसी के रॉयटर्स अनुसार, बेली और क्लियर प्रीमियम वाटर जैसे ब्रांड्स ने भी अपनी कीमतें बढ़ाई हैं.

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डेटा फॉर इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक़, लगभग 15% शहरी और 6% ग्रामीण परिवार पीने के पानी के लिए बोतलबंद पानी पर निर्भर हैं. हालांकि यह विकल्प महंगा है, ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए.

इसके बावजूद, भारत के कई हिस्सों में साफ पानी की उपलब्धता अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. ख़ासकर गर्मियों के दौरान जब पानी की कमी, भूजल प्रदूषण और बुनियादी ढांचे की कमी जैसी समस्याएं ज़्यादा बढ़ जाती हैं.

बोतल की कीमतों पर असर

नॉन अल्कोहलिक ड्रिंक्स इंडस्ट्री में पीईटी बोतलों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है

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इमेज कैप्शन, नॉन अल्कोहलिक ड्रिंक्स इंडस्ट्री में पीईटी बोतलों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है (फ़ाइल फ़ोटो)

ब्रांड्स और बोतल बनाने वाली कंपनियां चेतावनी दे रही हैं कि अगर युद्ध लंबा चलता है, तो एक ज़रूरी चीज़ की कीमत इतनी बढ़ सकती है कि बहुत से लोगों के लिए उसे ख़रीदना मुश्किल हो जाएगा.

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दुनिया की लगभग 20% तेल और गैस की आपूर्ति आमतौर पर होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुजरती है जिसकी फिलहाल ईरान ने लगभग पूरी तरह से नाकेबंदी कर रखी है. इससे वैश्विक शिपिंग प्रभावित हुई है और ईंधन की कीमतों में तेज़ उछाल आया है.

भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है और वह इस दबाव को महसूस कर रहा है.

महाराष्ट्र बोतलबंद पानी निर्माता संघ के अध्यक्ष विजयसिंह दुब्बल के अनुसार, बोतलबंद पानी की बढ़ती कीमतों के पीछे मुख्य कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल है.

इस सप्ताह ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 119 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो अमेरिका और इसराइल के साथ ईरान के संघर्ष की शुरुआत के बाद के उच्चतम स्तरों में से एक है.

कच्चे तेल का उपयोग पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) रेज़िन पेलेट्स बनाने में किया जाता है. गर्म कर मोल्ड में डालकर पीईटी प्रीफॉर्म तैयार किए जाते हैं, जो दिखने में प्लास्टिक टेस्ट ट्यूब जैसे होते हैं.

इन्हें बाद में अलग-अलग आकार और साइज़ की बोतलों में ढाला जाता है.

दुब्बल बताते हैं, "प्रीफॉर्म की कीमत 115 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर लगभग 180 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है. साथ ही इसकी आपूर्ति में भी कमी आई है."

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में बोतल बनाने वाली क़रीब 20% इकाइयों ने अस्थायी रूप से उत्पादन बंद कर दिया है.

राज्यों से कीमत बढ़ाने की मांग

ईरान युद्ध से पहले दुनिया की क़रीब 20% ऊर्जा सप्लाई होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़र रही थी
इमेज कैप्शन, ईरान युद्ध से पहले दुनिया की क़रीब 20% ऊर्जा सप्लाई होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़र रही थी

हालांकि कुछ कंपनियों ने कीमतें बढ़ाई हैं, लेकिन दुब्बल के मुताबिक़ कई ब्रांड्स और विक्रेताओं ने अब तक यह अतिरिक्त ख़र्च ख़ुद उठाया है, ताकि उपभोक्ताओं पर इसका असर न पड़े.

इसकी वजह से एक लीटर पानी की बोतल, जिसकी क़ीमत लगभग 20 रुपये है और पांच लीटर की बोतल, जिसकी कीमत 60 से 70 रुपये के बीच है, उनकी कीमतों में अभी तक बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.

वे कहते हैं, "लेकिन अतिरिक्त लागत को लंबे समय तक ख़ुद उठाना कंपनियों के लिए संभव नहीं है. अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो उपभोक्ताओं को इसका असर झेलना पड़ सकता है."

उन्होंने यह भी कहा कि आपूर्ति पर यह दबाव ऐसे समय में आया है, जब अप्रैल और मई के महीनों में बोतलबंद पानी और नॉन-अल्कोहलिक ड्रिंक्स की मांग अपने चरम पर होती है.

केमको प्लास्टिक इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटिड के निदेशक वैभव सरावगी का कहना है कि प्रीफॉर्म की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ बोतलबंद पानी उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी पैकेजिंग इंडस्ट्री पर पड़ेगा.

भारत का पीईटी पैकेजिंग बाज़ार साल 2024 में 1.5 अरब डॉलर का था और साल 2033 तक इसके 2.2 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.

बोतलबंद पानी और पेय पदार्थों के अलावा इसका उपयोग ब्यूटी, फार्मास्यूटिकल्स, रेस्टोरेंट्स और फूड डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर होता है.

ग्लास बोतल बनाने वाली कंपनियां भी इस संकट से अछूती नहीं हैं.

पिछले महीने हाइनकेन और कार्ल्सबर्ग जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाली ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने समाचार ऐजंसी रॉयटर्स को बताया कि ग्लास बोतलों की कीमतों में लगभग 20% की बढ़ोतरी हुई है.

साथ ही इस संस्था की सदस्य कंपनियों से कहा गया है कि वे राज्यों से बीयर की कीमतों में 12-15% तक बढ़ोतरी की मांग करें.

समाचार ऐजंसी रॉयटर्स के मुताबिक, कॉन्फेडरेशन ऑफ़ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनियां ने भी राज्यों को पत्र लिखकर कीमतें बढ़ाने की मांग की है.

ग्लास बनाने में गैस का इस्तेमाल

कांच को पिघलाने और उसे आकार देने के लिए गैस से चलने वाली विशाल भट्टियों का इस्तेमाल किया जाता है

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इमेज कैप्शन, बोतल बनाने के लिए कांच को पिघलाने और उसे आकार देने में गैस से चलने वाली विशाल भट्टियों का इस्तेमाल किया जाता है (फ़ाइल फ़ोटो)

दवा और बीयर बनाने वाली कंपनियां एम्बर ग्लास की रंगीन बोतलें का इस्तेमाल करती हैं. इनके एक प्रमुख निर्माता और विक्रेता, विट्रम ग्लास के सीईओ विठोबा शेट का कहना है कि कीमतों में यह बढ़ोतरी प्राकृतिक गैस की घटती-बढ़ती सप्लाई का नतीजा है.

ग्लास निर्माता अपने भट्टों को चलाने के लिए प्राकृतिक गैस का उपयोग करते हैं, जिसमें रेत, सोडा ऐश, चूना पत्थर और पुनर्नवीनीकृत कांच को पिघलाकर तरल कांच तैयार किया जाता है, जिसे बाद में बोतलों का आकार दिया जाता है.

हालांकि, युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने नेचुरल गैस के इस्तेमाल को लेकर नियम सख़्त कर दिए हैं, जिसमें घरेलू उपयोग और कुछ चुनिंदा उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है.

शेट के मुताबिक, प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में क़रीब 20% की कमी आई है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है.

कुछ कंपनियां जैसे विट्रम ग्लास इस कमी को पूरा करने के लिए तेल का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें उत्पादन लागत को और बढ़ा रही हैं.

भारत सरकार का कहना है कि देश में ऊर्जा आपूर्ति स्थिर है, लेकिन युद्ध के बाद कई रेस्टोरेंट्स को कुकिंग गैस की कमी के कारण बंद करना पड़ा है.

ऊर्जा संकट का असर सिरेमिक और उर्वरक उद्योगों पर भी पड़ा है, जबकि विमान क्षेत्र जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है.

शेट ने कहा, "हालात गंभीर है. पानी और दवाइयां जैसी चीजें ज़रूरी हैं, और सप्लाई में थोड़ी सी भी कमी इस पर बड़ा असर डाल सकती है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.