सऊदी अरब की फ़िज़ूलख़र्ची के दौर का कैसे हो रहा है अंत

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- Author, सेबेस्टियन अशर
- पदनाम, वैश्विक मामलों के संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 14 मिनट
इतिहास में कई निरंकुश शासक अपने दौर में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनवाकर गए, जिनके खंडहर आज भी उनकी महिमा की कहानी बयां करते हैं.
इनके निशान मध्य-पूर्व के उपजाऊ मैदानों, पहाड़ों और रेगिस्तानों तक में पाए जा सकते हैं.
लेकिन मौजूदा दौर का एक शासक अपनी कुछ सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं के पीछे सिर्फ़ डिजिटल फुटप्रिंट छोड़ जाएगा.
करीब एक दशक पहले सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने देश में बड़े सुधारों की योजना शुरू की थी. इसे विज़न 2030 नाम दिया गया.
इस योजना के तहत बनने वाली इमारतों को सिर्फ़ सऊदी अरब ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भी नए तकनीकी चमत्कारों की तरह देखा गया.
इसके प्रचार के लिए ज़ोरदार पीआर कंटेंट परोसा गया.
इसे सऊदी अरब के करीब एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के सॉवरेन वेल्थ फंड (पीआईएफ़) से मुमकिन बनाया गया था.
सऊदी अरब की दौलत तेल पर निर्भर है. लेकिन विज़न 2030 के इस सपने में 'बिना तेल वाले भविष्य की नींव' डाली जानी थी.

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अब साल 2030 से चार साल पहले शायद उन योजनाओं पर असर पड़े. इसकी एक वजह मध्य पूर्व में मौजूदा युद्ध के कारण तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट है.
युद्ध से पैदा अनिश्चितता सऊदी अरब के राजस्व को प्रभावित करना जारी रखेगी. इन बेहद महंगी दूरदर्शी परियोजनाओं में विदेशी निवेश की आमद कभी भी उस हद तक नहीं हुई, जिसकी सऊदी अरब को उम्मीद थी.
अब इस भव्य ख़्वाब का क्या होगा?
कल्पना से लेकर हक़ीक़त तक
विज़न 2030 की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से कुछ का बजट काटा जा रहा है, उन्हें फ़िलहाल रोका जा रहा है.
इनमें से कई परियोजनाएं 500 बिलियन डॉलर के नियोम मेगा-प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई हैं.
'द लाइन', सऊदी अरब के उत्तर-पश्चिम में 161 किलोमीटर से ज़्यादा खाली जमीन पर सीधी फैली एक अनोखी शहर परियोजना के तौर पर खड़ी की जानी थी. लेकिन वो अब काफ़ी साधारण रूप लेती जा रही है.

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उत्तर पश्चिम के पहाड़ों में स्थित ट्रोजेना के शीतकालीन रिसॉर्ट को भी फिर से बनाया गया है. सऊदी अरब की रेगिस्तान वाली छवि के विपरीत वहां बर्फ़ है.
लेकिन साल भर चलने वाले रिसॉर्ट की अवधारणा से शुरू हुआ ये प्रोजेक्ट अब व्यावहारिक नहीं लगता. यहाँ मीलों दूर तक स्की की ढलानें, मानव-निर्मित झील, लग्ज़री होटल और दुकानें हैं.
पहले ये अरब के पहाड़ों में एक छोटा-सा स्की विलेज भी हुआ करता था.
इसे साल 2029 में एशियाई शीतकालीन खेलों की मेजबानी के लिए समय तक तैयार हो जाना था, लेकिन अब इसे रद्द कर दिया गया है. अब ये खेल कज़ाकिस्तान में आयोजित होंगे.
इसके अलावा 'द क्यूब' नाम का प्रोजेक्ट भी रोका जा चुका है. इसके तहत फ़्लैट और दफ़्तर बनने थे. इसकी अनुमानित लागत 50 बिलियन डॉलर आंकी गई थी.
दुनिया में स्पोर्ट्स का प्रमुख ठिकाना बनने की ख़्वाहिश में सऊदी अरब ने एलआईवी गोल्फ़ टूर की योजना बनाई थी. इस पर आज तक लगभग 5 बिलियन डॉलर खर्च हो चुके हैं. लेकिन इससे अब तक कोई वित्तीय लाभ नहीं हुआ है.
एलेन आर वाल्ड सऊदी इंक. नामक किताब के लेखक हैं और अरसे से इस देश पर नज़र रख रहे हैं
उनका कहना है, “यह वही प्लेबुक है. 'द लाइन' के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक ही बात बार-बार होती है, और मोहम्मद बिन सलमान से पहले भी ऐसा ही होता था. वे ये बड़ी घोषणाएं करते हैं जो दिखावटी होती हैं, और फिर यह या तो बन नहीं पाती है या इन्हें काफी हद तक छोटा कर दिया जाता है.”

वाल्ड याद करते हैं कि 2000 के दशक में पूर्व सम्राट, किंग अब्दुल्ला ने भी नए शहरों को बनाने की घोषणाएं की थीं.
इसे “इकोनॉमिक सिटीज़” कार्यक्रम कहा गया था. इनका उद्देश्य सऊदी अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता कम करना था.
एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन पर निर्भर रहना जो हमेशा के लिए मौजूद नहीं रहेगा, अर्थव्यवस्था के विकास में एक बाधा के रूप में देखा जाता है.
इकोनॉमिक सिटीज़ के परिणाम काफी हद तक निराशाजनक थे, भले ही इस योजना पर अरबों डॉलर खर्च किए गए थे. कई प्रस्तावित शहर कभी भी धरातल पर नहीं उतरे.
जेद्दाह के उत्तर में लाल सागर तट पर स्थित सबसे बड़ा, 100 बिलियन डॉलर का किंग अब्दुल्ला इकोनॉमिक सिटी सफल हुआ, लेकिन इसे व्यवसाय और पर्यटन केंद्र बनाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है.
उम्मीद यह थी कि ये शहर सऊदी अरब की लगातार बढ़ती युवा आबादी के लिए विदेशी निवेश लाएंगे और रोज़गार पैदा करेंगे. लेकिन 2016 तक, बेरोज़गारी की दर अभी भी लगभग 12% थी.
वॉल्ड का मानना है कि इन परियोजनाओं के पीछे मौजूद अधिकारियों ने उनकी वास्तविक संभावनाओं को समझने में बुनियादी गलती की है.
वह कहते हैं, "उन्हें बाज़ार के बारे में क्या पता है? उन्हें किसने बताया कि यह संभव है? वहां 'हां में हां मिलाने' वाली सोच बहुत ज्यादा है. लोग राजा को वही बताते हैं, जो वह सुनना चाहते हैं. यही बात सलाहकारों पर भी लागू होती है, क्योंकि उन्हें बड़े कॉन्ट्रैक्ट चाहिए होते हैं. इसलिए वे भी वही कहते हैं, जो उन्हें लगता है कि उनके सऊदी क्लाइंट सुनना चाहते हैं. फिर आखिर में ये योजनाएं उम्मीदों पर खरी नहीं उतरतीं."
यह पैटर्न दशकों पुराना है, क्योंकि विदेशी कंपनियां सवाल पूछकर अपने आकर्षक कॉन्ट्रेक्ट को जोखिम में नहीं डालना चाहती हैं.
व्यापक बदलाव
कुछ लोगों का मानना है कि जब 2017 में प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) सऊदी अरब के वास्तविक शासक बने, तो उन्हें एक ऐसा सिस्टम विरासत में मिला, जिसे बदलने की ज़रूरत थी.
आर्थिक विश्लेषक, घनेम नुसीबेह वर्षों से सऊदी अरब में बदलावों पर नज़र रख रहे हैं.
उनका कहना है कि प्रिंस को “एक सामाजिक आर्थिक सिस्टम विरासत में मिला है जो आधुनिक दुनिया के संपर्क से बहुत दूर था, जो पूरी तरह से ठहराव की ओर बढ़ रहा था.”
'विज़न 2030' का मक़सद सऊदी अरब को तीन तरीकों से बदलने का था: आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक.

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देश के शक्तिशाली और कट्टर इस्लामी नेतृत्व का सामाजिक नियंत्रण, एमबीएस और उनके सलाहकारों को सऊदी अरब की आर्थिक क्षमता हासिल करने में बड़ी रुकावट लगता था.
एमबीएस के तहत राजनीतिक बदलाव को पहली बार सत्ता की कमान एक ज्यादा युवा और सक्रिय पीढ़ी को सौंपने के रूप में पेश किया गया.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि राजनीतिक चर्चा के लिए कोई नई जगह दी गई.
दरअसल, जैसा कि नुसीबेह मानते हैं, बदलाव की रफ्तार और दायरे को सीमित करने वाले कुछ मुद्दों के लिए खुद एमबीएस भी जिम्मेदार रहे हैं. और इन घटनाओं की छाया उनके शासन पर भी पड़ी है.
2017 में वास्तविक शासक बनने के तुरंत बाद उन्होंने रियाद के रिट्ज-कार्लटन होटल में सऊदी अरब के कई बड़े अधिकारियों और कारोबारियों को हिरासत में लेने का आदेश दिया. सऊदी सरकार ने इसे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई बताया, लेकिन कई लोगों ने इसे दबाव बनाकर वसूली करने जैसा कदम माना.
इसके बाद 2018 में इस्तांबुल स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की बेरहमी से हत्या ने क्राउन प्रिंस की छवि पर गहरा दाग लगा दिया. समय के साथ यह मामला भले थोड़ा फीका पड़ा हो, लेकिन इसका असर अब भी बना हुआ है.
सऊदी सरकार किस तरह असहमति से निपटती है, इसका सीधा अनुभव रखने वालों में अमेरिका में रहने वाले शिक्षाविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता अब्दुल्ला अल-आऊदा भी शामिल हैं.
उनके पिता सलमान अल-आऊदा, सऊदी अरब के एक प्रमुख इस्लामी विद्वान हैं. वह 2017 से जेल में बंद हैं. उन पर 'अशांति फैलाने' समेत कई आरोप लगाए गए हैं.
अब्दुल्ला का मानना है कि रिट्ज-कार्लटन जैसी कार्रवाइयों का विज़न 2030 के लिए फंड जुटाने के मकसद पर उल्टा असर पड़ा. हालांकि वहां हिरासत में रखे गए लोगों से करीब 100 अरब डॉलर वसूले गए थे.

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उन्होंने कहा, "लंबे समय में इससे निवेशक डरकर दूर हुए हैं. दमन के माहौल ने भी निवेशकों की नज़र में सऊदी अरब की छवि को प्रभावित किया है. निवेशक ऐसी सरकार और देश चाहते हैं, जहां स्थिरता और भरोसा हो. जब यह भरोसा नहीं होता, तो कोई व्यक्ति निवेश नहीं करेगा क्योंकि अगले दिन बिना किसी स्पष्ट वजह के उसे हिरासत में लिया जा सकता है. ऐसा माहौल कोई नहीं चाहता."
विज़न 2030 ने सऊदी अरब को लेकर बातचीत का तरीका बदलने में मदद की. साल 2016 के बाद देश में बड़े खेल और मनोरंजन कार्यक्रमों की शुरुआत हुई, जिससे सऊदी अरब की अंदरूनी स्थिति और दुनिया में उसकी छवि दोनों में बड़ा बदलाव आया.
यह बदलाव सिर्फ दिखावे तक सीमित नहीं था. महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार देने जैसे फैसलों ने सऊदी समाज में वास्तविक बदलाव भी किए. इसका असर इतना था कि अमेरिका में रहने वाली एक मशहूर सऊदी फैशन इन्फ्लुएंसर ने बताया कि हर बार सऊदी अरब जाने पर उनके दोस्त उन्हें पुराने विचारों वाला कहकर चिढ़ाते थे.
हालांकि, मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों ने इन बदलावों पर लगातार सवाल खड़े किए. एमबीएस जैसे-जैसे नए क्षेत्रों में आगे बढ़े, वैसे-वैसे 'स्पोर्ट्सवॉशिंग', 'आर्टवॉशिंग' और 'ग्रीनवॉशिंग' जैसे आरोप भी बढ़ते गए.
खेल और मनोरंजन जगत की कई बड़ी हस्तियां सऊदी अरब में कार्यक्रमों का हिस्सा बनने पहुंचीं, जबकि कुछ लोगों ने मानवाधिकार रिकॉर्ड का हवाला देकर वहां जाने से इनकार कर दिया.
मोटर रेसिंग और बॉक्सिंग जैसे आयोजनों के लिए हज़ारों प्रशंसक रियाद पहुंचे, लेकिन सऊदी अरब को लेकर बनी नकारात्मक छवि ने कई संभावित पर्यटकों को दूर भी रखा.
इसके बावजूद यह सच है कि सऊदी अरब के कई युवा एमबीएस की महत्वाकांक्षी योजनाओं को प्रेरणादायक और लोकप्रिय मानते हैं.
'सेविंग विज़न 2030'
कुछ बड़ी परियोजनाओं पर ख़र्च में की गई बड़ी कटौती को सऊदी अधिकारी जितना संभव हो सके, उतनी सकारात्मक रोशनी में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.
अब्दुल्लाह कहते हैं, "अब सोच यह है कि इन विशाल मेगा प्रोजेक्ट्स की जगह छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल किए जाएं और छोटी सफलताएं हासिल की जाएं."
"मसलन, लाल सागर में स्थित सिंदालाह द्वीप रिज़ॉर्ट ऐसी ही एक छोटी सफलता हो सकती है, जिसका प्रचार किया जा सकता है. यह मूल रूप से एक पारंपरिक शैली का रिज़ॉर्ट है, जिसे विज़न 2030 का हिस्सा बताकर पेश किया जा सकता है. तब वे कह सकते हैं कि 'ये ही नियोम की बुनियाद का प्रतिनिधित्व करते हैं और हमें पूरी परियोजना बनाने की ज़रूरत नहीं थी.'"
यह उसी दिशा में जाता दिखता है, जो बातें अधिकारी हाल में कहने लगे हैं. पब्लिक इन्वेस्टमेंट फ़ंड (पीआईएफ़) के गवर्नर यासिर अल-रुमय्यान ने हाल ही में कहा कि नई पंच वर्षीय योजना के तहत फंड "अपनी रणनीति के ज़रिए ख़र्च और निवेश वितरण की दक्षता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करेगा, साथ ही अपने कारोबार का टिकाऊ मूल्यांकन करेगा, ताकि उसके वित्तीय संसाधनों की स्थिरता सुनिश्चित हो सके."
कुछ विश्लेषकों के लिए यह नया फोकस सऊदी अधिकारियों के लिए सबसे बेहतर विकल्प है और विज़न 2030 को बचाने का एक तरीका भी.
प्रमुख सऊदी कारोबारी थामेर शाकर इसे अलग तरह से देखते हैं.
उनका कहना है, "हम जो देख रहे हैं, वह महत्वाकांक्षा से क्रियान्वयन की ओर स्वाभाविक बदलाव है. हर बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन के दौरान एक ऐसा मोड़ आता है, जब प्राथमिकताएं तय करना, चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना और संसाधनों का बंटवारा, बड़ी घोषणाओं के पैमाने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है."
कुछ प्रमुख परियोजनाएं आगे भी विकसित की जाती रहेंगी. इनमें रियाद में पुराने राजधानी क्षेत्र दिरियाह का पुनर्विकास और पुनर्जीवन,और सऊदी राजधानी के पास बनाया जा रहा अत्याधुनिक थीम पार्क सिक्स फ़्लैग्स क़िद्दिया सिटी शामिल हैं.
उत्तर में स्थित प्राचीन स्थल अल-उला का सफल विकास इस बात की एक मिसाल माना जा रहा है कि ऐसी परियोजनाएं किस तरह सफलतापूर्वक पूरी की जा सकती हैं.

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सऊदी अरब की नई राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान की प्रमुख परियोजना के रूप में कभी भुला दिए गए राज्य के एक कोने को बदलने वाली इस परियोजना पर अब तक कई अरब डॉलर ख़र्च हो चुके हैं.
इसे एक वैश्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए अरबों डॉलर का बजट है.
यह लक्ष्य, उदाहरण के तौर पर द लाइन जैसी परियोजना की तुलना में कहीं अधिक हासिल करने योग्य माना जा रहा है.
और खेलों में भी, सऊदी अरब ने सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक, 2034 फ़ुटबॉल विश्व कप की मेज़बानी हासिल कर ली.
इसमें कोई संदेह नहीं कि एमबीएस यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि डिज़ाइनों में दूरदर्शी सोच की झलक हो.हालांकि कुछ बेहद महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की लागत नियंत्रण में रखने के लिए सीमित किया गया है.

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सऊदी अधिकारी साफ़ तौर पर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि विज़न 2030 रास्ता बदलने के बारे में अपेक्षाकृत खुलापन, अतीत की गोपनीयता और बातों को छिपाने की संस्कृति से अलग एक नया रवैया है.
यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उन्होंने अपनी ग़लतियों को स्वीकार किया है और अपनी दिशा सुधार ली है.
खाड़ी क्षेत्र की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के विशेषज्ञ माते सलाई कहते हैं कि यह विदेशी राजनेताओं और राजनयिकों के लिए एक हद तक मददगार है.
उनका कहना है, "उनके लिए यह तथ्य कि सऊदी अरब के नेता कम से कम आंशिक रूप से अपनी ग़लतियों को स्वीकार कर रहे हैं और उन पर बात कर रहे हैं. निश्चित रूप से यह एक सकारात्मक संकेत है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह उतना आगे जाता है, जितना ज़्यादातर निवेशक और अन्य हितधारक उम्मीद करते हैं."
सऊदी कारोबारी थामेर शाकर इससे अधिक आशावादी नज़र आते हैं.
उनका कहना है, "कई मामलों में नई सोच से वास्तव में निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है.अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत अब धीरे-धीरे 'घोषणाएं कितनी बड़ी हैं?' से हटकर 'क्रियान्वयन का मॉडल कितना विश्वसनीय है?' पर केंद्रित होती जा रही है."
ये है अड़चन
विज़न 2030 का पुनर्मूल्यांकन अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले ही शुरू हो चुका था.
इस संघर्ष ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की मौजूदा व्यवस्था को झकझोर दिया है और उस रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका नेतृत्व यूएई ने किया था.
वह रणनीति थी दुनिया के लिए एक कारोबारी और पर्यटन केंद्र बनना.
सऊदी अरब साफ़ तौर पर न सिर्फ़ उस मॉडल की बराबरी करना चाहता था, बल्कि उससे आगे निकलना भी चाहता था.
सलाई कहते हैं कि युद्ध ने विज़न 2030 के भविष्य की दिशा को लेकर और अधिक भ्रम पैदा कर दिया.
उनका कहना है, "युद्ध से पहले जिन प्रमुख क्षेत्रों में सऊदी ज़्यादा निवेश चाहते थे, उनमें एआई और कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स शामिल थे. लेकिन खनन को छोड़कर इन सभी क्षेत्रों पर युद्ध का गंभीर असर पड़ा है."
"युद्ध से पहले मुख्य संदेश यह था कि अब नियोम को एआई पर केंद्रित उद्योगों के हब के रूप में फिर से परिभाषित किया जाएगा. युद्ध के संदर्भ में यह बात समझ में आती है, लेकिन इससे यह भी दिखता है कि मुख्य संदेश हर महीने बदल रहा है. यह कुछ रणनीतिक भ्रम की ओर इशारा करता है. हालांकि यह एक सकारात्मक संकेत भी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि सऊदी अधिकारी समझते हैं कि उन्हें एक नई योजना लेकर आना होगा."

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विज़न 2030 ने एक अलग तरह के सऊदी अरब के उभरने में मदद की है, जिसे कुछ लोग जश्न की तरह देखते हैं, जबकि कुछ इसकी आलोचना करते हैं.
लेकिन अगर इस बदलाव के तीन प्रमुख स्तंभ थे.लेकिन अभी मंज़िल तक पहुंचने के लिए लंबा रास्ता बाकी है.
राजनीतिक तौर पर, असहमति को पहले की तरह ही सख़्ती से दंडित किया गया है.
सामाजिक स्तर पर बड़े बदलाव हुए हैं, यहां तक कि रियाद जैसे शहर में रहने का अनुभव भी पूरी तरह बदल गया है.
इसका असर यह हुआ है कि सऊदी लोग अब देश के भीतर ही मनोरंजन के उन तमाम साधनों पर ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं, जो 20 साल पहले वहां मौजूद ही नहीं थे.
आर्थिक रूप से, विज़न 2030 की मेगा परियोजनाओं का उद्देश्य देश को ऐसे भविष्य की ओर ले जाना था, जहां निजी और विदेशी निवेश, राज्य की अपार तेल संपदा के बराबर खड़े हो सकें.
लेकिन यह लक्ष्य अब तक केवल आंशिक रूप से ही हासिल हो पाया है.
सऊदी नेतृत्व ने स्वाभाविक रूप से इसे एक सफलता की कहानी के रूप में पेश किया है, भले ही यह उस पैमाने तक न पहुंचा हो जिसकी कभी कल्पना की गई थी.
एमबीएस खुद को जितना भी दूरदर्शी नेता के रूप में पेश करना चाहें, यह साफ़ दिखाई देता है कि वह और उनके आसपास के लोग ज़रूरत पड़ने पर व्यावहारिक भी दिखना चाहते हैं.
वे उन अरबों डॉलर के लिए सऊदी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, जो ऐसी परियोजनाओं पर ख़र्च किए गए हैं और जो अब शायद केवल इंटरनेट पर ही मौजूद रह जाएं.
जहां तक अंदाज़ा लगाया जा सकता है, क्राउन प्रिंस की लोकप्रियता युवा सऊदियों के बीच अब भी काफ़ी ऊंची बनी हुई है.
यही वजह है कि 'द क्यूब' जैसी मेगा परियोजनाओं को ऐसे कूड़ेदान में फेंका जा सकता है, मानो वे बेकार काग़ज़ हों.
और 'द क्यूब' के मामले में यह बात शायद सच्चाई से बहुत दूर भी नहीं है.
खेल, मनोरंजन, कला और अन्य क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां, जो सऊदी धन पर निर्भर हो चुकी थीं, अब एक नई हक़ीक़त का सामना कर रही हैं. पैसे का प्रवाह या तो बहुत धीमा हो गया है या पूरी तरह बंद कर दिया गया है.
एलेन आर वाल्ड के मुताबिक़, एलआईवी गोल्फ टूर जैसी कुछ परियोजनाएं शुरू से ही तर्कसंगत नहीं लगती थीं.
उनका कहना है, "सवाल यह है कि उनकी मूल रणनीति क्या थी?… मेरा मतलब है, शायद उन्होंने इतनी बड़ी रकम सिर्फ़ पीआर के लिए तो ख़र्च नहीं की होगी. यह तो पागलपन होता."
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हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.




























