मायावती ने दिखाई ताक़त, 2027 के चुनाव में दलित किस ओर?

9 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के पुण्यतिथि पर दो कार्यक्रम आयोजित किए गए.
इमेज कैप्शन, 9 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के पुण्यतिथि पर दो कार्यक्रम आयोजित किए गए
    • Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

लखनऊ के इको गार्डन में बीएसपी ने उत्तर प्रदेश चुनाव के पांच महीने पहले शक्ति प्रदर्शन किया था.

9 अक्तूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के पुण्यतिथि पर दो कार्यक्रम आयोजित किए गए.

मायावती ने माल एवन्यू में कांशीराम को श्रंद्धाजलि दी तो बीएसपी के कार्यकर्ताओं ने इको गार्डन में हुए कार्यक्रम में हिस्सा लिया.

इको गार्डन में पहुंचे कार्यकर्ताओं ने मायावती को फिर से मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया.

इस दौरान मायावती ने मौजूदा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "कुछ लोगों को फीलगुड कराना विकास और समृद्धि नहीं होती है."

साथ ही उन्होंने कांशीराम के लिए भारत रत्न की भी मांग की.

बीएसपी के पास चुना हुआ कोई जनप्रतिनिधि नहीं

सवाल ये है कि इस नई मांग से मायावती अपने कोर समर्थकों को क्या संदेश देना चाहती हैं?

हालांकि, इस जमावड़े का मकसद ये भी था कि ये बताया जा सके कि मायावती की पकड़ अभी भी दलित वोट पर बनी हुई है.

वैसे ये रैली नहीं थी मगर इसमें बीएसपी ने लखनऊ चलो का नारा दिया था.

मायावती ने एक्स पर लिखा, "कांशीराम जी के मिशनरी संकल्प का ही यह सुखद परिणाम था कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और महत्वपूर्ण राज्य में मेरे नेतृत्व में बीएसपी की चार बार सरकार बनी."

उन्होंने दावा किया "इसके माध्यम से 'सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति' के ऐतिहासिक कार्य किए गए."

हालांकि प्रदेश में तीन बार गठबंधन की और एक बार बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बावजूद पार्टी इस समय कमज़ोर स्थिति में है.

बीएसपी के पास संसद और प्रदेश के दोनों सदनों में एक भी प्रतिनिधि नहीं है. 2022 में पार्टी के एकमात्र चुने हुए विधायक की मृत्यु के बाद विधानसभा में शून्य की स्थिति बन गई.

दलित वोट के कई दावेदार

उत्तर प्रदेश में दलित आबादी लगभग 20-21 प्रतिशत है.
इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश में दलित आबादी लगभग 20-21 प्रतिशत है

2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी में दलितों की आबादी 4 करोड़ से अधिक है.

403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के लिए 84 सीटें आरक्षित है. दो सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं.

राज्य में दलित आबादी लगभग 20-21 प्रतिशत है. इस आबादी का 140 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव रहता है.

बहुजन समाज पार्टी , भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी गठबंधन सहित सभी प्रमुख दल इस वोट बैंक को रिझाने में सक्रिय है.

मायावती ने 9 अक्तूबर को दिए अपने भाषण में कहा, "देश में जाति के आधार पर सदियों से तोड़े और पछाड़े गये ख़ासकर 'बहुजन समाज' के करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं अन्य कमज़ोर तबक़ों को कांशीराम ने सत्ता की मास्टर चाबी दी है."

हालांकि कांशीराम के परिनिर्वाण के बीस साल के भीतर ही मिशन बीएसपी सबसे कमज़ोर स्थिति में है.

सीएसडीएस के संजय प्रसाद ने फ्रंटलाइन को बताया कि 2012 के विधानसभा चुनाव से मायावती के वोट में गिरावट हो रही है.

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वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन कहती है, "इस गिरावट का कारण है कि मायावती के साथ के लोग अब दूसरे दलों में है, दूसरा पार्टी का कैडर पहले जैसा सक्रिय नहीं है."

समाजवादी पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा दलित का गठजोड़ बनाना चाह रही है. वहीं कांग्रेस ने हाल में ही यूपी का प्रभारी अविनाश पांडे की जगह राजेंद्र पाल गौतम को बनाया है जो दलित समाज से आते हैं.

राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस दलित समाज से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे के ज़रिए भी दलितों को साथ लाने का प्रयास कर रही है.

राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलाहंस का कहना है, "दलित अब मायावती के अलावा कांग्रेस की तरफ देख रहा है, इसका प्रमाण 2024 का लोकसभा चुनाव है, इसमें इंडिया अलायंस को सबसे ज्यादा 43 सीट मिली और बीएसपी शून्य पर पहुंच गई है."

पश्चिमी यूपी मायावती का गढ़ माना जाता है, लेकिन नगीना में एएसपी आज़ाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर सुरक्षित सीट से जीते तो इस सीट पर बीएसपी उम्मीदवार को बहुत कम वोट मिला था.

इस विधानसभा चुनाव में दलितों को मजबूत प्रतिनिधित्व देने का दावा करने वाली एएसपी भी मज़बूती के साथ मैदान में उतरने का प्रयास कर रही है.

पार्टी का वोट प्रतिशत लगातार नीचे

इस समय बीएसपी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती वोट बैंक को बढ़ाना है.
इमेज कैप्शन, इस समय बीएसपी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती वोट बैंक को बढ़ाना है

बीएसपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती वोट बैंक को बढ़ाना भी है, क्योंकि पार्टी का वोट प्रतिशत लगातार गिर रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन ने कहा, " बीएसपी के लिए करो या मरो का सवाल है क्योंकि पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में एक सीट और 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई है."

उन्होंने कहा, "इस स्थिति में मायावती के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है, पार्टी के भीतर वो निर्विवाद लीडर हैं."

हालांकि समाजवादी पार्टी के पास पीडीए का पिच है. इस वजह से गैर-जाटव वोट पर उनकी पकड़ मज़बूत हो रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव से ये साबित भी हुआ है.

सीएसडीएस के मुताबिक इंडिया अलायंस को दलित वोट में गैर जाटव वोट 56 प्रतिशत और जाटव का 25 प्रतिशत मिला था.

इंडिया अलायंस को 92 प्रतिशत मुस्लिम वोट और 82 प्रतिशत यादव वोट भी मिले थे.

लेकिन बीजेपी को गैर-जाटव का 29 प्रतिशत वोट ही मिला था. हालांकि 2019 में ये 48 प्रतिशत था.

मायावती के अति पिछड़ा वोट पर भी कई दलों का दावा है, राजभर समाज का प्रतिनिधित्व का दावा सुभासपा सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी और निषाद समाज के नाम पर निषाद पार्टी है.

इन वोटों में ज्यादातर वोट पहले बीएसपी के पास थे. लेकिन बीजेपी और सहयोगी दलों ने भी सेंध लगाई है.

सीएसडीएस के प्रोफेसर संजय प्रसाद ने फ्रंटलाइन से कहा कि बीएसपी के दलित और अति पिछड़ा वोट में गिरावट देखी गई है.

वहीं मायावती की राजनीतिक गतिविधि भी कम हुई है. इस वजह से बीएसपी का संगठन कमज़ोर पड़ गया है. 2012 से यूपी में सरकार जाने के बाद से मायावती की राजनीतिक गतिविधि सीमित हो गई है.

वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन ने कहा, "बीएसपी अब सड़क पर नहीं दिखाई दे रही है. हालांकि मायावती अभी भी पुराने तेवर में आ जाए तो स्थिति बदल सकती है, लेकिन इसके लिए सड़क पर निकलना होगा."

हालांकि 2014 के बाद केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद से मायावती सरकार पर नरम और कांग्रेस पर गरम रही हैं. इस वजह से उनकी धार कम हुई है.

अभी हाल में नीट पेपर लीक मामले में उन्होंने इसके राजनीतिकरण की आलोचना की और टकराव से बचने की सलाह दी थी.

बीएसपी में नेतृत्व का संकट

बीएसपी में इस समय नेतृत्व का संकट है, जो स्थिर नहीं है.
इमेज कैप्शन, जानकारों को कहना है कि बीएसपी में इस समय नेतृत्व का संकट है, जो स्थिर नहीं है

जानकारों का मानना है कि बीएसपी में इस समय नेतृत्व का संकट है. मायावती के बाद कई नेता ऐसे थे, जो बीएसपी को मज़बूत करने का काम करते थे.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखते थे. लेकिन अब वह समाजवादी पार्टी में हैं.

यही हाल बाबू सिंह कुशवाहा का है, जो जौनपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद हैं.

स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी के बाद सपा में गए और फिर अपनी पार्टी बनाकर इंडिया अलायंस का हिस्सा बने.

ब्रजेश पाठक और दारा सिंह चौहान बीजेपी के साथ हैं.

पुराने नेताओं में अब केवल सतीश मिश्रा ही बचे हैं.

मायावती ने कई बार अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे करने का प्रयास किया.

मायावती ने इसी हफ़्ते आकाश आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बनाया है.

इससे पहले मायावती ने आकाश आनंद को उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के कारण पार्टी से निकाल दिया था. मायावती ने शर्त रखी थी कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास ले लें तो वह आकाश आनंद को बीएसपी में वापस ले लेंगी.

आकाश आनंद के अलावा मायावती के भाई आनंद कुमार पार्टी का कामकाज देखते हैं. इसके अलावा मायावती ने अपने भतीजे ईशान आनंद को भी पार्टी का काम दिया है.

'बीएसपी में आकाश को लेकर संशय'

बीएसपी के क़रीबी लोगों का कहना है कि आकाश आनंद को कई बार हटाने और वापस लाने का मामला राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक है.
इमेज कैप्शन, 'बीएसपी के क़रीबी लोगों का कहना है कि आकाश आनंद को कई बार हटाने और वापस लाने का मामला राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक है'

वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन कहती हैं, "बीएसपी के क़रीबी लोगों का कहना है कि आकाश आनंद को कई बार हटाने और वापस लाने का मामला राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक है."

बीएसपी के भीतर के लोग उन्हें नए नेता के रूप में देख रहे हैं. हालांकि, उनकी भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषक सैयद क़ासिम ने कहा, "आकाश आनंद मायावती के हिसाब से ही पार्टी का काम करेंगे और अगर सब कुछ ठीक रहा तो वह पार्टी में नए नेता के तौर पर उभर सकते हैं."

लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय अलग है.

सिद्धार्थ कलहंस ने कहा, "मायावती के बार-बार आकाश आनंद को बाहर करने से बीएसपी का कैडर उनके साथ उस तरह नहीं जुड़ेगा, जिस तरह उनके पहली बार पार्टी में आने पर जुड़ा था."

उन्होंने कहा, "दलित वर्ग में नगीना के सांसद चंद्रशेखर की लोकप्रियता बढ़ रही है. ख़ासकर युवा वर्ग में बढ़ती उनकी लोकप्रियता आकाश आनंद के लिए चिंता का विषय है."

इसके पीछे कलहंस का तर्क है, "कांशीराम और मायावती के साथ आंबेडकरवादी भी थे. लेकिन उनमें बिखराव हुआ है. बीजेपी के आने के बाद यह वर्ग कांग्रेस के साथ जा रहा है."

हालांकि, उनका कहना है कि इसके प्रतिशत पर बहस हो सकती है.

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन ने कहा, "मायावती आकाश को चंद्रशेखर की काट के लिए ही लाई हैं, लेकिन उन्हें आज़ादी नहीं दे रही हैं."

2027 के चुनाव में दलित किस ओर?

2027 में दलित किस ओर जाएगा, इसका आकलन सभी दल कर रहे हैं.
इमेज कैप्शन, 2027 में दलित किस ओर जाएगा, इसका आकलन सभी दल कर रहे हैं

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया अलायंस ने संविधान और आरक्षण का मुद्दा उठाया. इसका फ़ायदा भी मिला और पूरे देश में कांग्रेस की सीटें बढ़ गईं.

लेकिन 2027 में दलित किस ओर जाएगा, इसका आकलन सभी दल कर रहे हैं.

बीएसपी का कोर वोट समझे जाने वाले दलित वोट पर सभी दलों की निगाह है.

उत्तर प्रदेश में फ़रवरी-मार्च 2027 में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है.

मायावती और उनकी पार्टी के पास सिर्फ़ पांच महीने का वक़्त बचा है. हालांकि, सभी दलों के पास इतना ही समय है. लेकिन मायावती के लिए यह समय इसलिए अहम है क्योंकि वह न सत्ता पक्ष में हैं और न ही मुख्य विपक्ष में. इसलिए उनके सामने चुनौती ज़्यादा है.

प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं. हालांकि, बीएसपी ने अभी से कई उम्मीदवारों का एलान कर दिया है.

विश्लेषकों के मुताबिक़, राज्य के चुनाव में बीएसपी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन कहती हैं, "बीजेपी के हिंदुत्व और सामाजिक ताने-बाने के अलावा अखिलेश यादव और कांग्रेस के गठबंधन की काट भी खोजनी है."

वहीं, राजनीतिक विश्लेषक सैयद क़ासिम का दावा है, "अभी बीएसपी का आकलन करना सही नहीं है. नवंबर तक सभी राजनीतिक दलों के गठबंधन ज़मीन पर बनने के बाद ही राजनीतिक आकलन किया जा सकता है."

उन्होंने कहा, "समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के इंडिया अलायंस का क्या होता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा."

हालांकि, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कई बार कहा है कि वह इंडिया अलायंस के साथ हैं. अखिलेश यादव लगातार पीडीए की एकजुटता की राजनीति का दावा कर रहे हैं.

उन्होंने अपनी पार्टी की छात्रसभा की वर्दी भी नीली कर दी है. वह 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज़ पर सामान्य सीटों पर भी दलितों को उम्मीदवार बना सकते हैं.

इसका सफल प्रयोग वह 2024 में अयोध्या-फ़ैज़ाबाद सीट पर कर चुके हैं.

वहां से सपा उम्मीदवार अवधेश प्रसाद जीते थे.

क्या 2027 में बीएसपी से कोई गठबंधन करेगा?

राजनीतिक विश्लेषक सैयद क़ासिम ने कहा, "कांग्रेस की ओर से सीटों की मांग को लेकर सपा-कांग्रेस गठबंधन पर राजनीतिक संशय बना हुआ है."

वरिष्ठ पत्रकार रचना सरन कहती हैं, "बीएसपी के कई रणनीतिकार मानते हैं कि कांग्रेस के साथ बीएसपी का गठबंधन पार्टी के लिए 1993 का मोमेंट हो सकता है."

साल 1993 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में बीएसपी को 67 सीटें मिली थीं. उस समय बाबरी मस्जिद टूटने के बाद भी बीजेपी को बहुमत नहीं मिल पाया था.

इसके बाद मुलायम सिंह की अगुवाई में सरकार बनी. लेकिन लखनऊ में गेस्ट हाउस कांड के बाद बीएसपी ने समर्थन वापस ले लिया था.

बीएसपी का आरोप था कि मुलायम सिंह के लोगों ने बीएसपी के विधायकों को अगवा करने का प्रयास किया था. इसके विरोध के दौरान मायावती के साथ मारपीट की घटना हुई थी.

मायावती पहली बार 1995 में बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं. वह 1997 और 2002 में भी बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी थीं.

साल 2007 में उत्तर प्रदेश में बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक सैयद क़ासिम का कहना है, "बीएसपी के साथ गठबंधन की पहल कांग्रेस को करनी पड़ेगी. यह तभी हो सकता है, जब सपा-कांग्रेस का गठबंधन टूट जाए."

उन्होंने कहा, "कांग्रेस को इसलिए पहल करनी पड़ेगी क्योंकि मायावती गठबंधन के लिए किसी के पास नहीं जाती हैं. इससे पहले 2004 में दिल्ली में सोनिया गांधी ख़ुद मायावती से मिली थीं. साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी को पहल करनी पड़ी थी."

हालांकि, इसकी संभावना कम है क्योंकि समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 37 सांसद हैं. इस वजह से इंडिया गठबंधन की ताक़त बनी हुई है.

राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों की तकरार कुछ भी हो, लेकिन गठबंधन नहीं टूटेगा. वहीं, बीएसपी के सामने कई तरह के संकट हैं. ख़ासकर मायावती के साथ कांग्रेस सहज नहीं है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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